सर्वपितृ अमावस्या आपके लिए क्यों महत्वपूर्ण है, जानें इस दिन क्या करना चाहिए

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sarvapitri amavasya 2025

पितृ पक्ष अमावस्या की समाप्ति के साथ ही अगली सुबह देवी पक्ष का आरम्भ हो जाता है. इस तरह से जहां एक ओर पितृ पक्ष जैसे अशुभ माने जानें वाले दिन समाप्त होते है तो वही दूसरी ओर शुभ और मंगलकारी दिन - देवी पक्ष का शुभारम्भ हो जाता है।



पितृ पक्ष की अमावस्या कई नामों से जाना जाता है


पितृ पक्ष की अमावस्या कई नामों से जाना जाता है। कही इसे 'सर्वपितृ अमावस्या' (sarvapitri amavasya) कहा जाता है तो कही इसे 'पितृ विसर्जनी अमावस्या' (pitra visarjani amavasya) के नाम से जाना जाता है। यह दिन बंगाल, बिहार सहित कई स्थानों में 'महालया' या 'महालया अमावस्या' के रूप में प्रसिद्ध है।



सनातन धर्म में इस दिन का बड़ा महत्व बताया गया है


सनातन धर्म के विभिन्न शास्त्रों में इस दिन के महत्व को विस्तार से बताया गया है। वास्तव में, यह दिन केवल तिथि नहीं है बल्कि यह वह समय है जब हम अपने पितरों को हृदय से स्मरण करते है। सनातन धर्म में पितर के पूजन का विधान है क्योकि शास्त्र में उन्हें देवतुल्य कहा गया है। पितर और कोई नहीं हमारे ही बीच के गुजरे अपने होते है, वे अपने जो कभी हमारे परिवार, कुल, वंश का हिस्सा हुआ करते थे और अब वे हमारे बीच नहीं रहे है। इसलिए निमित्त दिनों में उन्हें उचित सम्मान के साथ उनका पूजन करना आवश्यक है, उनका तर्पण करना आवश्य है।



अब प्रश्न उठता है कि यह दिन इतना महत्वपूर्ण क्यों है?


इसका उत्तर यह है कि पितृ पक्ष के पूरे पखवाड़े में श्राद्ध और तर्पण उसी तिथि को किया जाता है, जिस दिन व्यक्ति के पूर्वज का देहांत हुआ होता है। लेकिन, हर किसी को अपने पितरों की मृत्यु तिथि ज्ञात हो, यह संभव भी नहीं है। और कभी-कभी तो परिवार में ऐसे भी पितर (Pitar) होते हैं, जिनके बारे में कोई विशेष जानकारी होती ही नहीं है।



इस दिन सभी ज्ञात व अज्ञात पितरों का तर्पण किया जाता है


शास्त्र के अनुसार वैसे पितरों की जिनकी मृत्यु की या तो तिथि ज्ञात न हो या जो अज्ञात हो, सभी का तर्पण इसी सर्व पितृ अमावस्या के दिन होता है. यानि पितृ पक्ष का अमावस्या ही वह दिन है जब सभी ज्ञात व अज्ञात पितरों का तर्पण किया जाता है। अब यही कारण है कि इस अमावस्या को ‘सर्व पितृ अमावस्या’ के नाम से जाना जाता है। इस दिन का किया श्राद्ध या तर्पण उन पितरों तक भी पहुँचता है, जिनको लेकर हम या हमारे परिवार अनभिज्ञ से हो गए है।



ज्योतिष शास्त्र में भी पितृ दोष को एक बड़ा दोष माना जाता है


मान्यता है कि इस दिन श्राद्ध और तर्पण करने से पितृ दोष कम होता है। पितृ दोष के प्रभाव से व्यक्ति को बार-बार असफलताओं का सामना करना पड़ता है। शुरू में काम सफल होता दिखाई देता है, लेकिन कुछ समय बाद सब बिगड़ने लगता है। जीवन कठिनाई और रुकावटों से भर जाता है। परंतु यदि हम श्रद्धापूर्वक अपने पितरों का स्मरण करें, तो उनके आशीर्वाद से इस दोष में काफी हद तक कमी आती है या फिर इस दोष से मुक्ति मिल जाती है।



पितृ पक्ष का सही से तर्पण ब्राह्मण के द्वारा ही कराना सही होता है


इस दिन नदी के तट पर जाकर पितरों की पिंड दान करना चाहिए या फिर यदि नदी तट पर जाना सम्भव नहीं हो तो घर में ही श्रद्धापूर्वक स्मरण करके तिल मिला जल देना चाहिए। जल अर्पित करने से पहले उनका अपने नाम के साथ आह्वान करना जरुरी है, बिना आह्वान के तर्पण स्वीकार नहीं होता है। इस दिन सूर्य ढलने से पहले यह कर लेना चाहिए क्योकि शास्त्र के अनुसार इसी संध्या को पितर अपने लोक की ओर गमन कर जाते है और जाते जाते वे अपना आशीर्वाद हमें प्रदान कर जाते है। इसलिए हमारा भी कर्तव्य बनता है कि कम से कम इन दिनों अपने पितरों को ह्रदय से स्मरण करके उनका पूजन (Pitra Paksh Mein Tarpan) करे, साथ ही उनके उद्धार के लिए माँ दुर्गा से विनती भी करें।



विशेष परिस्थिति में पितृ पक्ष का तर्पण भक्ति भाव से स्वयं भी कर सकते है


वैसे तो विद्वान ब्राह्मण के निर्देश पर उन्ही के देखरेख में तर्पण करना अच्छा रहता है पर अगर किसी कारण से यह कठिन हो रहा हो तो स्वयं भी तर्पण कर सकते है। इस दिन या पितर पक्ष में किसी भी दिन ब्राह्मण भोज भी जरुरी है। निर्धन को दान दें और अपने पितरों के कल्याण के लिए उनसे आशीर्वाद लें।



पितृ पक्ष भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलता है


तो जैसा आप जानते है, पितृ पक्ष (Pitra Paksha) भाद्रपद पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या (Ashwin Maas Ki Amavasya) तक चलता है। इसी को महालया अमावस्या (mahalaya amavasya) कहते है। इस बार आश्विन अमावस्या को यानि 7 सितंबर 2025 को समूचे भारत में चंद्र ग्रहण भी रहेगा। ध्यान देने वाली बात यह है कि अमावस्या को अमावस (Amavas) के नाम से भी पुकारा जाता है।



वर्ष 2025 का पितर पक्ष कब से कब तक? (Pitra Paksha 2025)


वर्ष 2025 का पितर पक्ष 7 सितंबर 2025 से शुरू होकर 21 सितंबर 2025 तक चलेगा। 21 सितंबर 2025 को सर्वपितृ आश्विन अमावस्या (Sarva Pitru Amavasya 2025) या यानि महालया अमावस्या (Mahalaya Amavasya) है। इसी के साथ पितर पक्ष की समाप्ति हो जायेगी और अगले दिन यानि 22 सितंबर 2025 की सुबह कलश की स्थापना की जायेगी।


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लेखक :

राजीव सिन्हा

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