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सप्तपर्णी, प्रकृति का एक अनमोल वरदान

Saptaparni


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The Complete Information about Alstonia scholaris in Hindi


आपने शहरो के उद्यानों, सड़क किनारे या फिर सड़क किनारे के डिवाइडर्स पर या शहरो के विभिन्न कार्यालयों के बाहर के खुले क्षेत्रो अथवा मंदिरों में एक घना सा वृक्ष कभी अवश्य देखा होगा, जिसपर उजले रंग के फूल खिले होते है और रात में निकलने वाली जिसकी तेज सुगंध से आस पास का वातावरण आनंदमय होता रहता है। इस वृक्ष का नाम है - सप्तपर्णी


सदाबहार वृक्ष है सप्तपर्णी


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सप्तपर्णी एक सदाबहार वृक्ष (Sadabahar Vriksh) है। अर्थात इस वृक्ष पर पूरे वर्ष भर पत्ते रहते हैं। यह वृक्ष बहुत तेजी से बढ़ता है और यह बारहो महीने हरा-भरा रहता है। यह एक देशी वृक्ष है। सप्तपर्ण का वृक्ष (Saptparn Ka Vriksh) मूलरूप से उष्णकटिबंधीय क्षेत्रों में पाया जाने वाला वृक्ष है, परन्तु इसे अलग अलग प्रकार की मिट्टी और जलवायु में भी लगाया जा सकता है। सप्तपर्णी मूल रूप से हिमालय क्षेत्र में उगने वाला वृक्ष है जिसको जानकारी के बाद धीरे धीरे मैदानी क्षेत्रों में लगाया जाने लगा और जल्द ही यह वृक्ष मैदानी क्षेत्रों का एक अटूट हिस्सा बन गया। वर्तमान में सप्तपर्णी बंगाल का राजकीय (Saptaparni Plant is the State Tree of West Bengal) वृक्ष भी है।


सप्तपर्णी का एक हिंदी नाम और भी है – चितवन (Chitwan Ka Ped)



सप्तपर्णी को कई अन्य नामो से जाना जाता है। वैसे सप्तपर्णी का एक और हिंदी नाम (Alstonia scholaris Hindi Name) है। सप्तपर्णी को चितवन (Chitwan) के नाम से भी पुकारा जाता है। अंग्रेजी में इसको एल्सटोनिया स्कोलरिस कहते है। इसके अलावे अंग्रेजी बोलने वाले लोगो ने इसे अन्य कई नाम भी दिया है। वे लोग इसे डेविल्स ट्री, स्कॉलर ट्री और ब्लैकबोर्ड ट्री के नाम से भी पुकारते है। मगर हिंदी बोलने वाले लोग इसे सप्तपर्णी के नाम से ही जानते है क्योकि यह नाम इस वृक्ष की विशेषता से सम्बद्ध है। वास्तव में, इसका कारण यह है कि इस वृक्ष के पत्ते एक चक्र (गोलाकार आकृति) में होते है। वैसे तो इस गुच्छे में तीन से लेकर दस पत्ते तक हो सकते है मगर व्यवहार में सात पत्तो का समूह वाले तथ्यों को ही आधार माना गया है और इसी के कारण ही इस वृक्ष का नाम सप्तपर्णी पड़ गया। अर्थात इस वृक्ष में पत्ते गुच्छों (समूह) में होते है। पत्तों का यह समूह (गुच्छे) गोलाकार आकृति लिए होता है। संस्कृत में इस वृक्ष को सप्तपर्ण के नाम से जाना जाता है।


सप्तपर्णी का वैज्ञानिक नाम है-एल्सटोनिया स्कोलरिस (Alstonia scholaris)


अब यदि बात करें इसके वैज्ञानिक नाम की, तो इसके वैज्ञानिक नाम एल्सटोनिया स्कोलरिस के पीछे एक महत्वपूर्ण कारण यह है कि सबसे पहले इस पेड़ के फूल के ऊपर वनस्पति शास्त्र के वैज्ञानिक सी. एल्स्टन (Prof. C. Alston) ने शोध किया था इसलिए इस वृक्ष का वैज्ञानिक नाम एल्सटोनिया स्कोलरिस (Alstonia Scholaris ) दे दिया गया।


सप्तपर्णी का उपनाम ब्लैकबोर्ड ट्री (Blackboard Tree) है


वैसे सप्तपर्णी के पेड़ (Saptaparni Plant) का एक और नाम है। इस वृक्ष को ब्लैकबोर्ड ट्री के उपनाम से भी जाना जाता है। वैसे तो इसकी लकड़ी अधिक टिकाऊ नहीं होती है तथा इस पर शीघ्र ही दीमक लग जाया करती है। इसके बावजूद इसका अनेक कार्यो में प्रयोग होता है। इसकी लड़की से बच्चो के पढ़ाने में काम आने वाले ब्लैकबोर्ड और स्लेट भी बनाई जाती है। इसलिए इसका उपनाम ब्लैकबोर्ड ट्री (Blackboard Tree) पड़ गया।


सप्तपर्णी का उपनाम ब्लैकबोर्ड ट्री (Blackboard Tree) क्यों पड़ा


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सप्तपर्णी का वृक्ष (Saptaparni Plant) जब अधिक पुराना हो जाता है तो इसका तना बहुत चौड़ा हो जाता है। इतना चौड़ा की यह तीन से चार मनुष्य की चौड़ाई के बराबर हो जाता है। अधिक चौड़ाई होने के कारण इसके तने को बिना काटे ही चौड़े बोर्ड बनाये जा सकते थे। अब यही कारण है कि इसकी लड़की से ब्लैकबोर्ड बनाये जाते थे । इसी कारण इसका उपनाम ब्लैकबोर्ड ट्री पड़ गया और इसलिए इसके वैज्ञानिक नाम में पीछे स्कॉरलैरिस जुड़ा हुआ है, जो स्कॉलर शब्द से ही लिया गया है।

सप्तपर्णी से बनाये जाने वाले ब्लैकबोर्ड तो आधुनिक समय में इतिहास की बात बन कर रह गई है क्योकि आधुनिक समय में सीमेंट व अन्य दूसरी चीजों से बोर्ड बनाये जाने लगे है। मगर इसका यह अर्थ नहीं है कि इसकी लकड़ी अब हमारे किसी काम के नहीं रहे। सच्चाई तो यह है कि इसकी लड़की के काम में थोड़ा सा बदलाव हो गया है। भारत में शीशम, सागौन, सखुआ या साख की लकड़ी बहुत महंगे हो गए है। इस कारण घरेलु साज सज्जा में उपयोग होने वाले वस्तुओ में इसकी लड़की का बहुत उपयोग हो रहा है। अब सप्तपर्णी की लड़की से प्लाईवुड और कागज़ के निर्माण में बहुत अधिक हो रहा है। इतना ही नहीं इसकी लकड़ी जलाने के काम में भी अधिक आती है। इस कारण सप्तपर्णी अब पहले से भी अधिक उपयोगी हो गई है क्योकि यह वृक्ष हमारी आम आवश्यकता को पूरा कर रहा है।


सप्तपर्णी के पत्ते (Saptaparni Leaves) गोलाकार गुच्छों में होते हैं


सप्तपर्णी के पत्ते बहुत ही चमकीले होते है। ये पत्ते चिकने, लम्बे और सिरे पर नोकदार होते है। सप्तपर्णी के पत्तो की लम्बाई 10 सेंटीमीटर से लेकर 20 सेंटीमीटर तक और चौड़ाई 2.5 सेंटीमीटर से लेकर 4 सेंटीमीटर तक होती है। पत्तो को तोड़ने पर दूध जैसा पदार्थ अर्थात इनसे रस निकलता है।


सप्तपर्णी की छाल (Saptaparni Bark) का है विशेष महत्व


सप्तपर्णी की छाल गंधहीन और कड़वी होती है। सप्तपर्णी की छाल मोटी होती है लेकिन तोड़ने पर चट्ट की ध्वनि के साथ बड़ी सरलता से टूट जाती है। इसकी छाल में भी प्रचुर मात्रा में कड़वा, दूधिया रस भरा होता है। वास्तव में, इस वृक्ष में यह विशेषता है कि इसके हर भाग में उजले रंग का दूध जैसा पदार्थ भरा होता है।

‘छाल में ऐल्कालॉयड डाइट माइन (alkaloids ditamine), इचि टेनिन (echitenine), इचिटामाइन (echitamine) और स्ट्रिक्टॉमाइन (strictamine) होते है। इनमें भी स्ट्रिक्टॉमाइन छाल में पाया जाने वाला सबसे महत्वपूर्ण अल्कलॉइड है। इस अल्कलॉइड को हर्बल दवा के निर्माण में किया जाता है। इस तरह से यह वृक्ष एक हर्बल ट्री (औषधीय वृक्ष) है।‘ संदर्भ-en.wikipedia.org


सप्तपर्णी के वृक्ष की ऊंचाई (Height) 15 मीटर से लेकर 40 मीटर अर्थात 130 फीट तक हो सकती है


यदि बात करें इस वृक्ष की ऊंचाई की तो इस वृक्ष की ऊंचाई 15 मीटर से लेकर 40 मीटर अर्थात 130 फीट तक हो सकती है। क्षेत्र और वातावरण के आधार पर इसकी अलग अलग लम्बाई होती है। कही यह कम लम्बाई के होते है तो कही बहुत अधिक लम्बे होते है।

सप्तपर्णी का वृक्ष (Saptaparni Tree) एक सदाबहार वृक्ष है। अर्थात यह पुरे बर्ष हरा भरा रहने वाला वृक्ष है। साथ ही इसके वृक्ष बहुत अधिक घने भी होते है। सदाबहार और छायादार वृक्ष (Sadabahar aur Chhayadar Vriksh) होने के कारण इस वृक्ष को बहुत अधिक पसंद किया जाता है। प्रायः मंदिरो के प्रांगण में, उद्यानों में, सड़क किनारे और सरकारी कार्यालयों के आस पास भी इन्हे लगाया जाता है। अक्टूबर माह से इसपर उजले रंग के पुष्प आने शुरू हो जाते है जो, सर्दियाँ समाप्त होने तक अर्थात मार्च तक खिले रहते है।


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सप्तपर्णी अपने फूल (Saptaparni ke Flowers) के कारण विश्व विख्यात है


सप्तपर्णी के फूल लगभग 2.5 सेंटीमीटर लम्बे एवं हल्का पीलापन अथवा हरापन लिए हुए लेकिन उजले रंग के होते है जिनसे रात के समय तेज सुगंध निकलती रहती है। पत्तो की भांति इसके फूल भी गोलाकार होते है। इसके फूल घने लेकिन गुच्छो में निकलते है। इसलिए जब वृक्ष पर फूल खिलते है तो पूरा का पूरा वृक्ष फूलो से लद जाता है। फूलो से रात के समय अति तीक्ष्ण सुगंध निकलती रहती है जिससे आस पास का समूचा वातावरण सुगंधमय हो जाता है। सर्दियों के मौसम में अर्थात विशेषकर दिसम्बर से लेकर फरवरी तक इसके वृक्ष उजले उजले फूलों से भर जाता है। इस मौसम में समूचा वृक्ष सफेद फूलो से भरा होता है। ये सफेद फूल बड़े आकर्षक लगते है। रात के समय इनसे निकलने वाली तेज सुगंध आस पास के समूचे वातावरण में फैली हुई होती है। वृक्ष से निकलने वाली उस तीव्र सुगंध के कारण रात के समय इसके आस पास का समूचा वातावरण परलौकिक अनुभूति का आभाष कराता हुआ जान पड़ता है।

इस वृक्ष से सूर्यास्त के बाद से लेकर और सूर्योदय के पहले तक तीव्र सुगंध निकलती रहती है। लेकिन वृक्ष से यह सुगंध केवल तभी निकलती है जब तक वृक्ष पर फूल खिलते है। भारत में सप्तपर्णी के वृक्ष पर फूल अक्टूबर से लेकर अप्रैल तक खिले होते है। इन माहों के बाद अर्थात फूल के सूखते ही वृक्ष से सुगंध निकलना गायब हो जाता है। उसके बाद इस वृक्ष से रात में भी कोई सुगंध नहीं निकलती है।


सप्तपर्णी के वृक्ष पर फली 15 से 30 सेंटीमीटर लम्बी और 5 से 8 मिलीमीटर चौड़ी होती है



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फूल खिलने के बाद सप्तपर्णी के वृक्ष (Saptaparni Ke Vriksh) पर फल आ जाते है। भारत में इसपर फली आने का समय अक्टूबर से फरवरी होता है क्योकि यह समय ठंड का समय होता है । इस समय सप्तपर्णी के वृक्ष फली और सुगंध करने वाले फूल से भर जाता है। इस समय वृक्ष पर जिधर दृष्टि पड़ती है उधर ही फली और सुगंध करने वाले फूल ही फूल दीखते है। सप्तपर्णी की फली लम्बी, चपटी और नीचे की ओर झुकी हुई होती है। सप्तपर्णी के वृक्ष की फली प्रायः एक-एक या दो-दो के झुण्ड में होती है। फली 15 से लेकर 30 सेंटीमीटर लम्बी और 5 से लेकर 8 मिलीमीटर चौड़ी होती है।

सप्तपर्णी के वृक्ष पर फली एवं फूल दिसम्बर से लेकर अप्रैल तक रहते है। गर्मी आते ही सप्तपर्णी के वृक्ष फली और फूल विहीन हो जाता है। फूल के सूखते ही सूर्यास्त के बाद निकलने वाली इसकी सुगंध भी गायब हो जाती है। फिर यह एक सामान्य पेड़ की भांति प्रतीत होता है।


सप्तपर्णी के बीज चपटा, पतला और 4 सेंटीमीटर से लेकर 8 सेंटीमीटर तक लंबा होता है


फली जब पेड़ में पक जाती है तो वो स्वयं ही फट जाती है इसके फटते ही इसके अंदर के भरे हुए बीज बाहर आ जाते है। सप्तपर्णी के बीज चपटा, पतला और 4 सेंटीमीटर से लेकर 8 सेंटीमीटर तक लम्बा होता है। इसके बीज का रंग कत्थई होता है। बीज के एक सिरे पर 7 मिलीमीटर से लेकर 13 मिलीमीटर तक लम्बे रुई जैसे बालो का झुण्ड होता है। सप्तपर्णी के बीज पर लगे इस रूईनुमा बाल के कारण इसके बीज प्रायः हवा में उड़ जाते है और दूर दूर तक वे बिखर जाते है।


सप्तपर्णी एक औषधीय वृक्ष (Herbal Trees) है - Medicinal plants in India


सप्तपर्णी एक औषधीय वृक्ष (Herbal Trees In India) है। इस वृक्ष के प्रत्येक भाग उपयोगी है। इसका उपयोग आयुर्वेद (Ayurved) से लेकर अन्य चिकित्सा पद्धतियों में दवा बनाने में किया जाता है। इस कारण यह वृक्ष केवल रात में सुगंध फैलाने वाला वृक्ष न होकर स्वास्थ्य के लिए भी अत्यंत गुणकारी है। वास्तव में, सप्तकर्णी अपने औषधीय गुणों के कारण विश्व भर में विख्यात है। इसकी छाल अत्यंत उपयोगी होती है। भारत में वैद्य के द्वारा विभिन्न प्रकार की बीमारियों को दूर करने वाले औषधियो के निर्माण में इनका प्रयोग कई सदियों से किया जा रहा है।


Aushadhiya Ped Paudhe => Medicinal Trees In India In Hindi


आयुर्वेद में चितवन की छाल (Chitwan Ki Chhal) को कफ व वात नाशक, रक्तशोधक अर्थात रक्त को शुद्ध करने वाली, ज्वर नाशक विशेषकर मलेरिया को दूर करने वाली बतायी गई है। इन औषधियों में एक प्रमुख विशेषता यह है कि इनके प्रयोग में कोई दुष्प्रभाव (साइड इफेक्ट) नहीं होती है। सप्तपर्णी की छाल और इसके पत्तों से तैयार औषधियों का प्रयोग विभिन्न प्रकार के चर्म रोगों, सिरदर्द, खांसी, शरीर की कमजोरी अथवा शरीर में रक्त की कमी (एनीमिया), पेट के अल्सर, गठिया जैसे अनेक विकारों में होता है। सप्तपर्णी का प्रयोग प्रतिरक्षा प्रणाली को मजबूत बनाने में, लिवर के विकार को दूर करने में व घाव भरने में भी होता है। पेट की गर्मी को ठीक करने में भी इसकी छाल से बने काढ़ा से लाभ होता है।


(Herbal Ke Ped in Hindi) -> Saptaparni in Hindi


शिशु के जन्म के बाद यदि स्त्री को इसकी छाल का रस या काढ़ा पिलाया जाएँ तो स्त्री में शिशु को पिलाने के लिए दूध की मात्रा बढ़ जाती है। इस वृक्ष से निकलने वाले दूधिया रस को यदि घाव, अल्सर पर लगाया जाएँ तो उससे बहुत लाभ होता है। इतना ही नहीं इसकी छाल में मिलने वाला मलेरिया की दवा क्लोरोक्वीन से अधिक अच्छा माना जाता है। एलस्टोनिया स्कॉलरिस का उपयोग दस्त, पेचिश और कमजोर पाचन के साथ मलेरिया रोगों में किया जाता है।


Ayurvedic Trees in India -> भारत के औषधीय पौधे


सप्तपर्णी (चितवन) से बहुत लाभ है मगर इससे प्रजनन क्षमता (fertility) पर बुरा असर पड़ता है। इसकी जानकारी नर चूहों पर लम्बे समय तक किये गए एक अध्ययन के बाद आयी जिसमें पाया गया कि उन नर चूहों की प्रजनन क्षमता में कमी आ गई जिनपर इसका प्रयोग किया जा रहा था। इसलिए इसके प्रयोग से पहले किसी विशेषज्ञ से आवश्यक सलाह ले लेनी चाहिए।


कैसे उगाये सप्तपर्णी के पेड़ => सप्तपर्णी के वृक्ष दो तरह से उगते है



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सप्तपर्णी के वृक्ष मानव द्वारा बीज को लगाकर उगाए जाते है जबकि अनेक स्थान पर कई बार यह स्वतः ही उग जाता है। स्वयं उगे हुए वृक्ष को कुछ लोग जंगली वृक्ष मानते है जबकि ऐसा कुछ भी नहीं है। वो भी सामान्य सप्तपर्णी का ही पेड़ होता है। इसके बीज को संग्रह करने के लिए विशेष युक्ति की आवश्यकता होती है। इसके लिए आवश्यक होता है कि फली के पकने से पहले ही इनको पेड़ से तोड़ लिया जाएं। इसलिए इसके बीज एकत्र करने के लिए फली के पकने से पहले ही वृक्ष की अलग अलग शाखाओ को हिला हिला कर फली को नीचे भूमि पर गिरा दिया जाता है और जिन्हे बाद में एकत्र कर लिया जाता है। एकत्र किये गए उस अधकच्ची फली को धूप में सुखाया जाता है। इन्हे तब तब तक सुखाया जाता है जब तक ये फट न जाए। सामान्यतः फली के सूखने में 8 से 12 दिन तक का समय लग जाता है। वृक्ष से संग्रह किये गए अध् कच्ची फली को सुखाने में विशेष सावधानी की आवश्यकता होती है। अब चूकिं सप्तपर्णी के बीज छोटे और बहुत हलके होते है। इसलिए उनके हवा में उड़ने का भय बना रहता है। इस कारण इन्हे पतले सूती कपड़े से ढककर सुखाना चाहिए।


सप्तपर्णी जैसे अनमोल वृक्ष के भी विरोधी बड़ी संख्या में है मौजूद

इस दुनियां का एक कड़ुआ सच यह है कि हर कृत को देखने व समझने की यहाँ दो दृष्टि होती है। एक पक्ष जहाँ उसे अच्छी दृष्टि से देख रहा होता है तो दूसरा पक्ष ठीक उसी के विपरीत उसे बुरी दृष्टि से देख रहा होता है। ठीक यही स्थिति इस वृक्ष के साथ भी है।


सप्तपर्णी के विरोधी दो प्रकार के है


सप्तपर्णी को नापसंद करने वाले लोगो में दो प्रकार के लोग है। उनकी सोच या तर्क भी दो अलग अलग प्रकार के है। दुर्भाग्य से कुछ लोगो को जहाँ रात में निकलने वाली इस तीव्र सुगंध से समस्या है तो कुछ लोगो को यह सुगंध भयभीत करती है।


सप्तपर्णी के विरोधियों में पहला पक्ष इसे स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मानते हैं


सप्तपर्णी के विरोधियों में एक पक्ष का तर्क यह है कि यह स्वास्थ्य के लिए हानिकारक है। वैसे लोगो का मानना है कि सूर्यास्त के बाद पेड़ से निकलने वाले रसायन युक्त गंध से उनके स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। उनका मानना है कि इस पेड़ से लगातार संपर्क में रहने से एलर्जी, सर्दी - जुकाम, खांसी, बुखार और अस्थमा की समस्या हो जाती है।

जबकि वैज्ञानिक पक्ष लोगो के इस आरोप की पुष्टि नहीं करता है। कुछ बर्ष पहले भी जाँच रिपोर्ट में पाया गया कि इससे वैसा कोई भी हानिकारक पदार्थ नहीं निकलता है जिससे मनुष्य के स्वास्थ्य को हानि पहुँचता हो। वनस्पति शास्त्र के विशेषज्ञों का मानना है कि अल्स्टोनिया स्कॉलरिस पेड़ (Alstonia scholaris Tree) को शैतान का पेड़ कहना गलत है। इसे सामान्य बोलचाल की भाषा में लोग सप्तपर्णी या पंचपर्णी पेड़ कहते हैं। यह बर्ष भर छांव देने वाला पेड़ है। सिर्फ इस पेड़ में परागण की प्रक्रिया हवा द्वारा होती है। इससे हल्की महक आती है। इस पेड़ का मानव स्वास्थ्य पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने के कोई प्रमाण नहीं हैं।

कुछ पर्यावरणविदों का कहना है कि कहीं भी साइंटिफिक रिसर्च में सप्तपर्णी से अस्थमा (दमा) के बढ़ने की बात साबित नहीं हुई है।


सप्तपर्णी पेड़ => चितवन पेड़


इसके विरोधी अपनी विरोध की पुष्टि में एक और तर्क प्रस्तुत करते है। उनका कहना है कि यह पेड़ इतना हानिकारक है कि इसपर चिड़िया भी अपना घोषला नहीं बनाती है।

वैसे यह सच्चाई है कि इस वृक्ष पर चिड़िया अपना घोसला नहीं बनाती है। लेकिन इसके पीछे वो कारण नहीं है जो कारण इसके विरोध में बताये जाते है। कई चिकित्सक भी पेड़ के विरोध में दिए गए ऐसे तर्क को सही नहीं मानते है। उनका कहना है कि जिन्हें एलर्जी होनी है, उन्हें किसी भी कारण से हो सकती है। इसमें सप्तपर्णी का कोई दोष नहीं है।

कुछ विशेषज्ञों यह भी मानते है कि यदि अधिक मात्रा में यह वृक्ष किसी क्षेत्र में पास - पास लगे हो तो, हो सकता है कुछ लोग इसके सुगंध से प्रभावित हो जाएं। मगर यदि किसी क्षेत्र में एक या दो पेड़ लगे हो या फिर वे बहुत दूर दूर पर लगे हो तो इससे कोई हानि नहीं है। जबकि कुछ विशेषज्ञ यह भी मानते है कि सप्तपर्णी में ठंड के समय ही फूल लगते हैं। जिनसे निकलने वाले परागकणों में तेज गंध होती है, जिसका असर अस्थमा के मरीजों पर पड़ता है। हालांकि जमीन की उर्वरा शक्ति में सप्तपर्णी भी दूसरे पेड़ों की तरह लाभदायक है।


सप्तपर्णी के विरोधियों में दूसरा पक्ष सूर्यास्त के बाद उससे निकलने वाली सुगंध से भयभीत होते हैं (Raat mein Bahut Tez Sugandh Karne wala Ped)



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सप्तपर्णी के विरोधियों में दूसरा पक्ष सूर्यास्त के बाद उससे निकलने वाली सुगंध से भयभीत होते हैं। उनका मानना है कि रात के समय इस वृक्ष पर शैतान का निवास हो जाता है और वे उसके पास जाने से भयभीत होते है। इसी कारण वैसे विचारधारे वाले लोगो ने इस वृक्ष को 'डेविल्स ट्री' अर्थात 'शैतान का पेड़' (Devil’s Tree) जैसे नाम दे दिया है। दुनियां के कुछ हिस्से में इस वृक्ष अशुभ माना जाता जाता है। उनका मानना है कि इस पेड़ पर शैतान निवास करता है। इसलिए रात में इससे तेज सुगंध निकलती है।

सप्तपर्णी के वृक्ष अर्थात चितवन के वृक्ष से रात में निकलने वाली तेज सुगंध के कारण आज भी भारत सहित दुनिया के कई देशों के ग्रामीण क्षेत्रों में लोग डरते है। वे रात में उसके आस पास जाने से भी कतराते है। उनका मानना है कि रात में उस पर भूत-प्रेत या शैतान का निवास हो जाता है। इस कारण वे रात तो क्या दिन में भी अकेले में उसके पास जाने से डरते है।

वैसे लोगो का मानना है कि सप्तपर्णी का वृक्ष (Saptaparni Ka Vriksh) अपनी सुगंध (sugandh) से लोगो को आकर्षित करता है और पास जाने पर वो उन्हें मार डालता है। अब यह उनकी सोच है। किसी की सोच पर कोई रोक तो नहीं लगा सकता है। जिसकी जैसी सोच, उसको यह पेड़ वैसा ही दीखता है। अब इस पेड़ को किसी की सोच से क्या मतलब है। वो तो रात में निकलने वाली अपनी अलौकिक सुगंध से आस पास के वातावरण को सुगंधमय करता रहता है और वातावरण में आनंद का संचार करता रहता है। ठीक एक अलौकिक वृक्ष की भांति।


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Written By

Rajiv Sinha


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