फटा आँचल - Best Award Winning Short Film Story

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Story In Hindi



A Heart Touching Story In Hindi - Dil Ko chhune Wali Kahani :


        वह जनवरी महीने का प्रातःकाल था | जनवरी महीना ऐसा महीना हैं जो बर्ष का सबसे अधिक शीतल और सबसे अधिक कष्टदायी भी होता हैं | जनवरी महीने की ठंडक का स्मरण करके ही शरीर कॉप उठता है |

अब ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण वहां ऊँचे - ऊँचे ईमारते तो नहीं थे, लेकिन इतना तो जरुर था की वहां कुछ ऐसे भी घर थे जो अनायास ही हमारे मानस पटल पर पुरानी कला-सस्कृति और राजा - महाराजाओ के समय की याद दिला जाती थी | उन घरो के बीच जाने वाली सकड़ी-सकड़ी गलियां और सकड़ी सड़के ग्रामीण समाज के विकास के दौड़ में आज भी पिछड़े रहने के प्रतीक के रूप में जरुर दिखते थे |

लेकिन उस दिन वे सकड़ी गलियां, सड़के और दूर-दूर तक फैले सपाट खेत-खलिहान, सब के सब घने कोहरे की प्रकोप का ऐसे शिकार हो गए थे मानो गाँव के गाँव का अस्तित्व ही मिट गया हो | समूचा क्षेत्र घने कोहरे और जानलेवा ठण्ड की चपेट में था | सुबह के उस समय में दृश्यता मात्र चार से पांच मीटर ही रह गई थी| शीत लहर और तेजी से गिरती ओस ने शीतलता को इतना बढ़ा दिया था, मानो वह ईलाका किसी इन्सान तो क्या, किसी जीव के बसने लायक ही न रहा हो | सारा ईलाका मरघट की भांति ऐसे वीरान पड़ा था, मानो वहाँ कोई मानव तो क्या कोई नीव जन्तु भी नही बसता हो | जिधर देखो, उधर सन्नाटा l और देखने के लिए दृश्यता भी कहाँ थी l कोहरे के कारण मुश्किल से चार से पांच मीटर दूर ही तो देखा जा सकता था l गाँव, गली, सड़क, खेत - खलिहान हर ओर बस सन्नाटा ही सन्नाटा छाया हुआ था |


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गरीब का जीवन दुखों से भरा होता है


हाँ, कुछ साहसी लोग इतना सब होने पर भी अपने घरो के द्वार पर लकड़ी और पुआल का अलाव लगा कर ठण्ड को चुनौती देने में जरुर लगे हुए थे | प्रकृति की इस निष्ठुरता के कारण जहाँ किसान अपने खेतो, मजदूर अपने काम पर, अन्य व्यवसाय में लगे लोग अपने अपने व्यवसायों पर नहीं जा पा रहे थे तो वही पढ़ाई करने वाले छात्र - छात्राएं भी घर पर बैठेने के लिए बेबस थे, लेकिन जिसने भी प्रकृति इस क्रूरता के विरुद्ध संघर्ष करने का साहस दिखलाया, प्रकृति ने उसे बड़ी निष्ठुरता से मार डाला, वे काल के ग्रास बन गए |

न जाने हर बार गरीब और बेबस मनुष्य ही इसका शिकार क्यों होते है | अमीरों के पास तो कई सुख-सुविधाएँ होते है, साधन होते है, उनके विकल्प भी होते है | मगर गरीब क्या करे | ऐसे जानलेवा ठंडक से बचने के लिए कैसे अपना तन ढके, घर में रहकर कैसे अपना और अपनों का पेट भरे |

इस ठंडक में गरीबो के पास घुरा या अलांव ही उसका जीवन रक्षक या सच्चा साथी का होता है | मगर दिन रात अलाव लगा कर आग तापने से तो पेट नहीं भरेगा | पेट भरने के लिए तो भाग - दौड़ करना ही होगा, काम करना होगा | लेकिन इस ठंडक में काम भी कैसे हो ?

न जाने गरीबो से ही हर बार इतनी कड़ी परीक्षाएं क्यों ली जाती है | हर साल अखबारों में और रेडिओ व टीवी के समाचारों में ठण्ड से अनेको लोगो के मारे जाने के समाचार आते है | मगर फिर भी हर साल वही ठंडक, वही मृत्यु वहीं समाचार और वही हम …..!!

जिंदगी संघर्ष का दूसरा नाम है



लेकिन क्या किया जाएं, जब तक जिन्दगी है, तब तक संघर्ष है, तब तक चुनौती है और उस दिन उस जानलेवा ठण्ड को चुनौती देते हुए छः बर्ष की छोटी सी रुबी स्कूल जाने के लिए तैयार थी | छः बर्ष की उस दुबली - पतली मासूम रुबी एक फ्रॉक और पुराने हाफ स्वेटर के बल पर उस काल रूपी ठण्ड को चुनौती देती हुई हाँथ में एक कॉपी व दो पुरानी किताबे लेकर घर के दरवाजे से बाहर निकलती हुई अपनी माँ से बोली, “माय हम स्कूल जाय हियो !” ( माँ मै स्कूल जा रही हूँ……! )

“आज स्कूल मत जो बेटी.......!” (आज स्कूल मत जा, बेटी) |

“बहुत ठण्ड है | जान चल जैतो हमर नुनु ! ( जान चली जायेगी, बेटी ) ”


मगर रूबी तो कुछ और ही सोच रही थी | माँ की बात की अनसुनी करती हुई रूबी घर के दरवाजे से तेजी से निकली | घर के बाहर द्वार पर खूटे से बंधी हुई गाय पुआल पर पेट में मुंह घुसाएँ निष्प्राण सी बैठी थी | रूबी गाय की ओर देखती हुई आगे निकल गयी | पड़ोसी के द्वार पर दो - तीन लोग घुरा (अलाव) ताप रहे थे | रूबी उन लोगो के करीब से गुजरने के बाद भी उन्हें नहीं पहचान पायी | एक तो कुहासा और दुसरे मुंह तक ढके ओढ़ना | रूबी उन लोगो की भी अनदेखी करती हुई सड़क पर आ गयी | सड़क सन्नाटा, उंसांसे भरती हुई शीतल वायु, हर ओर कुहासा | धरती पर मानो बादल ही उतर पड़ा हो |


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दृढ़ इच्छा शक्ति वाले लोग मार्ग में आने वाली बाधाओं से भी टकरा जाते है



एक ओर प्रकृति की इतनी भयानक कहर और दूसरी तरफ नन्ही सी, छोटी सी, दुबली-पतली क्षीण काया वाली रूबी, जिसके पैर में चप्पल भी नही | प्रकृति की उस भयानक कहर भी रूबी के हौसले को तोड़ने में नाकाम हो रही थी| रूबी सड़क पर जाकर अपनी सहेली कजरी को पुकारने लगी,

“कजरी...ऐ कजरी...कजरी..... ऐ कजरी, कहाँ है? हम स्कूल जा रहे है | चलेगी नही हमरे साथ !”

मगर प्रत्योत्तर में न कोई आवाज आई और न ही कोई वहां आती हुई दिखी |

आज रूबी को अकेले ही स्कूल जाना पड़ेगा | खाली पैर, घुटना तक की पतली फ्रॉक, हाफ स्वेटर, घुटना के नीचे तक उघार पैर और ठण्ड जबर्दस्त, फिर भी हौसला बुलंद | रूबी पीठ तक आयी अपनी छोटी सी उलझी चोटी को हिलाती हुई हाँथ में कॉपी, किताब लिए स्कूल जाने वाली सड़क पर बढ़ गई |

थोड़ी दूर आगे जाने पर रूबी ठिठक कर खड़ी हो गयी |

“ये क्या ? .... सड़क के बीच में ये गोल सा काला पत्थर कहाँ से आ गया ?.. .. कल तो यह नहीं था !” रूबी मन-ही-मन सोचने लगी|

फिर वह कुछ सोच कर आगे बढ़ी | नजदीक जाने पर उसने देखा की जिसे वह गोल सा काला पत्थर समझ रही थी, वह पत्थर नहीं बल्कि उसकी सहेली, गली की कुतिया कजरी थी | रूबी को अपने आप पर हंसी आ गयी |

“ये कुहासा भी न !”

रूबी अपने चेहरे पर आयी कुहांसो की बूंदों को पोछते हुए अपने आप से बोली| कजरी रोज उसके साथ घर से स्कूल तक जाती थी और स्कूल से लौटते वक्त बीच रास्ते में उसके साथ हो जाती थी | इस तरह कजरी, रूबी की पक्की सहेली बन गयी थी | उस समय कजरी अपने समान काले रंग वाले दो छोटे बच्चो को अपने में चिपकाएँ बिलकुल गोल बन कर बैठी थी |



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“जाएँगी नहीं स्कूल !” रूबी उस काली कुतिया को छूती हुई बोली |

रूबी के छूने पर कुतिया रूबी की ओर देखती हुई मंद्धिम आवाज में कू - कू करने लगी | मानो वह कह रही हो, ‘बहुत ठण्ड है, बच्चे भी छोटे है, अपने छोटे बच्चो को छोड़कर जाने का मन नहीं कर रहा है |’

रूबी की आवाज से उसके दो छोटे - छोटे काले रंग वाले बच्चे भी नींद से जग गए | वे दोनों भी रूबी को अपने छोटे-छोटे आँखों से ऐसे देखने लगे, मानो कह रहे हो, बहुत ठण्ड लग रही है | माँ की गोद में हूँ | मेरी माँ को कही चलने को मत कहो |

उस नन्ही सी रूबी को कजरी और उसके दो नन्हे दुधमुहा बच्चो पर दया आ गयी | रूबी ने कुछ दूर खलिहान में पड़े पुआल के कुछ गट्ठर को लाकर सड़क किनारे रख दी |

“कजरी, इसपर आकर बैठ जा, बहुत ठण्ड है न ! इसपर बैठने से तुम्हे ठण्ड नहीं लगेगी ! आ जाओ !”

कुतिया भी ऐसी मानो वह सचमुच में रूबी की बात समझ रही हो | वह वहां से उठकर रूबी के द्वारा बिछाये गये पुआल पर बैठ गयी | कजरी के पीछे - पीछे उसके दोनों छोटे बच्चे भी अपनी माँ से चिपक कर बैठ गई |

“अब हम जा रहे है, ठीक है |” रूबी आगे बढ़ते हुए बोली |

“कू - कू - कू”, कुतिया रूबी को जाते हुए देखकर मुंह से रंग-विरंगी आवाज निकालने लगी | उसके दो छोटे-छोटे बच्चे भी अपनी कान खड़ा करके रूबी को दुखी होकर देखने लगे | मानो वे सब रूबी को स्कूल जाने रोक रहे हो और कह रहे हो, मुझे पुआल की गर्मी का अहसास कराकर तुम क्यों इतनी ठण्ड में जान से खेलने जा रही हो, .....जाओ घर लौट जाओ |

“कू -कू -कू.........” कजरी अब भी बोलती जा रही थी | उस समय कजरी की आँखों से आँसू गिर रहे थे |

“अब क्या हुआ, कजरी ? तुम अपने बच्चो के साथ आराम करो ! हम स्कूल से आ रहे है, ठीक है |” रूबी एक बार फिर घूम कर कजरी से बोली और फिर तेजी से स्कूल की ओर बढ़ गई |



क्या करें, गरीबी ठंड पर भी भारी पर जाती है



खाली पैर, कम कपड़े, घुटना तक उघार पैर और हड्डी कप - कपा देने वाली ठण्ड | लेकिन रूबी आगे बढ़ रही थी | ओस की बूंद से चेहरा भर चूका था | वह सब दुखो को बर्दास्त करती हुई आगे बढ़ रही थी | तभी उसे सड़क के एक किनारे पीपल का पेड़ और दुसरे किनारे नीम का पेड़ दिखा | उसके पैर ठिठक गए |

दूर -दूर तक कोई नही | पेड़ से अजीब - अजीब से आवाज निकल रहे थे | ओस की बूंदों का ऊचाई पर स्थित पत्तो से लुढ़ककर नीचे के पत्तो व जमीन पर गिरने से टप - टप की आवाज निकल रही थी | उस शांत वातारण में वह आवाज बहुत भयावह लग रही थी | हवा उसांसे भर रही थी | पूरा माहौल भुताहा लग रहा था | रूबी को अचानक याद आया की गाँव वाले कहते है की इन दोनों पेड़ो पर चुड़ैल रहती है | अब वह क्या करें |

रूबी का कलेजा धक् - धक् करने लगा | एक बार मन किया कि जोर से माँ को पुकारे, लेकिन माँ तो वहां नहीं थी | वहां तो दूर - दूर तक कोई भी नहीं था | क्यों आयी वह अकेले ! माँ तो उसे स्कूल जाने से मना कर रही थी, लेकिन वह माँ की बात नही मानी | वैसे वह भी क्या करती | आज स्कूल जाना भी तो जरुरी था | तभी उसे माँ की बात याद आयी | माँ कहती है, दुर्गा माय चुड़ैल को भगा देती है |

“जय दुर्गा माय, जय दुर्गा माय, जय दुर्गा माय, जय दुर्गा माय.....” कहते हुए रूबी दौड़ कर आगे निकल आयी | अब रूबी पीपल व नीम के पेड़ से बहुत दूर आ चुकी थी | दौड़ते - दौड़ते वह थक भी गयी थी | लेकिन ये क्या....? उसके हाँथ-पैर कहाँ है ? रूबी को उस समय ऐसा लग रहा था जैसे उसके हाँथ-पैर है ही नहीं| उसने अपने हाँथ और पैर की ओर की ओर गौर से देखा | अरे... ये तो है ही....! एक हाँथ से दुसरे हाँथ और पैर को छुआ तो वे सुन्न......थे ! वह घबरायी | तभी उसे ध्यान आया कि कुछ दूर पर हलकू चाचा का घर है |


Delhi Based Hindi Writer - Rajiv Sinha


“हलकू चाचा, हलकू चाचा ! मेरे हाँथ -पैर नहीं है |” ठण्ड से कपकपाती छोटी-सी, भोली- भाली रूबी हलकू चाचा के करीब जाकर बोली | हलकू चाचा सब समझ गए | रूबी के हाँथ-पैर ओस से भीगे थे | पैरो में घास-फूस सटे हुए थे |

हलकू चाचा ने दौड़ कर नन्ही रूबी को गोद में उठा लिया | रूबी का पूरा शरीर बर्फ था | हलकू चाचा पास में ही लगे घूरे (अलाव) के पास उसे ले गये और कुछ देर उसके हाँथ -पैर को आग से सेकते रहे | तब जाकर रूबी को चैन मिला |

ठीक होते ही रूबी, चाचा की गोद से उछल कर स्कूल की तरफ भागी | चाचा बहुत मना करते रहे | लेकिन वह नही मानी | कुहासा अब बहुत कम हो गया था और अब स्कूल भी नजदीक ही था | मंजिल के करीब पहुँचते-पहुँचते रूबी को अपनी आशाएँ पूरी होती हुई दिखने लगी, जिसके लिए वह माँ की बात काटी, कजरी की मूक मनाही पर भी आगे बढ़ी, चुड़ैल वाली पीपल का गाछ (पेड़) को भी दुर्गा माय का नाम लेकर पार कर गई, हलकू चाचा के मना करने पर भी भागी |



आशा में बहुत शक्ति है



आज स्कूल में पैसा मिलेगा | दो दिन पहले ही उसने 5वी क्लास में पढ़ने वाले रोहित भैया से पूछा था | उसी ने आज का दिन बताया है |

रूबी के सपने सच होने के समय आ गए थे| वह स्कूल की ओर बढ़ रही थी और मन-ही- मन सोच रही थी |

‘कितनी ठंडक है | उसके पास चप्पल भी नही है | उन पैसे से वह अपने लिए चप्पल खरीदेगी | पड़ोस में रहने वाली उसी की उम्र की झुनकी कितनी अच्छी चैन वाली स्वेटर पहनती है | वह सुन्दर - सुन्दर, लाल रंग की स्वेटर पहन कर छत पर खड़ी होकर उसे अपना स्वेटर दिखाती है | उसने भी माय (माँ) से वैसा स्वेटर माँगा था | माँ कहती है | फसल अच्छा नही हुआ तो पैसा कहा से लाये |’

लेकिन अब वह इन पैसो से अपने लिए खूब अच्छा - सा स्वेटर खरीदेगी बिलकुल झुनकी जैसा | वह माँ के साथ बाजार जाएगी | अगर बाजार जाएगी तो लाल रंग का एक स्कार्फ़ भी लेगी जैसा की उसकी सहेली बिंदा लगाती है | कुछ पैसे से वह अपनी माँ लिए भी स्वेटर खरीदेगी | बेचारी को एक भी स्वेटर नही है | कितना मानती है वह हमको | एक बार जब वह काली बिल्ली देखकर जोर से चिल्लाई थी | तब माँ अपने खाने के लिए ले जा रहे दूध का कटोरा दूर फेकते हुए कैसे उसके पास दौड़ कर आयी थी | उस दिन वह भूखी ही रही थी | फिर भी उसको गोदी में लेकर दिन भर दुलार करती रही थी |

बाबूजी कहते है एक बार वह हॉस्पिटल में तीन दिन तक बेहोस थी | तब भी माँ तीन दिन तक उसके पास ही रही और उसके लिए रोती रही | बहुत अच्छी है, माँ उसकी| दस दिन पहले की बात है वह गोयठा (उपला) लेने गई थी तब वह गोयठा पर एक बिच्छा को देखकर कितनी जोर से चिल्लाई थी | माँ उस बिच्छा को मारने के बाद भी उसे दिनभर गोदी में लेकर ऐसे बैठी रही मानो बिच्छा ने उसे काट ही लिया हो |

फिर वह माँ के दूध नही होने पर भी उसके ब्लाउज़ हटा कर उसे पीने लगी थी और तब माँ ने उसकी पूरी शरीर को अपनी आँचल से ढ़क दिया था | लैकिन वह उसके मुह को कहा ढ़क पायी थी | माँ का आँचल तो फटा था | उसका मुह तो उघार ही रह गया था | तब रूबी को कितनी हंसी आयी थी यह देखकर और फिर उसको हँसते देख कर उसकी माँ भी तो हंसने लगी थी | इसलिए अब वह उन पैसो से माँ के लिए एक साड़ी भी खरीदेगी |

सोचते - सोचते रूबी को अचानक से याद आया, " फिर जो पैसे बच जायेंगे उससे रुनकी जैसा एक स्कूल बैग लुंगी और काला कलम भी लुंगी, और हाँ .. एक कॉपी भी लुंगी |



आशा में बहुत शक्ति है मगर कमजोर भी यही बनाती है



रास्ता कट गया | अब तो वह अपनी मंजिल पर पहुँच ही गयी | कितना कष्ट उठाकर आज वह स्कूल पहुंची है | स्कूल का भवन दिखते ही रूबी को अपना छोटा सा स्वप्न पूरा होता हुआ जान पड़ा | शरीर में ठण्ड से कंपकपी | फिर भी अपनी जरूरते पूरी होने की उल्लास, निश्चित रूप से शरीर की होने वाली दुखदायी कष्ट पर भारी पर रहा था |

खाली पैर, कुछ दिन पहले ख़रीदा हुआ फ्रॉक, घुटना के नीचे तक पैर उघार, हॉफ स्वेटर, पीठ पर लटकती हुई छोटी सी चोटी, हाँथ में कॉपी, किताब लिए मासूम सी नन्ही रूबी स्कूल की गेट होते हुए जल्दी से अंदर आयी |

रूबी को याद है, माँ ने कुछ दिन पहले ही उसके लिए एक फ्रॉक ख़रीदा थी, कही आने - जाने के लिए | वही एक फ्रॉक है उसके पास जिसको, पहन कर वह महीनो स्कूल आती-जाती है | उसकी सहेली झुनकी के पास तो एक - दो नही चार - चार फ्रॉक है | झुनकी के पास तो सूट भी है | लेकिन उसके पास तो बस एक ही फ्रॉक है | बाजार भी वह उसी फ्रॉक को पहन कर जाती है | किसी परिवार के यहाँ भी माँ उसे वही फ्रॉक पहना कर ले जाती है | अब माँ भी क्या करे | उसके पास इतने पैसे ही नही है कि बाहर- भीतर जाने के लिए उसको और भी फ्रॉक खरीदकर दे सके | स्वयं माँ के पास भी तो इस जानलेवा ठण्ड में अपना शरीर बचाने के लिए एक स्वेटर भी नहीं है | ओढने के लिए शॉल भी नही है |



Hindi Kahani



रूबी ने देखा कि स्कूल में आज बहुत सारे बच्चे आये हुए है| सभी बच्चे उस ठण्ड में भी बहुत खुश नजर आ रहे है| पैसे जो मिलना है|वह भी बहुत खुश है| उसको भी आज पैसा मिलेगा|

सारे सर जी भी आ गये है | कुछ सर जी तो हेड सर के ऑफिस में है | पैसे का हिसाब - किताब जो करना है | रूबी भी हेड सर जी के ऑफिस का नजारा देखना चाहती है | कुछ बच्चे खिड़की से अंदर झांक रहे है | अरे, उन बच्चो में तो उसकी सहेली झुनकी भी है | फिर रूबी को भी वही जाना चाहिए | मन में ऐसा विचार आते ही रूबी दौड़कर झुनकी के पास पहुंची | कुछ सर जी अटेंडेंस रजिस्टर देख रहे है |

तभी सभी बच्चे भागने लगे | कोई बच्चो को वहां से भगा रहा था | रूबी भी सभी बच्चो के साथ वहां से भागी | कुछ दूर भागने के बाद वह रुक गयी | अरे, वह तो सुधीर भैया है, वही हमलोगो को वहां से भगा रहे थे | सातवी में पढ़ते है | अगले साल हाई स्कूल में नाम लिखवायेंगे | सर जी से ज्यादा सुधीर भैया ही बच्चो पर शासन करते है | बड़ा जो है | देखो तो हमसब को भगा कर वह किस तरह खिड़की के पास खुद खड़ा हो गए | साथ में मनोहर भैया और दिनेश भैया भी हैं | सब के सब बहुत बदमाश है | खैर इससे रूबी को क्या | वह उससे लड़ने थोड़ी जाएगी |

अब जल्द ही सर जी उसके वर्ग में आयेंगे | उसका नाम पुकारेंगे | फिर वह सर जी के पास जायेगी | सर जी उसके हाँथ में पैसे देंगे | फिर क्या ? फिर वह घर चली जायेगी | बस ! और पैसे माँ के हाँथ में रख देगी | माँ कितना खुश होगी |

वो देखो बाइक से पंकज सर भी आ गए | पंकज सर ही शहर से पैसे लाते है | अब तो स्कूल में पैसा भी आ गया | तभी तो खून को जमा देने वाली ठंडी हवा के साथ - साथ भोला सर भी सरकंडे की पतली डंडी लिए बच्चो को वर्ग की ओर खदेड़ने लगे है | बच्चो को वर्ग की ओर खदेड़कर भोला सर निश्चित हो गए |


Story In Hindi


अब सभी बच्चे अपने - अपने क्लास रूम आ चुके है | कुछ दादागिरी करने वाले लड़के जो एक - दो शिक्षक के करीबी भी है, वही बाहर है | बाकी सभी बच्चे अपने - अपने वर्ग में आ चुके हैं | रूबी भी अपनी सहेली झुनकी के साथ अपने वर्ग में पहुँच चुकी है | झुनकी उसका हाँथ पकडे हुए जमीन पर बैठने के लिए एक सही स्थान की तलाश कर रही है | स्कूल में सर जी के बैठने के लिए तो कुर्सियां है | मगर इस जानलेवा ठण्ड में बच्चो के बैठने के लिए एक भी बेंच किसी भी वर्ग में नहीं है |

सभी बच्चे नीचे बैठने के लिए अपने साथ लाये बोड़ी बिछाने लगे | लेकिन रूबी तो अपने साथ बोड़ी लायी ही नहीं | वह तो बोड़ी लाना भूल गयी | अब क्या होगा | उसे बर्फ जैसी ठंडी जमीन पर ही बैठना होगा | नहीं, उसकी सहेली झुनकी जो है, उसके साथ | झुनकी अपने बैठने के लिए बोड़ी लायी है | झुनकी बोड़ी को थोड़ा सा खिसका कर रूबी के बैठने के लिए जगह बनाने में सफल हो गयी | रूबी, झुनकी से सट कर बैठ गई | एक पैर बोड़ी पर तो दूसरा पैर खाली जमीन पर | अब झुनकी भी क्या करे | बोड़ी ही छोटी है |

सभी बच्चे आपस में खूब बातें करते है | इन बच्चो को स्कूल में शिक्षा मिले-न-मिले पर ये बच्चे आपस में बात-चीत करना खूब सीख जाते है | सर जी को भले ही इन बच्चो से बात करने में रूचि न हो परन्तु इन बच्चो को आपस में बात करने में बहुत मजा आता है |


Writer Rajiv Sinha : - Script Writer Rajiv Sinha


रूबी को मालूम है, अभी ऊँचे वर्ग में पैसा बंट रहा है | "अब मेरे वर्ग का भी नंबर आएगा| तब सर जी हमारे वर्ग में भी आयेंगे और हमको भी पैसा देंगे |" बुधनी अपनी सिर को खुजलाते हुए बोली |

ये बच्चे ठण्ड में कम ही नहाते है | सर जी भी इन्हे पानी से बचने की ही सलाह देते है | जान बचेगी तो पढाई होगी | पहले जान फिर पढाई और जान बचाने के लिए ठंडे पानी से दूर रहना जरुरी है |

जब सभी बच्चे बात करने में व्यस्त थे | उसी बीच लाली वर्ग के बाहर झांकने के लिए दौड़ पड़ी | वह कुछ ही देर में बाहर का समाचार लेकर आ गई |

"सर जी अब तीसरी वर्ग में आ गये है | वे वहां खूब पैसे बांट रहे है |" लाली के नाक में ठण्ड से पानी आ रहे है | वह फ्रॉक उठाकर नाक में आये पानी को पोछते हुए फिर चहक कर बोली, " अब उसके वर्ग का ही नंबर है |"


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सभी बच्चे खुश होकर लाली को आशा भरी निगाह से देखने लगे | सभी बच्चे एक बार फिर आपस में बात - चीत करने में व्यस्त हो गए | बच्चे बहुत मिलनसार है | भले ही सर जी इन बच्चो की परवाह न करे, पर ये आपस में एक - दूसरे की जरूर परवाह करते है | तभी किसी ने चहक के आवाज लगाई, सर जी आ रहे है और सचमुच में सर जी हाँथ में रजिस्टर लिए वर्ग में आ गये | वे वर्ग में प्रवेश करके एक ओर रखे कुर्सी पर बैठ गये |

सर जी पैसा मिलते ही बच्चो को जल्दी से घर चले जाने की हिदायत देने लगे | सर जी कहते है | रास्ते में कही मत रुकना | नहीं तो बच्चा समझकर कोई पैसा छीन लेगा | अब तो सर जी नाम पुकारकर पैसा बांटना भी शुरू कर दिये है | लेकिन ये ठंडी हवा तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही है | खिड़की से अंदर आ रही है | अब खिड़की बंद भी कैसे करे | खिड़की में पल्ला रहे तब न | रूबी के पेट में हलकी हलकी चुभन हो रही है | शायद उसे ठंड लग गयी है, नहीं घर से स्कूल वह तेज कदम चल कर आयी है इसलिए | मगर सुबह तो वह ठीक से खाना भी नहीं खायी थी | लेकिन अब क्या होगा |

वह दोनों पैर को छाती तक सिकोड़ते हुए ठंड से बचने का प्रयास कर रही है | मगर ठंड तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है | खैर अब कुछ देर की बात है | पैसा मिलते ही वह घर चली जाएगी और वह माँ के हाँथ में पैसा देगी | जल्द ही उसका नाम पुकारा जायेगा | वह सर जी के पास जाएगी | और फिर पैसा लेकर सीधे वह घर की ओर भागेगी और घर पहुंचकर माँ के गोद में बैठ जाएगी | फिर वह माँ से कहेगी, " माय, हमरा खाना दे |" ( माँ, मुझे खाना दीजिये |) माँ उसे अपने गोद में बैठाकर खाना खिलायेगी | फिर माँ उसे अपने आँचल में छिपा लेगी | तब ठंड कैसे लगेगी |

रूबी को ऐसा लगा की वह माँ की गोद में है | माँ उसके सिर पर हाँथ फेर रही है |

लेकिन, वह तो स्कूल में थी | माँ की गोद में कैसे आ गई | तभी रूबी की नींद टूटी तो उसने देखा की वह तो अब भी स्कूल में ही है | लेकिन अब वर्ग का नजारा बदला हुआ है | वह खाली जमीन पर पड़ी है | उसकी सहेली झुनकी अपनी बोड़ी लेकर जा चुकी थी | लगता है पूरा वर्ग, ......नही-नही पूरा स्कूल ही खाली हो चूका है | दूर - दूर तक न कोई बच्चा है और न ही किसी बच्चे कि शोर - गुल ही सुनाई पड़ रही है |


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सबको पैसे मिल गये | लेकिन रूबी को तो पैसे नही मिले है | अचानक घटित मुसीबत से रूबी हक्का - बक्का रह गई | वह दौड़कर सर जी के ऑफिस की ओर भागी | वहां भोला सर जी दिख गये | सर जी को देख कर रूबी की टूटती आस जग गई | उसकी जान में थोड़ी जान आ गई | मगर ह्रदय की घबराहट में कमी नही आई |

भोला सर जी भी जाने की तैयारी थे | तभी भोला सर की निगाह दरवाजे पर खड़ी रूबी पर पड़ी | सर जी अचंभित होकर अभी रूबी से कुछ बोलने ही वाले थे की रूबी भोला सर जी धीरे से बोल पड़ी, "हमर पैसा, सर जी !"

शायद सर जी रूबी की आवाज नही सुन पाए या फिर उसकी आवाज नही समझ पाए |

"क्या हुआ रूबी बेटी, तुम अब तक यही हो ?" भोला सर रूबी के करीब आकर उसके सिर पर हाँथ रखते हुए बोले, "देखो तो ! अब अँधेरा भी होने वाला है | सभी बच्चे कब के अपने - अपने घर चले गए | ठंड भी कितनी है| यह जानलेवा ठंड और तुम्हारे शरीर पर इतने कम कपड़े| बेटी, जान चली जायेगी | जल्दी से घर चले जाओ|"

अब रूबी सर जी को कैसे बताए कि इसी जानलेवा ठंड से बचने के लिए ही तो वह इतना कष्ट उठाकर आज स्कूल आयी है| इन पैसो से ही तो वह गर्म कपड़े खरीदेगी|

"क्या हुआ रूबी? तबीयत ख़राब है ?" रूबी को वही खड़ी देख सर जी ने रूबी से दुबारा पूछा|

"हमर पैसा, सर जी !" रूबी कि आशा टूटती जा रही थी | सर जी कि सहानुभूति भरी बातो से उसकी आँखों में आंसू आ गये |



Hindi Story



"क्या, तुमको पैसा नही मिला ?" सर जी चौक कर बोले |

"नय सर जी ! हमर पैसा नय मिल्लय, जी |" (नहीं जी, मुझे पैसा नही मिला|) रूबी बहुत ताकत लगाकर धीमी आवाज में बस इतना ही बोल पायी |

"कहा थी तुम ? क्या कही खेल रही थी ?..... अच्छा, चल हेडमास्टर के पास चलते है | तुमको पैसा दिलवाते है|"

सर जी आगे-आगे, भोली-भाली सी छोटी रूबी सर जी के पीछे-पीछे हेड सर जी के ऑफिस तक | रूबी कि टूटती हुई आस जाग गई | जैसे तेल के अभाव में बुझते हुए दिये में किसी ने थोड़ी सी तेल डाल दि हो और दीया में एक बार फिर थोड़ी सी लौ तेज हो गयी|

"सिन्हा जी, जरा देखिये तो| इस बच्ची को पैसा नही मिला है |" भोला सर हेड सर के ऑफिस में अंदर जाते ही बोले, "बेचारी कितनी घबराई हुई है | अब तक यह घर नही गई है |"

"कहा थी, अब तक तुम, रूबी ?" भोला सर के पीछे खड़ी रूबी से हेड सर ने पूछा |

हेड सर कि बात सुनकर रूबी और घबराई मगर उसे कोई जबाव नही सुझा | वह चुप रही |

"बात कर रही होगी क्लास में सहेली से या खेल रही होगी | है न ! रूबी !" भोला सर रूबी कि ओर देखते हुए बोले | बदले में रूबी ने अपना सिर 'नहीं' में हिलाया |

"अच्छा, कोई बात नहीं है | घबराओ मत | हेड सर अभी रजिस्टर देख रहे है | तुमको अभी पैसा मिल जायेगा, ठीक है |"



जब तक सांस है तब तक आस है - Short Story In Hindi



भोला सर कि बात पर रूबी 'हाँ' में अपना सर हिलाया | उस समय भोला सर कि बाते रूबी को अमृत के समान लग रहे थे |

"और हाँ, पैसा लेकर सीधे घर चले जाना | अँधेरा होने वाला है | तुम्हारा गांव भी दूर है | रास्ते में कही भी नहीं रुकना | नहीं तो बच्चा समझकर कोई पैसा छीन लेगा | समझी रूबी |"

बदले में, रूबी ने अपना सिर एक बार फिर 'हाँ' में हिलाया | भोला सर की बाते रूबी के लिए संजीबनी बूटी की तरह काम कर रहा था | ख़त्म होती आस अब लौट चुकी थी| चेहरे पे उम्मीद की किरण और आँखों में चमक| देर से ही सही मगर उसे पैसा तो मिलेगा| ठंड का क्या | ठंड तो आता - जाता रहता है| पैसा मिलते ही वह सीधे घर जाएगी और माँ को पैसे देगी | पेट में चुभन भी हो रही है | कोई बात नही | माँ उसे गरम - गरम खाना खिलायेगी | वह माँ से भात-दाल और आलू का भरता बनाने को कहेगी | फिर उसके लिए माँ भात - दाल और आलू का भरता बनाएगी | उसको खाना देगी | हाँ, वह तो माँ की गोद में बैठकर ही खाना खायेगी | गरम - गरम भात - दाल, आलू का भरता खाकर वह ठंड को भूल जाएगी | फिर वह माँ की गोद में आराम करेगी |

अभी रूबी ऐसा सोच ही रही थी | तभी हेड सर रजिस्टर पलटते हुए उदास हो गए |

"क्या हुआ हेड मास्टर साहब ?" भोला सर ने हेड मास्टर साहब से पूछा |

रूबी चौकी | हेड सर का चेहरा देख कर दुबारा जगी आस टूटती हुई जान पड़ी |

"रूबी की तो हाजिरी ही कम है | अब पैसे इसको कैसे दें |" हेड मास्टर साहब रजिस्टर पलटते हुए कहा |

हेड मास्टर साहब की बात सुनकर भोला सर भी दुखी हो गए | वे जानते थे की इतनी ठंड में भी रूबी पैसे के लिए ही रुकी हुई है| अब अगर रूबी को पैसा नही मिला तो उसपर क्या बितेगी |

रूबी हेड सर की बात सुनकर स्तब्ध हो गयी | उसके पास बोलने की लिए कोई शब्द नही थे | हमेशा खुश रहनेवाला चेहरा अब स्याह पड़ चूका था | रूबी का छोटा सा मासूम चेहरा आँसुओ से भरा था |



जब अचानक से कोई आशा टूटती है - Hindi Kahani



उम्मीद या आशा में वो शक्ति है जो एक कमजोर को भी बलवान बना देता है | लेकिन जब यही उम्मीद या आशा अचानक से टूटता है तब एक बलवान से बलवान प्राणी भी निर्बल, क्षीण - हीन हो जाता है | यह कीमत वसूलना जानता है | यदि यह प्राणी को शक्ति देता है तो निर्बल भी यही बनाता है |

" रूबी बेटी.................!" भोला सर अपने पीछे खडी रूबी की ओर मुड़कर |

रूबी के सारे सपने टूट चुके थे | उसकी उम्मीदे सर्द हवाओ में तैर रहे थे | रूबी को अब मास्टर जी की आवाजे सुनाई नही पड़ रही थी |



रूबी कुछ समझ नही पा रही थी | बस वह लगातार घर की ओर भाग रही थी | दौड़ रही थी अपने घर की ओर | अपनी माँ की गोद में सोने के लिए | पेट में सुई - सी चुभन | फिर भी दौड़ रही थी वह | ना जाने कहाँ से उसमे इतनी शक्ति आ गयी थी |

हलकू चाचा का घर पार कर गया | चुड़ैल वाली नीम - पीपल का गाछ (पेड़) आने वाला है और तेजी से होती अँधेरा | मगर कोई फर्क नहीं पड़ता | रूबी तो दौड़ रही है और अब तो चुड़ैल वाली नीम - पीपल का गाछ भी पार कर गया | कजरी भी अपनी दोनों छोटे - छोटे बच्चो के साथ रूबी के पीछे - पीछे दौड़ने लगी | मगर रूबी न रुकी न कुछ बोली |

पडोसी का घर | अपने घर के बाहर खूंटे से बंधी गाय | मगर रूबी तो भाग रही है | उसका कही रुकने का नाम नहीं | रूबी को किसी से कोई मतलब नहीं |

रूबी के घर का दरवाजा | अब रूबी अपने घर के अंदर | माँ की गोद और फिर रूबी सो गई --- हमेशा हमेशा के लिए | दूसरी दुनिया में जागने के लिए |

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शांम होने वाली है | रूबी का शरीर माँ की गोद में | रूबी का पूरा शरीर माँ की आँचल से ढँका हुआ | मगर मुँह उघार | माँ के फटे आँचल से रूबी का चेहरा दिख रहा है| मानो कह रहा हो, "माय, हम आपके लिए नई साड़ी खरीदने के लिए पैसा नही ला पाये | हम परिस्थिति से हार गये | इस दुनिया में प्रेम की कोई पूछ नही | भावना की कोई क़द्र नही | हम थक गये है | अब हम थककर आराम कर रहे है | माय, आपकी आँचल की छाँव से ज्यादा सुकून हमको कहाँ मिलेगा | फटा ही सही,...... है तो माँ का आँचल.......!"

घर के ओसारा में बैठी माँ का ह्रदय -विदारक चीत्कार | गोधूलि वेला की घनघोर मायूसी | माँ की गोद में रूबी का शरीर | चारो दिशाओ में गुंजायमान होती माँ की करुण रोदन |


Mata Ka Aanchal - माता का आँचल


"रूबी ! उठ न बेटी........! बेटू...... ! उठ न !"

"हमर अच्छी बेटी ! उठ न नुनु.....!"

"तुम्हरे लिए गरम - गरम खाना बनाये है, बेटी !....उठ न हमर बच्ची |"

"खाना नही खायेगी ! उठ न रूबी ! बाहर तुम्हरे साथ खेलने कजरी आयी है | उठ न बेटी...!"

"खाना खा ले, बेटी !.....हमरा छोड़ के अकेले - अकेले कहाँ चली गई मेरी बच्ची.....!"


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कल होकर राज्य के कुछ अखबारों में छपा | ----इस भीषण ठंडक ने राज्य में एक छः बर्ष की गरीब मासूम बच्ची की जान ले ली.......! लोगो ने एक निगाह उस पर दौड़ाया | फिर पेज पलट कर दूसरी चीज पढ़ने में व्यस्त हो गये.........!!!!!!


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- अब हम तो सफर करते हैं


अब हम सफर करते है

रहा बेचैन हमेशा, इस बर्बाद दुनिया में

मर कर ही सही, चैन तो मिला हमको

जी कर नहीं, चिरनिद्रा में सोकर चैन तो मिला हमको

क्या गम है, अगर कफ़न भी न मिला तन ढकने को हमको

पर ये क्या कम है,

कफ़न के बदले, फटा ही सही

मगर माँ का आँचल तो प्रारब्ध से मिला ही हमको |


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फटा आँचल......!!

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