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अमलतास का वृक्ष - केरल की एक मार्मिक यादगार पौराणिक कथा


Story In Hindi


लोक कथा या पौराणिक कथा की इस सीरीज में हमने "अमलतास का वृक्ष" (Amaltas Ka Vriksh) नाम की पौराणिक कथा को भी शामिल किया हैं । यह पौराणिक कथा मैंने केरल राज्य (Kerala State) से ली है। लेकिन इस पौराणिक कथा का धार्मिक पक्ष भी है। जो सभी के लिए प्रेरणादायी भी है। आज केरल राज्य (Kerala State) का स्वरुप कुछ लोगो के राजनैतिक स्वार्थ व विधर्मियों के द्वारा लगातार चलाएं गए अनेको षड्यंत्र के कारण भले ही बदलता हुआ दिख रहा हो। मगर इस सच्चाई से इंकार नहीं किया जा सकता है कि कभी आज का यही केरल सनातन धर्म का गढ़ हुआ करता था।

आदि शंकराचार्य का जन्म इसी राज्य में हुआ था। आदि शंकराचार्य की महानता से कौन परिचित नहीं है। उन्होंने सनातन धर्म के पुनर्रूत्थान के लिए अनेक कार्य किये थे। उनके कार्यो को यहाँ कम शब्दों में लिख पाना असंभव है। जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने भारतवर्ष के चार कोनों में चार मठों की स्थापना की थी जो अभी तक बहुत प्रसिद्ध है और ये आज भी अस्तित्व में है। ये मठ आज भी बहुत पवित्र माने जाते हैं और इन मठो पर आसीन संन्यासी 'शंकराचार्य' कहे जाते हैं। वे चारों स्थान ये हैं- (१) ज्योतिष्पीठ बदरिकाश्रम, (२) श्रृंगेरी पीठ, (३) द्वारिका शारदा पीठ और (४) पुरी गोवर्धन पीठ। जगतगुरु आदि शंकराचार्य ने अनेक विधर्मियों को भी सनातन धर्म में दीक्षित किया था। इसलिए इस पौराणिक कथा को केवल मनोरंजन की दृष्टि से नहीं बल्कि इसमें छिपे गूढ़ ज्ञान के अंश को अपने जीवन में समाहित करने के उद्देश्य से पढ़ा जाना चाहिए।

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अमलतास का वृक्ष - केरल की एक अत्यंत मार्मिक, ह्रदय को स्पर्श करने वाली यादगार पौराणिक कथा


अमलतास के पेड़ की उत्पत्ति की कहानी : -


अमलतास (Amaltas) जिसको अंग्रेजी में ( Golden Shower Tree ) कहते है। उसी पेड़ की उत्पत्ति की एक पौराणिक कहानी बताई गई है। यह कहानी सभी के पढ़ने के लायक है। इसमें यदि एक ओर मनोरंजन है तो दूसरी ओर ज्ञान है। सनातन धर्म है। तो प्रेम से बोलिये - सनातन धर्म की जय !


A Story of Amaltas in Hindi: -


कहते हैं कि बहुत समय पहले घने जंगलों के मध्य आदिवासियों की एक बस्ती हुआ करती थी। वहां रहने वाले आदिवासी स्वभाव से बहुत सीधे-साधे, नेक और ईमानदार हुआ करते थे। वे लोग आस पास के जंगलो से फल-फूल इकठ्ठा करते थे और उसी को खाकर अपना जीवन यापन किया करते थे। उनमे से कुछ लोग शिकार भी किया करते थे।

बस्ती के आदिवासी वैसे तो प्रायः सामूहिक भोज और नाच-गाने का आनन्द लेते थे, किन्तु बसन्त के मौसम में वे एक बड़े उत्सव का आयोजन किया करते थे। उस उत्सव की तैयारी वे लोग महीनो पहले आरम्भ कर दिया करते थे। उस उत्सव के अवसर पर कई दिनों तक सामूहिक भोज और नाच-गाने का कार्यक्रम चला करता था | आदिवासियों की बस्ती में इस उत्सव के दौरान ही नए युवकों और युवतियों की शादियाँ भी हुआ करती थीं। इस कारण बस्ती के अविवाहित आदिवासी लड़के - लड़कियों को बहुत पहले से इसकी प्रतीक्षा रहा करती थी।

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Amaltas Ke Ped Ki Utpatti Ki Kahani (A Story of Amaltas in Hindi)


आदिवासियों की बस्ती में प्रतिवर्ष बसन्त के मौसम में आयोजित किए जानेवाले इस रंगारंग उत्सव में रात भर अविवाहित युवक-युवतियाँ नृत्य किया करते थे। एक बार इस नृत्य के उत्सव में बस्ती की एक सुन्दर युवती वासन्ती ने भाग लिया। वासन्ती अद्वितीय सुन्दरी थी। अपने गोरे रंग और तीखे नाक-नक्श के कारण वह पूरी बस्ती की चहेती बनी हुई धी। कहते है बस्ती के सभी युवक उससे विवाह करना चाहते थे।

'वासन्ती' को उस बस्ती के लोग प्रेम से 'वासी' के नाम से पुकारा करते थे। 'वासी' जितनी सुन्दर थी, उतनी ही संयमी थी। वह अत्यंत धार्मिक प्रवृति की कन्या थी। वह प्रातःकाल उठ जाया करती थी और स्नान-ध्यान करके सबसे पहले मंदिर में देवी कि पूजा अर्चना करती थी। इसके बाद ही वो कोई दूसरा कार्य किया करती थी। वासी पूर्णतः पवित्र कन्या थी। क्योकि वो सनातनी कन्या थी। वो धार्मिक कन्या थी। इसके साथ ही वासी पूरी बस्ती का भी ध्यान रखा करती थी।


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A Story of Amaltas (Golden Shower Tree) in Hindi


कहते है उस आदिवासियों कि बस्ती में लड़कियाँ तेरह से चौदह वर्ष की होते ही किसी न किसी लड़के को पसन्द करके अपना घर बसा लिया करती थी मगर वासी के साथ ऐसा बिलकुल भी नहीं हुआ था। वो पुरे अठारह बर्ष की हो गई थी परन्तु उसने अब तक किसी को भी अपने साथ विवाह के लिए पसंद नहीं किया था।

बस्ती के लोगों को आशा थी कि वह इस वर्ष अवश्य ही किसी न किसी लड़के को पसन्द करके अपना घर बसा लेगी। इस कारण बस्ती के कई युवक बसंत उत्सव से पहले ही उससे विवाह के लिए उसे मनाने लगे मगर वासी ने सभी के प्रस्ताव को एक झटके में ठुकरा दिया। कई लोगो ने उसे समझाने का प्रयास किया मगर सब बेकार गया। वासी पर किसी के समझाने का कोई असर नहीं हुआ। वासी हर किसी की बात को टाल रही थी। मानो उसने मन ही मन कुछ सोच रखा हो। अब चूँकि वासी एक अत्यंत दिव्य व पवित्र कन्या थी इसलिए किसी ने उस पर विवाह के लिए दवाब नहीं बनाया। सभी जानते थे वासी जो करेगी वो अच्छा ही करेगी। उसने जो सोचा होगा वो अच्छा ही होगा। क्योकि वासी एक दिव्य कन्या थी।

वास्तव में, वासी अपने स्वभाव के अनुरूप ही किसी अलौकिक पुरुष से विवाह करना चाहती थी। वो किसी ऐसे वैसे लड़के से विवाह नहीं करना चाहती थी। इसलिए वो चुप रहा करती थी। उसने मन-ही-मन यह प्रण ले लिया था कि अब वो यदि विवाह करेगी तो किसी अलौकिक दिव्य पुरुष से ही करेगी अन्यथा वो कभी भी विवाह नहीं करेगी।

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अमलतास के पेड़ की उत्पत्ति की पौराणिक कथा


बताते है कि जब वासी पाँच वर्ष की थी और जब उसे विवाह का अर्थ भी नहीं ज्ञात था तभी उसने एक रात सपना देखा था। सपने में उसे एक देवी ने आकर दर्शन दिए थे और उस देवी ने वासी से कहा था "हे पुत्री ! तुम कोई सामान्य कन्या नहीं हो ! इसलिए भविष्य में तुम कोई ऐसा वैसा कार्य मत करना जो मुझ देवियों को पसंद न आता हो। पुत्री, तुम अभी छोटी हो। बड़ी होने पर तुम्हे कई सांसारिक कार्यो का अनुभव होगा। तब तुम्हे मेरी बातें ठीक से समझ में आएगी। इसलिए मेरी ये बातें तुम अपने स्मृति में रखना। इसे भूलना मत और हाँ, तुम्हारा विवाह एक अलौकिक पुरुष से होगा। तुम्हारा विवाह किसी सांसारिक मानव से नहीं होगा। हे पुत्री ! तुम्हारा विवाह एक देवता से होगा। लेकिन, हे पुत्री ! विवाह के पहले और विवाह के तुरंत बाद तुम्हारे साथ कुछ विचित्र लीलाये होगी। ये सब विधि का विधान है। जो अपने निर्धारित समय पर घटित होती रहती है। इसलिए पुत्री तुम विचलित मत होना। जो होगा वो तुम्हारे हित में ही होगा। तुम इस धरती पर युगो युगो तक सुंदरता का प्रतिक बन कर खिलती रहोगी।" देवी स्वप्न में ऐसा उत्तम वचन कहकर तत्काल अन्तर्धान हो गई।


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एक स्त्री के पेड़ में बदल जाने की अत्यंत दुःखद कहानी - (Ek Stri Ke Ped Mein Badal jaane Ki Atyant Dukhad Kahani)


कहते है वासी जब तक जीवित थी तब तक उसे उस दिव्य सपने का स्मरण हमेशा रहा था और वो बड़ी होने पर भी सभी प्रकार की सांसारिक बुराइयों से दूर रही थी। उसने अपना सम्पूर्ण जीवन एक योगिनी की भांति बिताया था। इसलिए जब तक वो जीवित रही तब तक वो किसी भी पराये पुरुष के प्रति आकर्षित नहीं हुई थी। उसे देवी की कही हुई वो बातें सदैव स्मरण रही थी, जो उसे स्वप्न में दिखाई पड़ी थी। इसी कारण उस बस्ती में वासी एक दिव्य कन्या के रूप जानी जाती थी।

इसी कारण ' प्रतिदिन प्रातःकाल उठ कर स्नान करना और स्नान करके नियमित मंदिर जाना व मंदिर जाकर देवी की साधना करना ' जैसे उसकी दिनचर्या बन गई थी। कहते है वासी जब तक जीवित रही तब तक वो ऐसा ही जीवन बितायी थी। कहते है वासी दुसरो से बहुत कम बातें किया करती थी।


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समय बीतता गया और समय बीतने के साथ ही वासी में और भी बहुत से परिवर्तन आते चले गए। जैसे-जैसे वासी बड़ी होती गई, वैसे वैसे वो और भी अधिक गंभीर होती चली गई। लोगो से वो बहुत कम बातें करने लगी। कहते है, बारह - तेरह वर्ष की आयु तक पहुँचते-पहुँचते उसने चुप रहना आरम्भ कर दिया था। अब वो लोगो से नहीं के बराबर बातचीत करती। उसमें अपनी आयु की अन्य लड़कियों के समान न तो कोई चुलबुलापन था और न ही उसे किसी लड़के में रूचि थी। लेकिन वासी जो कुछ करती, अच्छा करती और जितना बोलती, मीठा बोलती। जब वह बोलती तो ऐसा लगता, मानो उसके मुँह से फूल झर रहे हों। सभी के लिए वो निःस्वार्थ सेवा किया करती थी। इसीलिए पूरी आदिवासी बस्ती उसके गुण गया करती थी और उसकी प्रशंसा करते नहीं थकती थी। लोग उसके प्रति देवी की भांति श्रद्धा रखते थे।

समय गुजरता गया और अब वो समय भी आ गया जब वासी का अठारहवाँ बर्ष भी आधा बीत गया। वो समय वासी के जीवन का सबसे महत्वपूर्ण समय था क्योकि उन्ही आने वाले निकट समय में वासी के जीवन का अंत होना निश्चित था।

इस समय वासी का रूप और सौन्दर्य देखते ही बनता था। वह स्वर्ग की अप्सराओं से भी अधिक सुन्दर दिखाई देने लगी थी। उसके शरीर का अंग-अंग ऐसा लगता था, मानो साँचे में ढालकर बनाया गया हो।


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सर्दियों का मौसम समाप्त हो रहा था और अब बसंत के उत्सव का समय भी आने वाला था। सभी प्रसन्न थे। बस्ती के लोग प्रसन्न थे। बसंत के उत्सव की तैयारियाँ आरम्भ हो गई थीं। मगर इस बार वासी ने भी कुछ सोच रखा था। अचानक एक रात वासी को सपने में पुनः देवी के दिव्य दर्शन हुए। देवी के चेहरे पर अलौकिक तेज था। देवी के उस पारलौकिक दिव्य तेज से वासी का घर जगमगा गया था। वासी ने देवी शक्ति को श्रद्धा से प्रणाम किया और उन्हें बताया "हे माँ ! आपकी आज्ञानुसार मैंने अब तक पवित्र जीवन बिताया है। मैंने आपकी नियमित साधना भी की है। हे माँ ! अब मेरे लिए क्या आज्ञा है ?"

देवी ने वासी की यह बात बड़े ही ध्यान से सुनी और उसकी ओर मुस्कराकर देखते हुए बोली, " हे पुत्री ! इस ब्रह्मांड में जो भी हलचल होता है, उस पल पल होने वाले हर हलचल का मुझे ज्ञात होता है। क्योकि मैं इस ब्रह्मांड के कण कण में बसती हूँ। मैं किसी से भी न तो दूर हूँ और न ही कोई मुझसे दूर है। जीव अपनी अज्ञानता के कारण ही मुझसे दूर हो जाते है। क्योकि वो सांसारिक होते है। हे पुत्री ! तुम इस संसार में रहकर भी सभी प्रकार की बुराइयों से मुक्त रही हो और साथ तुमने अपना सम्पूर्ण जीवन मेरी साधना में ही बिताया है ! इसलिए हे पुत्री ! तुम्हारी इस साधना से मैं अत्यंत प्रसन्न हूँ ! तुम्हारी साधना अब पूर्ण हो चुकी है। अब तुम्हारे विवाह का समय भी आ गया है। हे पुत्री ! जैसा मैंने पहले ही कहा है, तुम्हारा विवाह किसी सांसारिक मानव से नहीं होगा। तुम्हारा विवाह कामदेव से होगा।"

वासी देवी की वाणी सुनकर अत्यंत प्रसन्न हो गई। लेकिन अगले ही पल देवी ने जो कहा, उसे सुनकर वासी मायूस हो गई। मगर विधि का विधान समझकर उसने उसे स्वीकार कर लिया।

"हे पुत्री ! जैसा मैंने पहले ही कहा है कि तुम एक सामान्य कन्या नहीं हो। इसलिए हे पुत्री ! तुम्हारा जीवन सामान्य कन्याओ कि भांति नहीं होगा। तुम्हारे जीवन में असामान्य घटनाये घटित होगी। हे पुत्री ! तुम उन्हें मेरी ही ईच्छा मानकर स्वीकार कर लेना। इसी में तुम्हारा हित है। हे पुत्री ! तुम्हारा जीवन, तुम्हारा त्याग सांसारिक मानव के लिए प्रेरणदायी साबित होगा । हे पुत्री ! तुम युगो युगो तक इस धरती पर सुंदरता का प्रतिक बनकर खिलती रहोगी। धरती वासी तुम्हे देखकर आनंद का आभाष करेंगे। हे पुत्री ! तुम सभी के लिए प्रियदर्शनी रहोगी ! हे पुत्री ! तुम्हारा कल्याण हो !"

इतना कहकर देवी देखते ही देखते वहां से अन्तर्धान हो गई।

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समय बीतता गया और जल्द ही वो समय भी आ गया जब वासी के जीवन का अंत होना था।


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वर्ष में होने वाला बसन्त उत्सव अब आरम्भ हो गया था। वासी बार-बार अपने होनेवाले पति के बारे में सोच रही थी। देवी के वरदान से उसे अलौकिक पति की प्राप्ति होने वाली थी। यह सब सोच कर वो प्रसन्न थी। प्रसन्नता के कारण उसके चेहरे फूल की तरह खिल रहे थे। लेकिन वो अपने मन की बातें किसी से नहीं बता रही थी।

आदिवासियों की बस्ती मे बसन्त उत्सव की तैयारियाँ आरम्भ हो चुकी थीं। इससे पहले होने वाले उत्सव को वासी केवल चुपचाप देखा करती थी मगर इस बार वो स्वयं इसमें भाग ले रही थी। इसलिए बस्ती और आस पास के लोग वासी के इस बदलाव से आश्चर्यचकित भी थे।

"क्या वासी को कोई युवक पसंद आ गया है .......... अगर वासी ने किसी को पसंद किया है तो वो युवक कौन है ........! ऐसा कौन सा युवक है जिसको वासी ने पसंद कर लिया है। वह कौन-सा भाग्यशाली मानव है, जिसे वासी ने पसन्द किया है और जिससे वह विवाह करेगी !" सभी के मन में ऐसे ही कई प्रश्न उठ रहे थे। मगर वासी मौन थी वो किसी से कुछ बोल नहीं रही थी।

इस बार बसन्त उत्सव बड़ा उल्लास भरा था। वैसे तो उस आदिवासी बस्ती में हमेशा ही बसन्त का उत्सव बड़े धूमधाम के साथ मनाया जाता रहा था, लेकिन इस बार वासी के भाग लेने के कारण लोगों की खुशी का ठिकाना नहीं था। मानो एक साथ होली और दीवाली आ गया हो।

उस दोपहर को बस्ती में सामूहिक भोज का आयोजन हुआ था और शाम होते ही बस्ती के लड़के-लड़कियाँ सज-धजकर मन्दिर के सामने एकत्रित हो गए थे। मन्दिर के सामने का मैदान उस उत्सव के लिए विशेष रूप से सजाया गया था। मैदान के चारों ओर लताओं में रंग-बिरंगे, सुगन्धित फूल बाँधकर वन्दनवार लगाए गए थे और बीचोंबीच में अग्निकुंड तैयार किया गया था। परम्परा के अनुसार विवाह के इच्छुक नए लड़के-लड़कियाँ इसी अग्निकुंड के चारों ओर एक-दूसरे का हाथ पकड़कर नाचते हुए फेरे लिया करते थे और सात फेरे होते ही वे स्वतः विवाहित मान लिए जाते थे।

अब संध्या भी हो चुकी थी और रात का अँधेरा बढ़ने लगा था। इसी समय मन्दिर के पुजारी ने अग्निकुंड में घी डाला और आग लगा दी। इसके साथ ही अब बड़े-बड़े ढोल भी बजने लगे।

आयोजन का आरम्भ हो चुका था।


अमलतास के पेड़ की कहानी हिंदी में - (Amaltas Ke Ped Ki Kahani Hindi Mein)



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आदिवासी लड़के-लड़कियों को इसी क्षण की प्रतीक्षा थी। उन्होंने अपने-अपने जोड़े बनाए और अग्निकुंड के निकट आकर थिरकने लगे। वे एक-दूसरे का हाथ पकड़े हुए नाच भी रहे थे और नाचते नाचते वे लोग बारी बारी से सात फेरे भी ले रहे थे। किसी जोड़े के सात फेरे लेते ही उन्हें विवाहित मान लिया जाता था।

इधर आज वासी के शरीर पर हल्दी और चन्दन का उबटन लगा था। आज वो और भी दिव्य सुंदरी लग रही थी। उसके शरीर पर पीले कपड़े इतने अच्छे लग रहे थे, मानो वो स्वयं बसंत का प्रतिक बन गई हो। वासी आज बहुत खुश थी। आज उसका विवाह होने वाला है। लेकिन उसका विवाह किससे होगा। ये सोच सोच कर उसके चेहरे पर उदासी भी छायी हुई थी क्योकि उसका जीवनसाथी अभी तक उसे दिखाई नहीं दिया था।

अग्निकुंड के चारों ओर लड़के-लड़कियाँ नृत्य कर रहे थे और वासी पास खड़ी उनका नृत्य देख रही थी। लेकिन नृत्य देखने में उसका मन नहीं लग रहा था। उसकी दृष्टि बार-बार मन्दिर की ओर उठ जाती थी। प्रतीक्षा का एक-एक पल उसके लिए कठिन होता जा रहा था।

धीरे-धीरे अब अर्धरात्रि का भी समय आ गया था। वासी को लगा कि उसकी जीवनभर की तपस्या व्यर्थ चली गई है। देवी का कथन असत्य साबित हुआ। वो अब बहुत निराश हो गई थी। उसकी आँखे आसुओ से भरी हुई थी। उसका विश्वास अब डगमगाने लगा था।

तभी उसने अचानक से निर्णय लिया, "अब मैं जीवित नहीं रहूंगी। अब मेरे जीवन का कोई औचित्य नहीं है। मैं अपना प्राण त्याग दूंगी। मैं इसी अग्निकुंड में कूदकर अपनी जान दे दूंगी !"




अमलतास की कहानी हिंदी में - (Amaltas's Story In Hindi)


वासी ने अंतिम बार मायूस दृष्टि से मन्दिर की ओर देखा मगर मंदिर में सन्नाटा था। वासी मन-ही-मन देवी को प्रणाम कर अब अग्निकुंड की ओर आगे बढ़ चली थी। लेकिन तभी चमत्कार हुआ। उसी समय मन्दिर से एक दिव्य पुरुष निकला। मंदिर से वो दिव्य पुरुष बाहर निकलकर तेजी से आगे बढ़ा और आगे बढ़कर अग्निकुंड की ओर बढ़ती हुई वासी का हाथ पकड़ लिया।

वासी ने अपना हाथ पकड़नेवाले उस पुरुष की ओर पलटकर देखा। वह बस्ती का कोई युवक नहीं था। वो कोई साधारण पुरुष नहीं था। वह एक दिव्य पुरुष था क्योकि वह स्वयं कामदेव था। कामदेव को देखकर अग्निकुंड के चारों ओर नृत्य करते हुए सभी आदिवासी युवक-युवतियों के पैर थम गए। उन्होंने वासी और उसके पास खड़े पुरुष को देखा तो देखते ही रह गए। उस अलौकिक पुरुष को देखकर बस्ती के लोग अचंभित थे।

वासी ने एक बार पुनः देवी को प्रणाम किया और प्रसन्न होकर कामदेव के साथ अग्निकुंड के सात फेरे लगाने लगी।

वासी का विवाह कामदेव के साथ हो गया था। इसलिए वासी अब बहुत खुश थी। उसकी तपस्या सफल हो गई थी। उसे अलौकिक पति मिल गया था। अब उसकी कोई इच्छा शेष नहीं रह गई थी। वो अब अपने पति के साथ शांति से आगे का जीवन जीना चाहती थी। मगर कहते है होनी कुछ और ही सोचे हुए बैठा था।

बताते है कि वासी की यह ईच्छा पूरी न हो पायी।



कामदेव की पत्नी देवी रति को ये सब पसंद नहीं था। वो धरती पर अपने पति को ले जाने के लिए तत्काल प्रकट हो गई।

वासी जब मंदिर में देवी की पूजा करके घर लौटने लगी तभी कामदेव की पत्नी देवी रति उसके सामने प्रकट हो गई। वासी ने जब देवी रति को देखा तो उन्हें सम्मान के साथ प्रणाम किया। लेकिन रति क्रोध में थी। उसने क्रोधित होकर वासी को देखा।

कहते है देवी रति के क्रोध से देखने मात्र से ही वासी उसी समय तत्काल अदृश्य हो गई थी और उसके स्थान पर गहरे पीले रंग के फूलोंवाला एक बड़ा सा घना वृक्ष प्रकट हो गया था । वो वृक्ष और कोई नहीं बल्कि वो अमलतास था।

वासी के वृक्ष में परिवर्तित होते ही रति का क्रोध अब शान्त हो चुका था। क्रोध शांत होते ही देवी रति उसी समय अपने पति कामदेव के साथ देवलोक की ओर तत्काल प्रस्थान कर गई।


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कहते है .......तभी से अमलतास का वृक्ष (Herbal Tree in India) धरती पर उगने लगा। अमलतास का पेड़ (Amaltas Ka Ped) बहुत सुन्दर होता है। यह भारत के करीब करीब हर क्षेत्र में देखने को मिल जाता है .........................!! ये गहरे पीले रंग वाले फूलो से भरा होता है .........और देखने वाले के ह्रदय को आनंद से भर देता है ........!!


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Written By

Ruby Sinha


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