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ऐसे करें आर्किड के फूल की फार्मिंग

ऐसे करें आर्किड के फूल की फार्मिंग-1

The Complete Information about Orchid Farming in Hindi


आपने आर्किड का नाम अवश्य सुनी होगी! हो सकता है, आपने उसे देखी भी होगी, प्रत्यक्ष आँखों के सामने न सही कम से कम कही चित्र में तो अवश्य देखी होगी। तो यहाँ हम उसी आर्किड और उसकी खेती के बारें में आवश्यक जानकारी बतला रहें है। लेकिन उससे पहले आर्किड से जुड़ी कुछ महत्वपूर्ण जानकारी पर ध्यान देना आवश्यक है:-


आर्किड क्या है? Orchid Tree In Hindi

आर्किड एक प्रकार का फूल है। आर्किड के पेड़ को ऑर्किडेसिया (Orchidaceae) परिवार का हिस्सा माना जाता है। जबकि आर्किड की गिनती दुर्लभ पेड़ो में होती है। आर्किड के फूल (Orchid Ke Phool) अपनी प्रजाति के अनुसार अलग अलग रंगो में देखने को मिलते है। सामान्यतः यह लाल, गुलाबी, नीला, पीला, हरा, बैंगनी कत्थई, काला और उजले रंग के होते है। लेकिन आर्किड कि विशेषता यह है कि इसके फूल एक रंग के भी होते है और बहुरंगी भी होते है। आर्किड के पेड़ व उसपर फलने वाले फूल का आकार - प्रकार, रंग-रूप एवं प्रकृति इसकी प्रजाति तथा जलवायु के ऊपर निर्भर करती है। आर्किड को नमी / आद्रता (humidity) बहुत अधिक पसंद है। आर्किड की कई प्रजातियां पत्तियां विहीन होते है।


आर्किड की हिंदी - Orchid In Hindi

आर्किड को हिंदी में भी आर्किड ही कहते है। आर्किड पर शोध करने वाले वैज्ञानिको ने इसके जीवाश्म का अध्ययन करके पता लगाया कि आर्किड पृथ्वी पर लाखो बर्षो से है।


क्या आर्किड को घर में लगाया जा सकता है?

आर्किड को लोग अपने उद्यानों में, घरो के आँगन में, बालकनी में या फिर घर की खिड़की जैसे स्थानों पर लगाते है। देश - विदेश में आर्किड की बड़े पैमाने पर वैज्ञानिक विधि से खेती भी होती है। हालांकि आर्किड की खेती का एकमात्र उद्देश्य इसका व्यवसाय करना होता है। लेकिन इसके बावजूद आर्किड के लिए ये सभी आवास प्राकृतिक आवास नहीं है। आर्किड का प्राकृतिक आवास बिलकुल अलग होता है। इसके अपने प्राकृतिक आवास पर उगने या खिलने के तौर तरीके सामान्य पेड़ पौधों से बिलकुल अलग है। इसकी प्रकृति दूसरे पेड़ पौधों से बिलकुल ही अलग है। अब यही कारण है कि आर्किड दूसरे फूल के पेड़ पौधों से बिलकुल अलग है। जैसे आर्किड के फूल चिरजीवी होते है। अर्थात यदि परागण न हो तो आर्किड के फूल डेढ़ से दो महीने या फिर उससे भी अधिक समय तक बिना मुरझाये अपनी चमक से वातावरण में आनंद बिखेड़ता रहता है। हालाँकि यह बात आर्किड के आवास और उसके रख-रखाव के ऊपर निर्भर करता है।


आर्किड कहां उगता है?

आर्किड एक जंगली फूल है और यह अंटार्कटिका महादेश को छोड़कर समूचे विश्व में पाया जाता है। लेकिन फिर भी यह उष्णकटिबंधीय और समशीतोष्ण क्षेत्रो में अधिक पाया जाता है और वैसे स्थानों पर यह अधिक फलता फूलता है। मूल रूप से आर्किड ठन्डे स्थानों पर, घने जंगलो के पेड़ो की छाँव में, वृक्षों की शाखाओ पर अथवा दूसरे घने वृक्षों का आश्रय लेकर उगने वाला एक प्रकार का फूल का पौधा है। यह एक परजीवी पेड़ है, जो बड़े बड़े पेड़ की शाखाओ, उनकी जड़ो पर स्वतः उग आता है। हालांकि ऐसी स्तिथि में यह मुख्य वृक्ष को भी कोई क्षति नहीं पहुंचाता है। मुख्य वृक्ष को बिना हानि पहुचायें यह अपना विकास करता है और मध्यम समय तक जीवित रहता है। अब अगर कोई इन्हे अपने घरो में एक सामान्य फूल के पेड़ की भांति लगाता है, तो यह हरगिज नहीं लगेगा। क्योंकि पहली बात यह है कि घर का वातावरण आर्किड के लिए अप्राकृतिक वातावरण है। यह उसके मूल प्राकृतिक आवास से ठीक विपरीत वाला आवास है। इसलिए यदि कोई आर्किड को अपने घर के उद्यान में, आँगन में या फिर गमले में लगाता है, तो उसे उसके मूल वातावरण जैसी सुविधा देने की कोशिश करनी चाहिए। तभी आर्किड फलता - फूलता है।


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आर्किड के प्रकार (वंश / कुल / जाति)

A. मोनोपोडियल आर्किड (Monopodial Orchid)

B. सिम्पोडियल आर्किड (Sympodial Orchid)

बनावट के आधार पर आर्किड के मुख्य प्रकार में मोनोपोडियल (Monopodial) और सिम्पोडियल (Sympodial) के नाम आते है।

A. मोनोपोडियल आर्किड (Monopodial Orchid) - इसमें एक तना होता है और इसी एक तने में केवल एक पुष्प उगता है। मोनोपोडियल आर्किड केवल एक पुष्प के साथ बढ़ता है। वास्तव में, यह एकशाखीय होता है अर्थात ऐसे आर्किड के एक पेड़ पर केवल एक तना होता है और उसपर केवल एक फूल ही खिलता है।

B. सिम्पोडियल आर्किड (Sympodial Orchid) - यह आर्किड का दूसरा वंश है। यह आर्किड मोनोपोडियल आर्किड के विपरीत बहुशाखीय होता है। व्यवसायिक दृष्टि से आर्किड का यह किस्म अधिक उपयोगी है। देशी - विदेशी बाजारों में इसी जाति के आर्किड की अधिक मांग है। इसमें अनेक प्रजातियां पायी जाती है। इन्ही प्रजातियों में सिम्बिडियम (Cymbidium Orchid) और डेंड्रोबियम (Dendrobium Orchid) व इन दोनों की संकर किस्म के पौधों को अधिक उगाया जाता है।

1. सिम्बिडियम आर्किड (Cymbidium Orchid) अथवा, Boat Orchid

2. डेंड्रोबियम आर्किड (Dendrobium Orchid)


1. सिम्बिडियम आर्किड (Cymbidium Orchid) - सिम्बिडियम आर्किड को Boat Orchid के नाम से अधिक जाना जाता है। सिम्बिडियम आर्किड के डंडियों में घने व झुके हुए फूल खिलते है। ये फूल विभिन्न व विचित्र रंगो में होते है। अर्थात ये बहुरंगी फूल होते है, जो अनायास किसी का भी मन मोह लेते है।

सिम्बिडियम आर्किड (Cymbidium Orchid) अथवा, Boat Orchid की कुछ प्रजातियां - सिम्बिडियम पिकलेंडी, सिम्बिडियम सनगोल्ड, सिम्बिडियम लोविनम, सिम्बिडियम एलेक्जेंडरी, सिम्बिडियम कैरिसबुक, सिम्बिडियम टेड ब्यूटी, सिम्बिडियम वैल्टिक, सिम्बिडियम किंग अर्तुर, सिम्बिडियम टस्टोन महोगनी, सिम्बिडियम स्कॉट्स सनराइज अरोरा, सिम्बिडियम मोरिह हिन्दू इत्यादि किस्म व्यावसायिक स्तर पर उपजाए जाते है एवं देशी व विदेशी बाजारों में इनकी बहुत मांग है।

2. डेंड्रोबियम आर्किड (Dendrobium Orchid) - आर्किड के इस प्रजाति के फूल अत्यंत मनभावन होते है। इसकी सुंदरता अद्भुत होती है। इसकी भव्य सुंदरता सबका मन मोह लेता लेती है। यह जहाँ भी होता है, वहां की सुंदरता को कई गुना बढ़ा देता है। इसके फूल भी बड़े बड़े होते है और इतना ही नहीं इनके फूल पेड़ पर एक से दो महीने तक बिना मुरझाये खिले रहते है। इस कारण आर्किड की दुनियां में डेंड्रोबियम का विशेष स्थान है।

डेंड्रोबियम आर्किड (Dendrobium Orchid) की कुछ प्रजातिय - डेंड्रोबियम विगेनी, डेंड्रोबियम सायवेली ओकउड, डेंड्रोबियम कुलथाना, डेंड्रोबियम वेलवेट, डेंड्रोबियम टोभी, डेंड्रोबियम ब्लॉसम, डेंड्रोबियम हनीलीन, डेंड्रोबियम ओरिएण्टल ब्यूटी, डेंड्रोबियम सेलर बॉय, सोनिया 17, सोनिया 17 म्युटेंट, हींग ब्यूटी, रीन्नपा, इकोपोल पांडा, सकुरा पिंक, पारामोट सबीन, इमावाइट इत्यादि किस्म व्यावसायिक स्तर पर उपजाए जाते है एवं देशी व विदेशी बाजारों में इनकी बहुत मांग है।

सिम्पोडियल (Sympodial) आर्किड की ये दोनों प्रजातियां व उनसे निकले संकर नस्ल बड़े ही आकर्षक होते है। लोग अपने घरो में भी इन्ही प्रजातियों को लगाना पसंद करते है। इनके फूल अत्यंत मनभावन होते है। इनके फूल बड़े और घने होते है। इनके फूल अद्भुत सुन्दर होते है, जो किसी स्थान की सुंदरता को कई गुना बढ़ा देते है। इतना ही नहीं इनके फूल पेड़ पर बिना मुरझाये लम्बे समय तक खिले रहते है। इससे इनकी उपयोगिता कई गुना बढ़ जाती है।


Orchid Plant In Hindi


प्रकृति के आधार पर आर्किड के तीन प्रकार है:-

(क). एपिफाइटिक आर्किड (Epiphytic Orchid) - ऐसे आर्किड वृक्षों की शाखाओ पर उगते है। ये अपनी जड़ो के द्वारा पेड़ की शाखाओ को पकड़े रहते है। ये आर्किड अपने पोषक तत्व ह्यूमस से ग्रहण करते है। आर्किड की दुनियां में इनकी संख्या सबसे अधिक है और भारत में पाए जाने वाले कुल आर्किड में इनकी भागीदारी 60 प्रतिशत से भी अधिक है।

(ख). स्थलीय आर्किड (Terrestrial / Overland Orchid) - ऐसे आर्किड सीधे भूमि पर उगते होते है। इनकी प्रकृति सामान्य पेड़ पौधों की भांति ही होती है। ये मिट्टी में उगते है और अन्य पेड़ पौधों की भांति मिट्टी से ही पोषक तत्व ग्रहण करते है। ऐसे आर्किड ज्यादातर समशीतोष्ण क्षेत्र में होते है। जहाँ तक संख्या की बात की जाएँ तो एपिफाइटिक आर्किड के बाद इन्ही आर्किड का स्थान आता है।

(ग). माइकोहेट्रोट्राफिक आर्किड (Mycoheterotrophic Orchid) - ये आर्किड समशीतोष्ण व उष्णकटिबंधीय क्षेत्रो में पाए जाते है। ये आर्किड परजीवियों के साथ बढ़ते है और अपना पोषण कवक या संवहनीय पेड़ पौधों से प्राप्त करते है। आर्किड की इन तीन श्रेणियों में इनकी संख्या सबसे कम है।


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आर्किड की प्रजाति

आर्किड परिवार को लेकर बहुत धनी है। विश्व में इकलौता यह फूल का पेड़ है जिसमें सबसे अधिक प्रजातियां पायी जाती है। केवल भारत में ही इसकी 1300 प्रजातियां पायी जाती है जबकि विश्व में इसकी 25,000 प्रजातियां देखने को मिलती है।


आर्किड का उपयोग

आर्किड का पुष्प (Orchid Ka Pushp) अपनी सुंदरता व सुगंध के लिए जाना जाता है। आर्किड के इन्ही गुणों के कारण इसका प्रयोग इत्र बनाने में किया जाता है। साथ ही कुछ अलग किस्म के आर्किड से वैनिला भी तैयार किया जाता है। वैनिला एक प्रकार का सुगन्धित पदार्थ होता है और यह प्लैनिफोलिया की फली से निकाला जाता है। वैनिला आर्किड की ही एक प्रजाति है। आर्किड की इस प्रजाति से निकाले गए वैनिला का प्रयोग मिठाइयां व आइस क्रीम सहित अन्य कई खाद्य पदार्थो को स्वादिष्ट एवं मनभावन बनाने में होता है। इस तरह आर्किड सौंदर्य के प्रतिक होने के साथ साथ अन्य महत्वपूर्ण वस्तुओ के उत्पादन में कच्चे माल के रूप में भी उपयोग में लाये जाते है। इस तरह आर्किड का उपयोग हर्बल दवाओं, वेनिना, इत्र एवं त्वचा क्रीम के उत्पादन में होता है। इससे बने प्रोडक्ट्स बहुत महंगे होते है। इन प्रोडक्ट्स की राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में बहुत मांग है।


आर्किड को धूप की पड़ने वाली सीधी किरणों से बचाना होता है

ध्यान रहें, ज्यादातर आर्किड अधिक तापमान में या तेज धुप में या फिर धुप की पड़ती सीधी किरणों में नहीं होता है। सामान्यतः इसके लिए 18 डिग्री से लेकर 28 डिग्री तक का तापमान उचित माना जाता है। लेकिन इसका यह अर्थ नहीं है कि इसे सूर्य की रोशनी से दूर रखा जाएँ। आर्किड के लिए सूर्य की रोशनी भी आवश्यक है। लेकिन यह रोशनी किसी परदे से छन कर आनी चाहिए या फिर किसी पेड़ की छाँह से छनकर आनी चाहिए। इस पर सूर्य की सीधी किरण नहीं पड़नी चाहिए। तभी आर्किड के पौधा का विकास हो पाता है।


आर्किड के लिए पोषक तत्व

ऑर्किड को समय समय पर उचित मात्रा में खाद (nutrition) की भी जरुरत होती है। वैसे बाजार में आर्किड फर्टलाइजर (Orchid Fertilizer) भी उपलब्ध है। आर्किड के लिए वैसे फर्टलाइजर का प्रयोग किया जाता है जो पानी में घुलनशील (Water soluble) होते है। इन फर्टलाइजर को पानी में मिलाकर पौधे के ऊपर विशेषरूप से पत्तो के ऊपर छिड़काव करना चाहिए। ध्यान रहें, इसपर सामान्य फर्टिलाइजर का प्रयोग नहीं करना चाहिए। केवल आर्किड फर्टलाइजर का ही छिड़काव करना चाहिए। अच्छे फूल के लिए आर्किड पर फर्टलाइजर का छिड़काव सप्ताह में एक से दो बार किया जाना आवश्यक है।


आर्किड को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती

आर्किड के पेड़ (Orchid Tree) को अधिक पानी की आवश्यकता नहीं होती है। गर्मी के दिनों में सप्ताह में तीन या चार दिन तो सामान्य दिनों में सप्ताह में तीन दिन ही इसमें पानी देना चाहिए। लेकिन फिर भी यह वहां के वातावरण के ऊपर निर्भर करता है। कही कही तो इसमें रोज सुबह पानी भी दिया जाता है। लेकिन यह गर्म क्षेत्रो के लिए है। इसपर सामान्य पेड़ पौधों की भांति पानी नहीं दिया जाता है और पानी देने का तरीका भी अलग है। इसपर पानी का बहुत हल्का हल्का छिड़काव किया जाता है। यह छिड़काव पत्तो व जड़ो के ऊपर ही किया जाता है, फूलो पर पानी का भी छिड़काव नहीं किया जाता है।


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आर्किड मिट्टी में नहीं लगाया जाता

आर्किड को लगाने के लिए सामान्य पौधों (Normal Plant) की भांति मिट्टी की आवश्यकता नहीं होती है। क्योंकि आर्किड को मिट्टी में नहीं लगाया जाता है। नर्सरी से लाने के बाद इसको ऐसे गमले में रख देना चाहिए, जिसमें कई छिद्र हो। अगर गमले में पहले से कम छिद्र है तो उसमें छिद्र कर देना चाहिए। क्योंकि आर्किड के जड़ो को वायु की बहुत अधिक आवश्यकता होती है और यह अपना पोषक तत्व मिट्टी से नहीं बल्कि वायु से व समय समय पर उस पर छिड़के गए (Spray) उर्वरक (Fertiliser) से प्राप्त करता है।

हालांकि आर्किड की कुछ किस्मों को मिट्टी में लगाया जाता है और ऑर्किड के वे पौधे दूसरे सामान्य पेड़ पौधों की भांति अपना पोषक तत्व मिट्टी से प्राप्त करते है।


आर्किड से कमाई

आर्किड कमाई का भी एक प्रमुख स्त्रोत है। जमीन के एक छोटे से टुकड़े पर की गई आर्किड की खेती से प्रत्येक बर्ष 7 लाख से 8 लाख तक की कमाई होती है। आर्किड के फूलो की मांग राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में बहुत अधिक है। इनके फूल बड़े मंहगे दामों पर बिकते है। जिससे इसकी खेती करके कम समय में ही ढेर सारा पैसा कमाया जा सकता है। वास्तव में, इसकी क्योंकि इसकी खेती कोई सामान्य खेती नहीं है, इसकी खेती कोई बिजनेस से कम नहीं होती है। इसलिए इसमें कम से कम समय में बहुत सारा पैसा कमाया जा सकता है। इसके साथ ही इससे बने इत्र भी बड़े मंहगे होते है। साथ ही इससे बने वैनिला भी आय का प्रमुख स्त्रोत है। वैनिला एक ऐसा सुगन्धित पदार्थ है, जिसका प्रयोग मिठाइयां व आइस क्रीम सहित अन्य कई खाद्य पदार्थो को स्वादिष्ट बनाने में होता है। इसलिए इससे अच्छी आय भी होती है। इस तरह से आर्किड आय का भी साधन है।


देश की अर्थव्यवस्था में आर्किड का योगदान

देश की अर्थव्यवस्था को शक्ति देने में भी आर्किड का महत्वपूर्ण योगदान हो सकता है। बशर्ते, इसके सही विकास पर ध्यान दिया जाएँ। इसी उद्देश्य की पूर्ति हेतु कुछ बर्षो पहले चंडीगढ़ की पंजाब यूनिवर्सिटी के वनस्पति विज्ञान को एक प्रमुख सफलता मिली है। यहाँ के वनस्पति विज्ञान के प्रयोगशाला में आर्किड की कई लुप्त होती प्रजातियों को टेस्ट ट्यूब से तैयार किया। इससे यह लाभ मिलेगा कि अब इस तकनीक के माध्यम से इन प्रजातियों के फूल को बहुत ही कम समय में तैयार किये जा सकते है। इस शोध से ऑर्किड के पुष्पों को लगाना व उनकी संख्या को बढ़ाने में महत्वपूर्ण सहयोग मिलेगा और इससे घरेलु खपत के लिए आर्किड को अतिरिक्त आयात नहीं करना पड़ेगा साथ ही संख्या में और अधिक वृद्धि करने के बाद इससे बने प्रोडक्ट को बड़ी संख्या में विदेशो को निर्यात भी करना आसान होगा। जिससे देश की अर्थव्यवस्था को विदेशी मुद्रा की प्राप्ति होगी और देश की अर्थव्यवस्था को शक्ति मिलेगी।


वैज्ञानिको ने अपने अथक प्रयास से आर्किड की दुर्लभ प्रजातियों में सीता पुष्प और द्रोपदी पुष्प को पुर्नजीवित किया

आर्किड (Orchid Ke Phool) की कई प्रजाति दुर्लभ है। इन्हे तलाशने पर भी ये कठिनाई से देखने को मिलते है। आर्किड की इन्ही दुर्लभ प्रजातियों में सीता पुष्प और द्रोपदी पुष्प भी है। जैसा की इनके नाम है, जिससे स्पष्ट होता है कि इन पुष्पों का माता सीता से और द्रोपदी से कोई रिश्ता रहा होगा। कहते है कि आर्किड की इन पुष्पों को माता सीता और द्रोपदी सौंदर्य के लिए अपने बालो में लगाया करती थी। इसलिए आर्किट के इन प्रजातियों के नाम माता सीता और द्रोपदी के नाम पर है। अब इन्ही दुर्लभ प्रजातियों को वैज्ञानिको ने अपने अथक प्रयास से टेस्ट ट्यूब के माध्यम से तैयार कर ली है। अब इसे मात्र छः से नौ माह में ही तैयार किये जा सकते है।

वैज्ञानिक कई दशकों से इस पर शोध कर रहे है। दरअसल में, आर्किड पुष्प एक दुर्लभ पुष्प है जो जंगलो में भी बहुत ढूंढने से ही मिल पाते है। इतना ही नहीं इसके एक पुष्प बनने में भी बर्षो लग जाते है। इसलिए समय की मांग थी कि ऐसी कोई तकनीक विकसित किया जाएँ जिससे इसे कम समय में ही तैयार किया जा सकें। इसी को देखते हुए वैज्ञानिको की टीम कई दशकों टेस्ट ट्यूब के माध्यम से कम समय में आर्किड के दुर्लभ प्रजातियों को तैयार करने का काम कर रहे है।


भारत में आर्किड का भविष्य

आर्किड के पुष्पों (Orchid's Flower) की देशी व विदेशी बाजारों में बहुत अधिक मांग है। भारत के घरेलु बाजारों में ही इसकी इतनी मांग है कि भारत को हर बर्ष बहुत सारा पुष्प विदेशो से आयात करना पड़ता है। भारत में हर बर्ष थाईलैंड, हालैंड सहित अन्य कई देशो से आर्किड के फूलों की बड़ी संख्या में आयात किया जाता है। बता दें,थाईलैंड को आर्किड का सबसे बड़ा उत्पादक देश माना जाता है। इतना ही नहीं थाईलैंड विश्व में आर्किड का सबसे बड़ा निर्यातक भी है। थाईलैंड को प्रत्येक बर्ष आर्किड के निर्यात से बड़ी मात्रा में विदेशी मुद्रा प्राप्त होता है।

आर्किड से हजारो सौंदर्य प्रसाधन तैयार किये जाते है और ये सभी बाजार में बहुत महंगे मूल्यों पर उपलब्ध है। इतना ही नहीं समय के साथ इनकी मांगो में लगातार वृद्धि होती जा रही है। इसलिए भारत में आर्किड के विकास की बहुत आवश्यकता है। इससे न केवल देश की जरूरतों को पूरा किया किया जा सकता है बल्कि विदेशो पर निर्भरता को भी कम किया जा सकता है। इतना ही नहीं इसका विकास करके इसे निर्यात भी किया जा सकता है। जिससे देश को अरबो डॉलर की कमाई हो सकती है। बता दें, पश्चिमी देशो की अर्थव्यवस्था में यह पुष्प आय का एक महत्पूर्ण साधन के रूप में उभरा है। इसके अलावे थाईलैंड, ताइवान, सिंगापुर सहित विश्व के कई देशो की अर्थव्यवस्था में आर्किड का महत्वपूर्ण योगदान है। इसलिए इस क्षेत्र में रोजगार व आय की अपार संभावनाएं है।


राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में आर्किड के पुष्प (Orchid Flower) की कीमत

अंतर्राष्ट्रीय पुष्प बाजारों में आर्किड की उच्च गुणवत्ता वाली प्रति डंडी का मूल्य 200 रूपये से लेकर 1800 रूपये तक निर्धारित है। जबकि घरेलु बाजारों में आर्किड के फूलो वाले एक डंठल (stipe) का थोक मूल्य 20 से 30 रूपये तक निर्धारित है। जबकि पीक सीजन में इसकी रेट कई गुना बढ़ जाती है। आपको जानकार आश्चर्य होगा कि पीक सीजन में आर्किड के फूलो वाले एक बंडल का खुदरा मूल्य दिल्ली, मुंबई, पुणे जैसे शहरो में 1500 रूपये तक पहुंच जाता है।

इसके महत्व का अनुमान केवल इसी बात से लगाया जा सकता है कि अंतर्राष्ट्रीय पुष्प बाजार (Internation Flower Market) में आर्किड की गिनती दस शीर्ष पुष्पों में होती है। आर्किड कई देशो के राष्ट्रीय आय का प्रमुख साधन भी है। इसी बात को देखते हुए अब भारत में भी इसके विकास को बढ़ावा दिया जा रहा है। हाल के बर्षो में देश के कई शहरों में ऑर्किड व्यावसायिक फार्म की स्थापना की गई है। इससे देश को अन्तर्राष्ट्रीय पुष्प बाजारों में अपनी पहचान बनाने में सहायता मिली है। इसका परिणाम यह हुआ कि जहाँ कुछ बर्षो पहले तक विश्व पुष्प बाजारों में भारत की हिस्सेदारी लगभग न के बराबर थी वही अब उसमे तीव्र गति से वृद्धि होती जा रही है।


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ऐसे करें आर्किड के फूल की फार्मिंग-5

आर्किड की फार्मिंग : (Orchid Farming In India In Hindi)

आज बदलते समय में विभिन्न फूलों की खेती अच्छे आय के स्त्रोत बनते जा रहे है और इन फूलों के अंतर्गत यदि आर्किड की बात की जाएँ तो राष्ट्रीय व अंतर्राष्ट्रीय बाजारों में इसकी लगातार बढ़ती मांगो के कारण यह और अधिक महत्वपूर्ण हो गया है। इससे बहुत अधिक लाभ प्राप्त किया जा सकता है और कम समय में ही अधिक धन कमाया जा सकता है। भूमि के छोटे से टुकड़े पर ही आर्किड की खेती करके महीने के कई लाख कमाए जा सकते है। इसलिए यह भारत के किसानों के आय बढ़ाने के लिए भी एक रामवाण पुष्प है। लेकिन इसके लिए आवश्यक है कि उन्हें इन फूलों की खेती की तकनीक की अच्छी जानकारी होनी चाहिए क्योंकि आर्किड को उगाना एक सामान्य फूल के उगाने की प्रक्रिया से कही अधिक जटिल और खर्चीला है। इसके लिए आरम्भ में उन्हें विशेषज्ञों का भी सहयोग लेने की भी आवश्यकता होती, तभी वे अधिक गुणवत्ता के साथ इसका अधिक पैदावार कर सकते है। एक बार पैदावार शुरू हो जाने के बाद भूमि के छोटे टुकड़े से ही लगाए गएँ आर्किड से हर महीने कई लाख कमाएं जा सकते है।


आर्किड के फूल (Orchid Flower) की खेती कैसे करें

आर्किड की अच्छी खेती (Orchid Ki Kheti) के लिए एक ग्रीन हॉउस की आवश्यकता होती है। इसका अधिकांश भाग नेट से ढका होता है। ताकि आर्किड को सूर्य की पड़ने वाली सीधी किरणों से बचाया जा सकें। जरूरी नहीं है कि यह छाया घर हरे परदे से ढका हो। हरे के बदले किसी भी रंग के परदे से इसे ढका जा सकता है। लेकिन ऊपर छत के लिए पर्दो का दो लेयर देना आवश्यक है। इसमें ब्लेक और रेड कलर का प्रयोग किया जा सकता है।

इस नेट हॉउस में आर्किड को बड़ी ही सावधानी से लगाया जाता है। और उसी अनुसार इसकी देखभाल की जाती है जैसा इसको अपने मूल प्राकृतिक आवास में प्राप्त होता है। इसलिए आर्किड की खेती एक सामान्य फूल या कोई फसल की खेती से बिलकुल भिन्न होती है।

सबसे पहले इसके लिए एक शेड नेट हॉउस (Shade Net House) तैयार करना होता है। इसको हिंदी में छाया घर (Shade House) के नाम से भी जाना जाता है। तो कुछ लोग इसे नेट हाउस (Net House) के नाम से भी जानते है।

इस बात का ध्यान रखना होता है कि नेट हॉउस (छाया घर) का 75 प्रतिशत भाग ढंका होना चाहिए। यानि इस घर का तीन चौथाई भाग नेट से ढंका होना चाहिए।


आर्किड के फूल की खेती

इसकी खेती जमीन से थोड़ी ऊपर बेंच पर होती है।

इसलिए उस नेट हाउस के अंदर कुछ कुछ दुरी का अंतराल लेते हुए पुरे घर में बेंच बनाना होता है। क्योंकि आर्किड की अच्छी खेती के लिए इसे भूमि से थोड़ी ऊपर करके लगाया जाता है। इसी कारण बेंच की आवश्यकता होती है। एक नेट हाउस में इन बेंचो की संख्या बहुत सारी हो सकती है। यह जमीन के क्षेत्रफल के ऊपर निर्भर करता है। एक बेंच की दुरी दूसरी बेंच से इतनी अवश्य होनी चाहिए कि आसानी से किसी का आना जान सम्भव हो सकें।


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ऐसे करें आर्किड के फूल की फार्मिंग-6

आर्किड की अच्छी व गुणवत्ता वाली खेती के लिए इसको भूमि से ऊपर बेंच पर लगाया जाता है। इसका कारण यह है कि आर्किड की खेती एरोपोनिक तकनीक (Aeroponic Technology) पर आधारित होती है। क्योंकि आर्किड हवा के द्वारा भोजन प्राप्त करता है न की दूसरे पौधे की तरह मिट्टी के द्वारा। आपको बता दें, एरोपोनिक तकनीक वृक्ष उगाने की आम तकनीक से बिलकुल अलग विधि पर आधारित है। इसमें मिट्टी का प्रयोग नहीं होता है। साथ ही इसमें अनाश्यक पानी का भी प्रयोग नहीं होता है और पानी की बचत होती है। साथ ही सिचाई पर लगने वाला खर्च भी बच जाता है।

अब उन बेंचो पर तार की लड़ी (wire rope) खींची जाती है और उसे नेट के आकार में बदल दिया जाता है।

अब उन बेंचो पर बंधे गए तार की मजबूत लड़ी (wire rope) पर मोटी पॉलीथिन (Polythene) या प्लास्टिक (Plastic) की चादरें बिछा दी जाती है, ताकि नीचे की भूमि से कोई भी खर-पतवार (Weed) आर्किड की जड़ो तक न आ सकें।

अब आर्किड के चार पौधों को मिलाकर एक खंड (Block) बना लिया जाता है। पौधे के इस खंड की लम्बाई और चौड़ाई दोनों एक-एक फीट की होती है। यानि प्रत्येक खंड वर्गाकार (square) होता है। पौधे के इस खंड को बांधने के लिए रस्सी के तौर पर प्लास्टिक पैकिंग रोप (Plastic Packing Rope) का प्रयोग किया जा सकता है।

अब ईधर बेंच पर बिछी पॉलीथिन या प्लास्टिक पर नारियल के बाहरी खोल के समूह को रख दिया जाता है। नारियल के ये वही बाहरी खोल होते है, जिसमें रेशा-रेशा होता है और जिसको नारियल निकालने के बाद बेकार समझकर फेंक देते है। दरअसल आर्किड के बंधे हुए पौधों के समूह को नारियल के इन्ही खोल (Coconut Fibre) में रखा जाना है। नारियल के इन खोलो को टुकड़े तड़के करके उस पॉलीथिन पर रख दिया जाता है। इसके साथ ही नारियल के बाहर से गुदा को हटाने समय जो टुकड़ा (Chips) निकलता है, उसे भी टुकड़े टुकड़े करके इसमें मिला दिया जा सकता है। नारियल के खोल यदि उपलब्ध नहीं है तो उस परिस्थिति में लकड़ी के कोयले का भी प्रयोग किया जा सकता है। उस परिस्थिति में लकड़ी के कोयले (Charcoal) के समूहों को भी उस पॉलीथिन पर रखा जा सकता है। अथवा दोनों-तीनो के टुकड़ो को मिलाकर भी इसका प्रयोग किया जा सकता है। यह मीडियम आर्किड में नमी / आद्रता (humidity) बनाये रखने में सहायता करता है क्योंकि इसे नमी / आद्रता (humidity) अधिक पसंद है। ध्यान रहें, आर्किड की खेती में मिट्टी का प्रयोग बिलकुल भी नहीं होता है।

अब चार - चार पौधों के समूहों को, जिसको प्लास्टिक की रस्सी से अच्छी तरह से बांधा गया है, उसे बेंच पर रखे इन्ही नारियल के खोलो या लकड़ी के कोयले के ऊपर रख दिया जाता है।

इस प्रकार, अब आर्किड के पौधों का आधार (सेट-अप) तैयार हो जाता है।

अब जब प्लांटिंग हो चुकी है तो अब इसमें नियमित उर्वरक (Fertiliser) देने की आवश्यकता होती है। जिससे इसे पोषक तत्व की आपूर्ति होती रहें।


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ऐसे करें आर्किड के फूल की फार्मिंग-7

खाद (Nutrition) के तौर पर इसमें पानी में घुलशील होने वाला (Water Soluble) उर्वरक (Fertiliser) ही दिया जाता है।

इसके बाद एक लीटर पानी में दो ग्राम – ‘एन पी के’ (N-P-K उर्वरक) - को मिलाकर इन पौधों के ऊपर छिड़काव (Spray) करते है। ध्यान रहें, इसमें पौधों के पत्तो पर छिड़काव (Folier Spray) करते है और इसी से इसे महत्पूर्ण पोषक तत्व मिलता है। अन्य तत्व यह हवा से प्राप्त कर लेता है।

आतमौर पर पौधों के पत्तो पर यह स्प्रे सप्ताह में दो बार किया जाता है। वैसे यदि स्प्रे फूल पर भी होता है तो कोई विशेष हानि नहीं है मगर ज्यादातर स्प्रे पत्तो पर ही किया जाता है।

बारिश के समय में या अधिक नमी (Humidity) के कारण इसमें स्मेल और ‘डंठल का सड़ना’ जैसी समस्याएं आती है। ऐसी स्थिति में उसे मुख्य पौधे से अलग कर दिया जाता है। इससे पौधे के स्वस्थ्य भाग पर अच्छा प्रभाव पड़ता है और वो उन सड़े हुए भाग के संपर्क में आने से बच जाता है। इसके अलावे भी इसमें कई बार झुलसा रोग (Bacterial Blight), फूलो का सड़ना (Flower Rotting) जैसी भी समस्याएं आती है। इसके लिए एक लीटर पानी में स्ट्रेप्टोसाइक्लिन (Streptocycline) की एक ग्राम की मात्रा डालकर इसपर छिड़काव करना चाहिए। वास्तव में, स्ट्रेप्टोसाइक्लिन (Streptocycline) एक जीवाणुरोधी एंटीबायोटिक (Antibacterial Antibiotic) साल्ट है, जो पेड़ पौधों के जीवाणुजनित रोगो को दूर करने में काम आता है। मार्केट में इस साल्ट (Streptocycline) के साथ कई कंपनियां उपलब्ध है।

पौधे लगाने के बाद से तीन से छः माह में फूल आना शुरू हो जाता है और एक पौधे में प्रति बर्ष आठ से दस फूलो के डंठल (Stipe) की पैदावार होती है।

ध्यान रहें, आर्किड की खेती में मिट्टी का प्रयोग बिलकुल भी नहीं होता है। आर्किड की खेती मिट्टी रहित (Soilless) होती है। यह सॉइल लेस फार्मिंग (Soil less farming) है। आर्किड के पौधे को मिट्टी के स्थान पर सारी खुराक पोषक तत्वों के छिड़काव करके दी जाती है। इसके साथ ही यह हवा से भी आवश्यक पोषक तत्व प्राप्त कर लेता है।

जानकारी के लिए बता दें, 720 वर्ग फीट क्षेत्रफल में आर्किड को लगाने की सामान्य लागत तीन लाख से पांच लाख तक आती है।

रोपाई करने के तीन से छः महीने बाद से ही इस पर फूल आना शुरू हो जाता है। फूल डंढ़ल में लगते है। एक डंठल में कई फूल होते है।

आर्किड के एक पेड़ में प्रति बर्ष आठ से दस ऐसे फूलो से भरे डंठल उपजते है। लेकिन यह मात्रा आर्किड के पेड़ के वातावरण व देख-रेख के ऊपर निर्भर करता है।

'अब अगर बात करें कि आर्किड के एक डंठल में कितने फूल खिलते है!' तो बता दें कि यह बात आर्किड की प्रजाति पर निर्भर करती है। अलग - अलग प्रजाति के आर्किड के डंठल पर उगने वाले फूलो की संख्या भी अलग अलग होती है। सोनिया - 17 और सिंगापूर व्हाइट, आर्किड के दो अलग अलग अच्छे व उन्नत प्रजाति है। लेकिन इन दोनों प्रजातियों के एक डंठल पर उगने वाले फूलो की संख्या अलग अलग होती है। जहाँ सोनिया - 17 पर फूलो की संख्या दस से लेकर तरह तक होती है तो वही सिंगापूर व्हाइट पर फूलो की संख्या सोलह से लेकर अठारह तक होती है।

आर्किड के फूलो से भरे इन्ही डंठल की मांग है और इसी को बेचकर पैसा कमाया जाता है। आर्किड के फूलो की मांग केवल राष्ट्रीय ही नहीं है बल्कि अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर भी इसकी बहुत मांग है।

फूल तैयार होने के बाद अब इसकी कटाई (Harvesting) का समय आता है। यहाँ पर एक बात ध्यान देने वाली है यह है कि इस फूलो से भरे डंठल (Stipe) की कटाई के बाद उसकी पैकिंग उसी नेट हाउस के आस पास की जाती है ताकि उसे बाहर के वातावरण से सुरक्षित रखा जा सकें।


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ऐसे करें आर्किड के फूल की फार्मिंग-8

आर्किड के फूलो की कटाई के समय एक बात और ध्यान देने वाली है कि इसकी कटाई मार्केट को ध्यान में रखकर करना चाहिए। यदि दूर के बाजार (Distant Market ) में आर्किड को सेल के लिए भेजना है तो पौधे के डंठल के सबसे पहले वाले फूल (Floret) का मुँह खुलते (Open) ही उस डंठल की कटाई करके पैक कर देना चाहिए और अगर पास के बाजार में इसे सेल के लिए भेजा जाना हो तो सभी फूलो (Florets) के मुँह पूरी तरह से खुल जाने के बाद ही पैकिंग करनी चाहिए। ऐसा करने से इसकी गुणवत्ता और लुक्स ग्राहक को अधिक आकर्षित करती है जिस कारण फूलो से अधिक मूल्य प्राप्त किये जा सकते है।

‘थोक में इसको बेचने पर कितना कमाया जा सकता है!’ तो यह बात मार्केट पर निर्भर करती है। महानगरों में बेचने पर इससे अधिक कमाई होती है। जबकि छोटे व मंझोले शहरो में बेचने पर इससे कम कीमत प्राप्त होती है।


आर्किड की फार्मिंग में अर्निंग (Profit)

इसकी खेती में पहले बर्ष में पांच से छः लाख तक का लाभ होता है तो दूसरे बर्ष में सात से आठ लाख तक लाभ होता है और एक बार लगा देने के बाद इसपर छः से आठ बर्ष तक अच्छी क्वालिटी के फूल खिलते रहते है। इस प्रकार देखा जाएँ तो लागत केवल एक से डेढ़ बर्षो में ही निकल जाता है और फिर लाभ ही लाभ मिलता है।


आर्किड की खेती में कमियां

आर्किड की खेती एरोपोनिक तकनीक पर आधारित है। यह खेती करने का बिलकुल मॉडर्न तरीका है। इसलिए शुरूआती दौर में भूमि के एक छोटे से टुकड़े पर सेट अप तैयार करने की लागत बहुत अधिक आती है। लेकिन एक बार सेट अप तैयार करके इसे आरम्भ कर दिया जाएँ तो यह कई बर्षो तक चलता है और आर्किड की खेती में लगाई गई पूंजी मात्र एक से डेढ़ बर्ष में ही वसूल हो जाती है एवं फिर उससे छः से आठ बर्षो तक लगातार पैदावार होती रहती है। आर्किड की खेती से प्रति बर्ष लाभ इतना होता है जितना परम्परगत खेती में दो दशक में भी प्राप्त नहीं कर सकते है।


अंत में, चलते चलते इन बातों को भी ध्यान में रखें -

आर्किड की खेती शुरू करने से पहले ये भी सुनिश्चित करना आवश्यक है कि खेती करने वाले को आर्किड के पैदावार से लेकर आर्किड की मार्केटिंग तक की अच्छी जानकारी होनी चाहिए। वैसे इसके लिए विशेषज्ञों की भी सेवा ली जा सकती है। भारत में आर्किड से संबंधित विश्वस्तर के विशेषज्ञ है, जिनके पास आर्किड से संबंधित बहुत अच्छी तकनीकी जानकारी उपलब्ध है। इसके अलावे भारत में कृषि वैज्ञानिक भी विश्वस्तर के है। इसलिए आर्किड की खेती आरम्भ करने से पहले इन विशेषज्ञों से संपर्क करके उनसे भी राय ले लेनी चाहिए।

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ऐसे करें आर्किड के फूल की फार्मिंग-9

All Pics Credit- pixabay.com / unsplash.com


लेखक:-

राजीव सिन्हा


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