उत्तराखण्ड की लोककथा - लाल बुरांश (Lal Buransh)

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Uttarakhand Ki Lokkath-Lal Buransh ki lekhika
स्वाति जी (रूबी सिन्हा जी)
📖 स्मृतियों के झरोखे से जुड़ी लोककथाएं

'लाल बुरांश' उत्तराखण्ड की कई लोककथाओं में से एक है। यह कहानी बहुत मार्मिक है। हमलोग बहुत सारे सच्चे और कल्पित किस्से-कहानियाँ पढ़ा करते हैं। मगर उनमें से कुछ ही हमें पसंद आती हैं और उनपर से भी कुछ ही ऐसी किस्से-कहानियाँ होती हैं, जो हमारे मानस पटल पर स्थायी रूप से बस पाती हैं।

ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उन किस्से-कहानियों में कुछ ऐसी बातें होती हैं जो हमें अनायास ही अपनी ओर खींच लेती हैं। हमारी उन भूली-बिसरी स्मृतियों को वे ताज़ा कर देती हैं, जिनको याद करने पर दुःख तो होता है मगर उसके बावजूद हमें शांति मिलती है।

"इसका कारण यह है कि उस कहानी को सुनकर या पढ़कर हम यादों के झरोखे से होते हुए उस कल्पना लोक में या उस बीते हुए पल में पहुँच जाते हैं जो हमारे लिए केवल एक सपने के समान है।"

यही कारण है कि हम उन कहानियों को बार-बार पढ़ते हैं। हम उन कहानियों के प्रति एक लगाव सा महसूस करने लगते हैं। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि हम भी उन कहानियों में अपने आपको तलाश करने लग जाते हैं। हम उनके किसी पात्र में ही अपने चेहरे को रखकर देखने लगते हैं और जब भी वह चेहरा हमें किसी भी सच्ची या कल्पित किस्से-कहानियों में दिख जाता है, तब वह कहानी हमारे हृदय के बिल्कुल करीब बसने लगती है। और इस प्रकार वैसी कोई भी कहानियाँ चाहे वह कल्पित हो या सच्ची हो, हमें पसंद आने लगती हैं।

🌿 हमारी संस्कृति और मिट्टी की खुश्बू

ऐसी ही एक लोककथा है "लाल बुरांश"। वास्तव में, लोक कथाओं का एक अपना ही अलग महत्व है। इनकी एक अलग पहचान है क्योंकि इन कथाओं में आज की तरह बनावटीपन नहीं होता है। ये सीधे तौर पर हमारी सभ्यता, हमारी संस्कृति, हमारी भाषा, हमारी मिट्टी और हमारे पूर्वजों के जीवनशैली से जुड़ी हुई प्रतीत होती हैं। वास्तव में, प्रत्येक लोक कथा वहाँ की सभ्यता और संस्कृति की झलक को भी दर्शाती है।

लोक कथाएँ चाहे भारत के किसी भी राज्य की क्यों न हो, उन सभी में इन गुणों की झलक तो देखने को मिलती ही है। वैसे दुःख की बात यह है कि धीरे-धीरे लोक कथाओं को पसंद करने वाले लोगों की संख्या में बहुत गिरावट आती जा रही है।

वर्तमान में भले ही इनको पसंद करने वाले लोग कम हो गए हों, लेकिन इतना तो तय है कि लोककथाओं की अपनी ही दुनिया है, अपनी ही संस्कृति है। तो ऐसी ही एक लोककथा है, जिसका नाम है- "लाल बुरांश"

Lal Buransh (लाल बुरांश)

लेकिन इस लोककथा से पहले बुरांश का संक्षिप्त परिचय लिखना आवश्यक है। पता नहीं आपने इसका नाम पहले सुना भी है या नहीं! तो इसलिए पहले इसका संक्षिप्त परिचय आवश्यक है।

🌺 Rhododendron (Buransh) - Medicinal plants in India

बुरांश के वृक्ष भारत के पर्वतीय राज्यों Uttarakhand, Himachal Pradesh में पाए जाने वाले प्रमुख वृक्षों में से एक हैं। प्राकृतिक रूप से बुरांश उच्च पर्वतीय शिखरों में ही पाया जाने वाला वृक्ष है। इसके पत्ते बहुत चमकीले और चिकने होते हैं। इसके फूल मखमली और लाल रंग के होते हैं। इनके फूल गुच्छों में होते हैं। बुरांश के फूल (Buransh Flower) देखने में बहुत सुंदर होते हैं। इसे बुरांस या बुरुंश के नाम से भी जाना जाता है! अंग्रेजी में इसे रोडोडेंड्रॉन (Rhododendron) कहते हैं।

💊 स्वास्थ्य के लिए भी लाभकारी (Herbal Benefits)

बुरांश के फूल केवल देखने में ही सुंदर नहीं होते हैं बल्कि ये बेहतरीन औषधीय गुणों से भी भरे होते हैं! यह स्वास्थ्य (health) के लिए भी बहुत लाभकारी है। इसके फूल से कई आयुर्वेदिक व होम्योपैथिक दवाइयाँ भी बनाई जाती हैं। बुरांश का जूस (Flower juice) कई बीमारियों को दूर करने में रामबाण के समान है! यह श्वास के विकारों को तत्काल दूर करता है।

पहले यह केवल पहाड़ी क्षेत्रों में ही लोकप्रिय था लेकिन अब समूचे भारत में इसकी माँग बढ़ गई है! इस कारण यह बहुत महंगा बिकता है! बुरांश के फूलों को केवल भारत में ही नहीं बल्कि समूचे यूरोपीय देशों में भी खूब पसंद किया जाता है।

बुरांश के वृक्ष को उत्तराखण्ड में राजकीय वृक्ष घोषित किया गया है! जबकि नेपाल में बुरांश के लाल फूल को राष्ट्रीय पुष्प के रूप में जाना जाता है! Nepal में बुरांस को गुराँस (Gurans) कहा जाता है।

बुरांश के फूल सालभर में केवल मार्च और अप्रैल महीने में ही खिलते हैं। अन्य मौसम में बुरांश के वृक्ष पुष्प के अभाव में वीरान पड़े होते हैं!

तो, उत्तराखण्ड की यह लोककथा इसी फूल के खिलने पर आधारित है। अब चूँकि लोककथाएं सुनी-सुनाई होती हैं और हर इंसान उसको अपने ढंग से सुनाता है या लिखता है, तो मैंने भी इस कहानी को अपने ढंग से लिखने की कोशिश की है साथ ही साथ यह भी कोशिश की है कि इस लोक कथा की वास्तविक पहचान बनी रहे!

जरूर पढ़िए मेरी प्रिय कहानी उत्तराखण्ड की प्रसिद्ध लोककथा - "लाल बुरांश"


लाल बुरांश

(उत्तराखण्ड की एक प्रसिद्ध लोककथा)

Lal Buransh ki lekhika Swati Sinha
स्वाति जी (योगिनी रूप में)
🏠 एक बेटी का विवाह और माता-पिता का इंतज़ार

बहुत समय पहले की बात है। एक गाँव में एक किसान परिवार रहा करता था। उनकी एक सुंदर सी बेटी थी। बड़ी होने पर उन्होंने अपनी बेटी की शादी कर दी। विवाह के बाद पर्व-त्यौहार या कोई उत्सव के मौके पर किसान अपनी बेटी का बेसब्री से इन्तजार करने लगे। पर्व-त्योहार आते रहे और जाते रहे मगर उनकी बेटी नहीं आयी। शुरू में तो उन्होंने सोचा कि नयी शादी है, ससुराल के कुछ काम में उलझ गई होगी।

समय बीतता चला गया। मगर उनकी बेटी उनसे मिलने नहीं आयी। अब लड़की के माता-पिता बहुत चिंतित और उदास रहने लग गए। अपनी इकलौती बेटी को देखे बिना उनका हृदय कई आशंकाओं से भरा रहता।

💔 ससुराल का दर्द और बेबस अकेलेपन की पीड़ा

उधर बेटी भी ससुराल में दुखी रहा करती। उसकी सास निष्ठुर थी। उससे दिन-रात काम लिया जाता और ढंग से उसे आराम भी नहीं करने दिया जाता। वह दिन भर घर और खेत के काम करती रहती। फिर भी उसे अपने मायके नहीं जाने दिया जाता। वह जब भी अपनी सास से मायके जाने की बात करती, उसकी सास कोई न कोई बहाना करके उसे मना कर दिया करती।

उस लड़की के संपर्क में कोई ऐसा भी नहीं था जिससे वह अपने माता-पिता का हाल-चाल मालूम कर सके या फिर अपना संदेश अपने माता-पिता तक पहुँचा सके। अकेलेपन में वह जानवरों की सेवा करने के दौरान उनसे ही अपने मन की बात कहती रहती। जब वह मवेशियों के लिए चारा लाने या लकड़ी लाने के लिए जंगल जाती, तब वह जंगल में मौजूद ढेर सारे वृक्षों से बातें किया करती! उन्हें अपने मन की पीड़ा सुनाती और खूब रोती थी।

🌙 माँ का सपना और मायके जाने की व्याकुलता

उधर माता-पिता भी अपनी इकलौती बेटी की चिंता में बीमार रहने लग गए। एक दिन बेटी को रात में माँ का सपना आया। सपने में उसने देखा उसकी माँ बहुत बीमार हैं। उसकी माँ उसे बेचैन होकर याद कर रही हैं। अगले ही दिन उसने ये बातें अपनी सास को बतलाई और मायके जाने का अनुरोध किया। इस बार सास ने उसकी बात मान ली और उसे मायके जाने के लिए कह दिया। अगले दिन वह व्याकुल होकर अपने घर-गाँव के रास्ते पर तेजी से चल पड़ी। उसका मन अब अपने माता-पिता से मिलने के लिए बेचैन हो रहा था। शादी के बाद वह पहली बार अपने मायके जा रही थी।

"आज वह अपने माता-पिता से मिलेगी! उन्हें अपने मन की सारी पीड़ा बतायेगी। वह उनके लिए कितना रोयी है, यह भी उन्हें बताएगी। सास उसे कितना दुःख देती है, यह भी वह अपने माता-पिता को बताएगी। आज बहुत दिन बाद वह अपने माता-पिता के घर पर कदम रखेगी! आज उसे अपने बचपन की वे सभी यादें ताज़ा हो जाएँगी जिनको वह हमेशा याद किया करती है।"

वह लड़की आज बहुत खुश थी। उस खुशी के कारण उसे सामने भी कुछ नहीं दिख रहा था! आज उसकी चिरप्रतीक्षित इच्छा जो पूरी होने वाली थी। वह बस अपने मायके की ओर ही तेज कदमों से बढ़ रही थी। गाँव दूर था और संध्या भी अब होने ही वाली थी। मगर वह लगातार तेज कदमों से अपने मायके की ओर ही बढ़ रही थी…..बस अपने मायके की ओर ही भागे जा रही थी….!

🌆 शाम ढले सूने आँगन में पहला कदम

आखिरकार उसके गाँव पहुँचते-पहुँचते संध्या का वेला हो ही गया। लेकिन फिर भी संध्या वेला तक वह लड़की घर पहुँच गई। उसने घर के आँगन में कदम रखा। दूर आँगन से ही उसकी दृष्टि कमरे के दरवाजे पर चली गई। लेकिन ये क्या........!!!!! उसके माता-पिता तो मुख्य दरवाजे की ओर ही टकटकी लगाये बैठे हैं। पलंग पर लेटी बीमार माँ की आंखें तो जैसे मुख्य द्वार पर ही लगी हैं। उसके सिरहाने बैठे पिता भी जैसे उसी की राह तक रहे हैं।

दोनों बहुत कमजोर और बहुत निराश दिखाई पड़ रहे हैं। अपने माता-पिता की ऐसी दयनीय स्थिति देखकर वह बेटी अचानक से बहुत घबरा गई। उसने तो सोचा था कि वह अपने माता-पिता से मिलकर अपने ससुराल के दुःख उन्हें बतायेगी! मगर यहाँ का दृश्य तो कुछ और ही है। वह बेटी वहाँ का हृदयविदारक दृश्य देखकर सब कुछ भूल गई और अपने माता-पिता का हाल-चाल जानने के उद्देश्य से सवालों की झड़ी लगा दी।

🥀 ख़ामोशी का सन्नाटा और बिखरे हुए अरमान

उस समय उसके माता-पिता के चेहरे ऐसे लग रहे थे, मानो वे अपनी लाडली इकलौती बेटी की ऐसी हालत देखकर अवाक हो गए हों। उन दोनों के चेहरे से यह झलक रहा था जैसे उन्हें अपनी बेटी की हालत देखकर समझ आ गयी हो कि उसे ससुराल में किन हालातों में रखा जाता है। वे दोनों अपनी इकलौती बेटी की ऐसी स्थिति देखकर स्तब्ध थे। उनकी आँखें खुली थीं मगर मुँह से कोई शब्द नहीं निकल रहे थे!

इतने समय बाद एक बेटी का अपने माँ-बाप से मिलन भी तब हुआ जब माँ-बाप की ऐसी हालत हो गई। अपने माता-पिता को ऐसी हालत में देखकर उस लड़की के आंसू भी निरंतर बहते जा रहे थे। उसने माँ को गले लगाया, मगर वह निशब्द थी। उस बेटी ने फिर अपने पिता को भी गले से लगाया। लेकिन ये क्या? वे दोनों कुछ बोल क्यों नहीं रहे हैं!

आखिर शादी के बाद मैं पहली बार घर आई हूँ! मैं इनकी इकलौती बेटी हूँ! मुझे कितना चाहते थे मेरे माता-पिता! लेकिन आज….आज मेरे माता-पिता को ये क्या हो गया! ये कुछ बोल क्यों नहीं रहे हैं? बेटी को अब संदेह हो गया था। वह सोचने लगी! उसकी आँखों से बहते आँसुओं को देखकर तो उसके माता-पिता को उसे अपने गले से लगा लेना चाहिए था मगर ये क्या? वे तो निशब्द बैठे हैं! बेटी ने उन्हें हिलाया, प्रतिक्रिया न पाकर वह बहुत घबरा गई! घबराकर वह अभागी बेटी अब अपने माता-पिता को झकझोरने लगी।

लेकिन होनी तो कुछ और ही सोचे बैठी थी। उस अभागी बेटी के प्रारब्ध में माता-पिता के पास आकर भी उनसे मिलना नहीं लिखा था, उनसे बातें करना नहीं लिखा था, उनसे अपने मन की पीड़ा बताना नहीं लिखा था।

😭 -- अपनी इकलौती, लाडली बेटी की राह तकते-तकते उसके माता-पिता की पहले ही मृत्यु हो चुकी थी.........!!
🌸 लाल बुरांश का जन्म और अमर परंपरा

..........बताते हैं कि कुछ समय बाद उसी वीरान घर में बुरांश का एक वृक्ष उग आया था। उस वृक्ष पर बुरांश के दो फूल खिले थे। अब बेटी हर वर्ष बुरांश के खिलने के मौसम में अपने मायके आने लगी थी। बेटी बुरांश से भेंट करती और बुरांश से ही भेंट करके वह इतना अपनापन महसूस करती मानो, वह अपने मृत माता-पिता से ही मिल रही हो......!!

......... कहते हैं तभी से बुरांश खिलने के मौसम में बेटियों के अपने मायके आकर माता-पिता से भेंट करने की परंपरा पहाड़ों में आज भी चली आ रही है..........!!!!

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Swati:Aprajita Roop
स्वाति : अपराजिता रूप
Swati : Alaukik Chhavi
अलौकिक छवि
Swati: Yogini Roop
स्वाति : योगिनी रूप

अत्यंत दिव्य, सात्विक, सौम्य, निष्पाप, पवित्र, मनमोहिनी स्वाति अपने कर्म और लेखनी से अनेक लोगों की आदर्श व पूजनीय बनीं। समय-समय पर आने वाली जीवन की अनेकोनेक चुनौतियों के बावजूद उस वीरांगना, योद्धा ने जीवन में कभी भी हार नहीं माना और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वह हर स्थिति के लिए तैयार रही, तभी तो उसका एक नाम अपराजिता पड़ा। जहाँ दिल्ली जैसे महानगर की कई कम आयु की धनवान लड़कियां धर्म, संस्कार से दूर होकर आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल हो जाया करती हैं, उसी के विपरीत दिव्य व्यक्तित्व वाली स्वाति सौम्यता, विनम्रता, सात्विकता और वीरता का जीता-जागता स्वरूप रहीं।


गुलाबी साड़ी में उनका वह गरिमापूर्ण रूप हो, ध्यान (मेडिटेशन) की शांत मुद्रा में लीन उनका निश्छल स्वभाव हो, या फिर किसी मासूम बच्ची के साथ कार में उनकी वह निष्पाप मुस्कान—उनका हर स्वरूप यही बयां करता है कि वे धरती पर एक अलौकिक विचार रखने वाली विरली आत्मा थीं। देश के कई राज्यों में फैले उनके चाहने वालों के लिए वे केवल एक लेखिका नहीं, बल्कि देवी का ही एक साक्षात स्वरूप रही हैं।


जिस व्यक्तित्व के चेहरे पर ऐसा अद्भुत तेज और सरलता हो, उनकी लेखनी से "लाल बुरांश" जैसी अत्यंत संवेद्य और भावुक लोककथा का जन्म होना बिल्कुल स्वाभाविक था। लेकिन यह केवल एक कहानी का पुनर्जन्म नहीं था, बल्कि स्वाति जी (रूबी सिन्हा) के अपने जीवन की अनकही पीड़ा की ही एक गूँज थी।


"लाल बुरांश" केवल एक लोककथा नहीं थी बल्कि वह स्वाति जी के अपने अंतर्मन का वह सन्नाटा था, जिसे उन्होंने शब्दों में ढाल दिया। जब इंसान का कोई सबसे करीबी दूर हो जाता है, तब मन में केवल एक खालीपन ही शेष बचता है। लोककथा की वह अभागी बेटी भी ससुराल के सारे दुखों को सहकर, अपने दिल में माँ-बाप के लिए अटूट प्रेम समेटे मायके लौटी थी। उसके मन में भी ढेरों प्रश्न थे, माँ-बाप से मिलकर उन्हें देखने की आस थी... पर जब वह पहुँची, तो वहाँ उसे पूछने और सुनने वाला भी कोई न बचा था।


स्वाति जी ने इस कहानी को केवल लिखा नहीं था, बल्कि इसे अपने भीतर प्रतिपल जिया था। मात्र 6 वर्ष की अबोध उम्र में माँ सहित 3 वर्ष की छोटी बहन को खो देने का असह्य वज्रपात, फिर वर्षों बाद पिता का भी इस संसार से चले जाना, और अपनों के नाम पर कोई नहीं, न कोई भाई और न ही कोई अपना... इतनी कम उम्र में अपनों के पूरी तरह छूट जाने की यह वेदना किसी साधारण इंसान को निश्चित रूप से तोड़ सकती थी। परंतु उस अपराजिता ने इस असीम अकेलेपन और महा-वेदना को दिल्ली जैसे महानगर में रहते हुए भी ईश्वर की साधना, ध्यान और सात्विकता में बदल दिया। तस्वीरों में ध्यान की मुद्रा में बैठा उनका शांत व्यक्तित्व इस बात का साक्षी है कि उन्होंने अपने जीवन के हर दर्द को अध्यात्म का दीप बना लिया था।

Swati: Saumy Rup
सौम्य रूप
Swati: Riya aur Komal ke sath
स्वाति: रिया और कोमल के साथ
Swati : Saumy Muskan
स्वाति : सौम्य मुस्कान

स्वाति (रूबी सिन्हा जी)

स्वाति जी अपनी लेखनी के माध्यम से यह संदेश दे गईं कि इंसान भले ही चला जाए, पर उसका प्रेम प्रकृति बनकर हमारे आस-पास ही रहता है—ठीक वैसे ही जैसे वह बेटी हर वर्ष खिलने वाले 'लाल बुरांश' के फूलों में अपने माँ-बाप के उपस्थिति को प्रतिक के तौर पर ढूँढ लेती है। स्वाति जी के विचार और कर्म हमें सिखाते हैं कि जो हमारे भौतिक जीवन से दूर चले जाते हैं, वे स्मृतियों और सुंदर विचारों में सदा अमर रहते हैं।


ऐसी सात्विक और दिव्य आत्माएँ इस नश्वर धरा पर बहुत कम समय के लिए आती हैं, लेकिन अपने पीछे विचारों, दिव्य कर्मो और शब्दों की एक ऐसी अनश्वर छाप छोड़ जाती हैं जो युगों-युगों तक मानवता को प्रेरित करती रहती है। स्वाति जी ने भी अपने अलौकिक तेज और सरलता से अनगिनत ह्रदय में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया।


उनकी सोच और यह लोककथा हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गई है। जब-जब पहाड़ों में लाल बुरांश खिलेगा, जब-जब कोई बेटी अपने मायके को याद करेगी, तब-तब स्वाति जी (रूबी सिन्हा जी) की यह रचना लोगों के दिलों को यूँ ही छूती रहेगी।

— कोटि-कोटि नमन (राजीव सिन्हा) 🙏✨

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