सरूमा - माँ - बेटी के अटूट प्रेम को दर्शाने वाली असम की एक मार्मिक लोक कथा

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Saruma-Maa Beti ke atut prem ko darshane wali Asam ki ek lok katha

लोककथाओं का अपना ही एक अलग संसार होता है। इन कथाओ में असंभव सा दिखने वाला कार्य भी संभव होता हुआ दीखता है और ऐसा प्रतीत होता है कि इन कथाओ के पात्रो की इच्छाएं अंत में पूरी हो जाती है। प्रायः ऐसा देखा जाता है की इन कथाओ के अंत में अन्याय व अन्यायी का अंत होता है और उसके स्थान पर अच्छाई की विजय होती है। इससे लोगो को आत्मसंतुष्टि मिलती है। उन्हें ऐसा लगता है जैसे मानव भी वो असम्भव कार्य कर सकता है जो उसकी पहुँच से बाहर है। लोककथाओं की उत्पत्ति के कई कारणों में से शायद एक कारण ये भी रहा हो।

ऐसी ही एक लोक कथा है जिसका नाम है - सरूमा ....... 'सरूमा' असम की एक लोककथा है और जब आप इस लोककथा को आरम्भ से अंत तक पढ़ेंगे तब आपको ऊपर बताई मेरी बातें सही प्रतीत होगी। साथ ही कहानी को पढ़कर पीड़ा के साथ साथ एक आत्मसंतुष्टि भी प्राप्त होगी। क्योकि इसमें न्याय करने के लिए मनुष्य किसी ग्रह या ईश्वरीय शक्तियों के भरोसे नहीं है बल्कि वो स्वयं ही अपनी दिव्य शक्तियों से अन्यायी को दंड देता है और अपनों की रक्षा करता है।

ये लोक कथा मुझे बहुत पसंद है। मैं नहीं जानती मुझे ऐसी लोक कथाये क्यों पसंद आती है। लेकिन ये बिलकुल सच है कि मुझे ऐसी लोक कथाएं बहुत पसंद है। तो आप भी इस लोक कथा को अवश्य पढ़े.....
🌺 असम की प्रसिद्ध लोककथा और सरूमा का बचपन

असम के एक शहर में एक परिवार रहा करता था। उस परिवार में पति पत्नी और उसकी एक छोटी सी बेटी थी। बेटी का नाम था - सरूमा।

सरूमा छोटी थी मगर बहुत भोली भाली थी। वह और बच्चो कि भांति ज्यादा नहीं बोलती थी। वो सबसे अलग रहती थी और बहुत कम बोलती थी। वह देखने में भी बहुत सुन्दर थी। लेकिन दुर्भाग्य.... कुछ ही दिन बाद उसकी माँ की मृत्यु हो गई।

🍂 सौतेली माँ का आगमन और कटु सामाजिक सत्य

उसकी माँ की मृत्यु हो जाने पर उसके पिता ने दूसरी शादी कर ली। जब सौतेली माँ आयी तो वो सरूमा के लिए काल बन कर आयी। क्योकि सच्चाई यही है की इस संसार में नारी ही नारी की शत्रु है।

तथाकथित नारीवादी लोग नारियों के अधिकारों के लिए आवाज बहुत उठाते है। मगर उन मूर्खो को ये पता नहीं होता है की इस संसार में नारी ही नारी के सबसे बड़े शत्रु है। यदि एक स्त्री दूसरे अन्य स्त्रियों की पीड़ा समझने लगे, उसके साथ खड़ी होने लगे तो समाज में आधे से ज्यादा अपराध रुक जायेंगे। इसके लिए स्त्रियों को अपना बौद्धिक विकास करना होगा। उसे व्यक्तिगत स्वार्थ से ऊपर उठना होगा। क्योकि ये बातें केवल इस लोक कथा तक ही सीमित नहीं है बल्कि ये सदियों से चली आ रही समाज की वो सच्चाई है जिसपर कोई बातें करना नहीं चाहता है। क्योकि सच कडुवा होता है और समाज के तथाकथित नारीवादी लोगो को अपनी राजनीति चमकानी होती है।
⚡ पिता की अनुपस्थिति और सौतेली माँ का षड़यंत्र

तो इस प्रकार से सरूमा का जीवन नर्क हो गया। दरअसल सरूमा के पिता को व्यापार के काम से दो महीने के लिए बाहर जाना पड़ा था और इस बीच सरूमा को अपनी सौतेली माँ के साथ अकेले रहना था।

फिर क्या था। उसकी सौतेली माँ को तो जैसे एक सुनहला अवसर मिल गया था। सरूमा के पिता की अनुपस्थिति का लाभ उठाकर वो रोज सरूमा के विरुद्ध षड़यंत्र रचने लगी। उसे इतनी पीड़ा देने लगी। ताकि वो मर जाये और उसके बाद उसे उस सौतन की बेटी से छुटकारा मिल जाये।

🐟 नदी किनारे सुनहली मछली के रूप में माँ का आगमन

एक दिन उसकी सौतेली माँ ने उसे नदी से मछली पकड़ कर लाने के लिए कह दिया। माँ के कहने पर सरूमा नदी के पास तो चली गई मगर उसे मछली पकड़ना नहीं आता था। वो नदी के किनारे जाकर बहुत देर तक बैठी रही। वह बहुत दुखी थी और वो अपनी माँ को याद कर रही थी।

"तभी सरूमा को नदी में एक सुनहली सी नन्ही मछली दिखी। वो सरूमा को पानी के अंदर से चुपचाप देखे जा रही थी। सरूमा ने जब उस मछली को देखा तो उसे बहुत आश्चर्य हुआ क्योकि वो स्थिर होकर सरूमा को ही देखे जा रही थी। तभी अचानक से वो मछली सरूमा से स्त्री की आवाज में कहने लगी, 'बेटी सरूमा ! मैं तुम्हारी माँ हूँ। तुम मत रो। मैं तुम्हारी सहायता करने के लिए ही आयी हूँ।' और ऐसा कहकर मछली का रूप धारण करने वाली उसकी माँ ने सरूमा को बहुत तरह के खाने की चीजे दी और बाद में उसे बहुत सारी मछलिया देकर सकुशल घर भेज दिया।"

कुछ दिन तो सब ठीक रहा। क्योकि अब सरूमा सौतेली माँ के कहने पर मछलियां लाने लगी थी। जबकि सच्चाई ये थी की वो मछलियां सरूमा नहीं पकड़ती थी। वो मछलियां उसकी माँ उसे दिया करती थी। उसकी माँ नदी के पास आकर उसे तरह तरह के खाने की चीजे भी दिया करती थी।

अब सरूमा प्रसन्न रहने लगी थी। लेकिन उसकी ये प्रसन्नता अधिक समय तक नहीं रह सकी क्योकि उसकी सौतेली माँ को इस बात की जानकारी हो गई कि नदी किनारे उसकी अपनी माँ आती है। इसलिए अब उसने सरूमा को नदी के पास जाने से रोक दिया। अब उसने सरूमा को दूसरे तरीके से दुःख देने कि योजना बनायीं।

🦜 तपती धूप में बगीचा और तोते के रूप में स्नेही स्पर्श

वो गर्मी का समय था। दोपहर की तेज धुप से धरती तपा करती थी। उसी तेज चिलचिलाती हुई धुप में उसने सरूमा को घर के पिछले भाग में स्थित उद्यान में पानी देने के लिए कह दिया। सरूमा ने खाना भी नहीं खाया था। मगर उसकी सौतेली माँ को इससे क्या लेना देना था। वो तो चाहती ही थी कि सरूमा किसी भी तरह से मर जाये।

सौतेली माँ के कहने पर सरूमा उद्यान में पानी देने के लिए आयी मगर अत्यंत तेज धुप के कारण वह उद्यान में पानी नहीं दे पायी। वह वही पर एक घने पेड़ की छाया में बैठ कर रोने लगी। तभी उसके पास एक तोता आकर बैठ गया। रोते हुए सरूमा की दृष्टि जब पास आये हुए उस तोते पर पड़ी तो उसे बहुत आश्चर्च हुआ क्योकि वो तोता ठीक उसके पास आकर बैठ गया था और उसे बहुत दुखी होकर देख रहा था।

Saruka - Ek Lok Katha
"तभी वो तोता स्त्री की आवाज में बोल पड़ा, 'सरूमा! रो मत! मैं आ गई हूँ। मैं तुम्हारी माँ हूँ।' रोती हुई सरूमा तोते के रूप में अपनी माँ को सामने देख कर प्रसन्नता से भर गई। वास्तव में, उसकी माँ ही तोते का रूप धारण करके उसके पास आयी थी।"

फिर उसकी माँ ने अपनी नन्ही बेटी सरूमा को बहुत प्रकार के फल खाने को दिया। अब सरूमा प्रसन्न हो गई। माँ ने उसे अब रोज उद्यान में आने को कह दिया। अब सरूमा रोज उद्यान जाने लगी और वहां उसकी माँ तोते का रूप धारण करके उसके पास आने लगी। उसकी माँ वहां आकर नन्ही सरूमा को ढेर सारे मीठे मीठे फल खाने को देने लगी। इससे सरूमा प्रसन्न रहने लगी।

लेकिन उसकी ये प्रसन्नता भी अधिक समय तक नहीं रह पायी। जल्द ही उसकी सौतेली माँ को इस बात की जानकारी हो गई की उद्यान में सरूमा से उसकी माँ मिलने आती है और उसे ढेर सारे फल खाने को देती है। फिर क्या था। उसने सरूमा को उद्यान में जाने से भी रोक दिया और उद्यान के कई वृक्षों को भी कटवा दिया।

🐄 गौ-माता का रूप धारण कर बेटी को वात्सल्य देना
जब सरूमा की मृत माँ को इस बात की जानकारी हुई की सरूमा को उद्यान आने से रोक दिया गया है और अब उससे मिलना कठिन है तो वो अब अपनी बेटी के पास एक गाय का रूप धारण करके आने लगी। वो गाय का रूप धारण करके दरवाजे पर खड़ी रहती। ताकि सरूमा के बाहर आने पर वो उसे अपना परिचय दे सके। जल्द ही सरूमा दरवाजे पर आयी तो उस गाय पर उसकी दृष्टि पड़ी। वो गाय सरूमा को देखते ही उसके पास आ गई और उसने सरूमा को अपना परिचय दिया और कहाँ, "चिंता मत करो बेटी! मैं फिर आ गई हूँ। तुम अब बाहर आ जाया करो। मैं तुमको अपना दूध पिलाऊंगी।"

गाय के रूप में अपनी सगी माँ को सामने देखकर सरूमा फिर प्रसन्नता से भर गई। फिर गाय बनी उसकी माँ ने उसे खूब दूध पिलाया। दूध पीकर सरूमा और खुश हो गई। माँ ने उसे अब रोज बाहर आने के लिए कह दिया और सरूमा अब रोज बाहर जाने लगी। वहां उसकी माँ गाय का रूप धारण करके आती और उसे खूब अपना दूध पिलाती। जल्द ही सरूमा का स्वास्थ्य अच्छा हो गया और वो अब फिर से प्रसन्न रहने लगी।

Saruma ek lokkatha
🐭 बंद कमरे की क्रूरता और चुहिया बनकर आई माँ

सरूमा की सौतेली माँ ने जब देखा कि सरुमा का स्वास्थ्य पहले से दिनों दिन अच्छा होता जा रहा है और वो फिर से प्रसन्न रहने लगी है तो उसने गाय के बारे पता लगाया। उसे मालूम हो गया की वो गाय और कोई नहीं सरूमा की माँ ही है। इसलिए वो चिढ से पागल हो गई। उसने गुस्से में आकर गाय को ही मारने की कोशिश की। मगर गाय के एक ही प्रहार से वो बुरी तरह से घायल हो गई और वहां से भाग खड़ी हुई।

अंत में चिढ़कर सरूमा की सौतेली माँ ने सरुमा को एक कमरे में बंद कर दिया। भोली-भाली सरुमा को उसने पीने के लिए पानी तक न दिया। सरूमा बंद कमरे में बैठकर रो रही थी तभी उसकी दृष्टि पास आयी एक चुहिया पर पड़ी। वो चुहिया और कोई नहीं सरुमा की माँ ही थी। वो अपनी बेटी सरूमा की रक्षा के लिए अब चुहिया बन कर आयी थी। अपनी बेटी की ऐसी स्थिति देखकर वो लगातार रोये जा रही थी।

"उसने रोते हुए ही अपनी बेटी से कहा, 'बेटी मत रो। मैं फिर आ गई हूँ। मैं तुम्हारे लिए भुने हुए चने लेकर आयी हूँ। तुम इसे खा लो, बेटी!'"

सरूमा ने भुने हुए चने को खाया और माँ के द्वारा लाये गए पानी को भी पिया। भुने हुए चने खाकर और पानी पीकर सरूमा वही पर अपनी माँ के साथ सो गई। अब अपनी माँ के आ जाने पर सरूमा को वहां पर भी भय नहीं लग रहा था। वो अपनी माँ के साथ वहां भी खुश थी।

🛡️ दिव्य वस्त्र की शक्ति और तलवार के बेअसर वार

इस तरह से जब सरूमा बंद कमरे में भी प्रसन्न रहने लग गई तो उसकी विमाता को बहुत ही चिढ हुई और वो चिढ से इतनी पागल हो गई थी कि अब उसने सरूमा को मारने का निश्चय कर लिया था। ईधर सरूमा की सगी माँ को यह ज्ञात हो गया था की अब सरूमा की विमाता उसकी नन्ही सी लाड़ली बेटी की हत्या करने की योजना बना चुकी है और इस समय घर पर उसके पिता भी नहीं है।

ऐसा जानकार वो अपने पास सोयी नन्ही सरूमा को जगाते हुए बोली, "बेटी सरूमा ! ये दिव्य वस्त्र लो। तुम इन वस्त्रो को अभी तुरंत धारण कर लो। क्योकि अब तुम्हे इसकी आवश्यकता पड़ेगी। ये वस्त्र चमत्कारी है और इसपर किसी भी अस्त्र व शस्त्र का कोई प्रभाव नहीं होगा। तुमपर किया गया कोई भी वार सफल नहीं होगा और तुम सुरक्षित रहोगी।"

माँ के कहने पर सरूमा ने झट से वो दिव्य वस्त्र धारण कर लिया। वस्त्र धारण करते ही अगले पल उसकी सौतेली माँ हाँथ में तलवार लिए वहां आ गई। उसने सरूमा पर कई वार किए मगर उसके सब के सब वार बेकार गए। क्योकि दिव्य वस्त्र की शक्ति से उसपर तलवार के वार बेअसर हो रहे थे। अंत में हार कर उसकी सौतेली माँ वहां से चली गई।

⚖️ पिता का आगमन, पाप की सजा और अंतिम न्याय

अगले दिन सरूमा के पिता भी आ गए। आते ही उन्होंने अपनी नन्ही बेटी सरूमा को पुकारना शुरू किया। उसके पिता उसके लिए ढेर सारे वस्त्र व खाने पीने का सामना लाये थे। जब उन्हें सरूमा कही पर भी नहीं दिखी तो वे चिंतित हो गए। चिंतित होकर उन्होंने सरूमा के बारे में अपनी पत्नी से पूछा। पर वो कुछ बताने की बजाएं मौन धारण किए रही।

सरूमा के पिता अब समझ गए थे कि सरूमा सुरक्षित नहीं है। उसे जरूर कुछ न कुछ हो गया है। तभी उन्हें दूर एक बंद कमरे से अपनी मृत पत्नी की आवाज आयी, "यदि आप सरूमा की जान बचाना चाहते है तो अपनी पत्नी को उसके मायके भेज दें। क्योकि वो इसकी जान की दुश्मन बन गई है।"

आवाज सुनकर जैसे ही सरूमा के पिता ने दरवाजा खोला तो वहां उन्हें नन्ही सरूमा दिख गई। सरूमा को सुरक्षित देखकर वो आनंद से भर गए और उन्होने अपनी नन्ही सरूमा को गोद में उठा लिया। सरूमा को खूब खाने पीने के लिए दिया। उसके बाद उन्होंने अपनी दूसरी पत्नी को उसकी करनी की सजा देते हुए उसे आगे का जीवन जीने के लिए धन देकर मायके भेज दिया। इस तरह उन्होंने दोनों के साथ न्याय किया।

🌌 रीत पुरानी: अटूट स्मृतियाँ और अनंत विदा

अब सरूमा प्रसन्न रहने लग गयी। लेकिन उसे अपनी माँ की याद हमेशा आती रही।

कहते है, "कुछ मिले तो कुछ खो जाये, रीत ये पुरानी है।" सरूमा के साथ भी यही हुआ। सरूमा को अब सौतेली माँ से छुटकारा मिल गया था। मगर अब उसकी सगी माँ की आत्मा भी उनसे बहुत दूर जा चुकी थी।

कहते है उसके बाद उसकी माँ की आत्मा फिर कभी भी सरूमा के पास नहीं आयी...........! सरूमा को अपनी माँ की यादें हमेशा आती रही...........मगर उसकी माँ फिर कभी लौट कर नहीं आई.............!!

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Swati:Aprajita Roop
स्वाति : अपराजिता रूप
Swati : Alaukik Chhavi
अलौकिक छवि
Swati: Yogini Roop
स्वाति : योगिनी रूप

अत्यंत दिव्य, सात्विक, सौम्य, निष्पाप, पवित्र, मनमोहिनी स्वाति अपने कर्म और लेखनी से अनेक लोगों की आदर्श व पूजनीय बनीं। समय-समय पर आने वाली जीवन की अनेकोनेक चुनौतियों के बावजूद उस वीरांगना, योद्धा ने जीवन में कभी भी हार नहीं माना और कठिन से कठिन परिस्थितियों में भी वह हर स्थिति के लिए तैयार रही, तभी तो उसका एक नाम अपराजिता पड़ा। जहाँ दिल्ली जैसे महानगर की कई कम आयु की धनवान लड़कियां धर्म, संस्कार से दूर होकर आधुनिकता की अंधी दौड़ में शामिल हो जाया करती हैं, उसी के विपरीत दिव्य व्यक्तित्व वाली स्वाति सौम्यता, विनम्रता, सात्विकता और वीरता का जीता-जागता स्वरूप रहीं।

गुलाबी साड़ी में उनका वह गरिमापूर्ण रूप हो, ध्यान (मेडिटेशन) की शांत मुद्रा में लीन उनका निश्छल स्वभाव हो, या फिर किसी मासूम बच्ची के साथ कार में उनकी वह निष्पाप मुस्कान—उनका हर स्वरूप यही बयां करता है कि वे धरती पर एक अलौकिक विचार रखने वाली विरली आत्मा थीं। देश के कई राज्यों में फैले उनके चाहने वालों के लिए वे केवल एक लेखिका नहीं, बल्कि देवी का ही एक साक्षात स्वरूप रही हैं।

जिस व्यक्तित्व के चेहरे पर ऐसा अद्भुत तेज और सरलता हो, उनकी लेखनी से "सरूमा" जैसी अत्यंत संवेद्य और भावुक लोककथा का जन्म होना बिल्कुल स्वाभाविक था। लेकिन यह केवल एक कहानी का पुनर्जन्म नहीं था, बल्कि स्वाति जी (रूबी सिन्हा) के अपने जीवन की अनकही पीड़ा की ही एक गूँज थी।

"सरूमा" केवल एक लोककथा नहीं थी बल्कि वह स्वाति जी के अपने अंतर्मन का वह सन्नाटा था, जिसे उन्होंने शब्दों में ढाल दिया। जब इंसान का कोई सबसे करीबी दूर हो जाता है, तब मन में केवल एक खालीपन ही शेष बचता है। लोककथा की वह अभागी नन्ही बेटी सरूमा भी सौतेली माँ के असह्य अत्याचारों और षड़यंत्रों को सहते हुए, अपनी मृत सगी माँ के उस अलौकिक वात्सल्य और अटूट प्रेम की संबल से ही जीवित रह सकी थी। वह माँ, जो मृत्यु के बाद भी अपनी लाडली बेटी की रक्षा के लिए कभी मछली, कभी तोता, तो कभी गाय और चुहिया बनकर उसके दुखों को हरने आती रही।

स्वाति जी ने इस कहानी को केवल लिखा नहीं था, बल्कि इसे अपने भीतर प्रतिपल जिया था। मात्र 6 वर्ष की अबोध उम्र में माँ सहित 3 वर्ष की छोटी बहन को खो देने का असह्य वज्रपात, फिर वर्षों बाद पिता का भी इस संसार से चले जाना, और अपनों के नाम पर कोई नहीं, न कोई भाई और न ही कोई अपना... इतनी कम उम्र में अपनों के पूरी तरह छूट जाने की यह वेदना किसी साधारण इंसान को निश्चित रूप से तोड़ सकती थी। परंतु उस अपराजिता ने इस असीम अकेलेपन और महा-वेदना को दिल्ली जैसे महानगर में रहते हुए भी ईश्वर की साधना, ध्यान और सात्विकता में बदल दिया। तस्वीरों में ध्यान की मुद्रा में बैठा उनका शांत व्यक्तित्व इस बात का साक्षी है कि उन्होंने अपने जीवन के हर दर्द को अध्यात्म का दीप बना लिया था।

Swati: Saumy Rup
सौम्य रूप
Swati: Riya aur Komal ke sath
स्वाति: रिया और कोमल के साथ
Swati : Saumy Muskan
स्वाति : सौम्य मुस्कान

स्वाति (रूबी सिन्हा जी)

स्वाति जी अपनी लेखनी के माध्यम से यह संदेश दे गईं कि इंसान भले ही चला जाए, पर उसका प्रेम और मातृत्व का स्नेही स्पर्श प्रकृति बनकर हमारे आस-पास ही रहता है—ठीक वैसे ही जैसे सरूमा की माँ देह त्यागने के बाद भी हर रूप में अपनी बेटी की रक्षा के लिए उसकी ढाल बनकर खड़ी रही। स्वाति जी के विचार और कर्म हमें सिखाते हैं कि जो हमारे भौतिक जीवन से दूर चले जाते हैं, वे स्मृतियों और सुंदर विचारों में सदा अमर रहते हैं।


ऐसी सात्विक और दिव्य आत्माएँ इस नश्वर धरा पर बहुत कम समय के लिए आती हैं, लेकिन अपने पीछे विचारों, दिव्य कर्मो और शब्दों की एक ऐसी अनश्वर छाप छोड़ जाती हैं जो युगों-युगों तक मानवता को प्रेरित करती रहती है। स्वाति जी ने भी अपने अलौकिक तेज और सरलता से अनगिनत ह्रदय में अपना एक विशिष्ट स्थान बनाया।


उनकी सोच और यह लोककथा हमेशा-हमेशा के लिए अमर हो गई है। जब-जब कोई निष्पाप संतान अपनी माँ के निश्छल प्रेम को याद करेगी, जब-जब अन्याय पर वात्सल्य की दिव्य शक्ति की विजय का स्मरण होगा, तब-तब स्वाति जी (रूबी सिन्हा जी) की यह रचना लोगों के दिलों को यूँ ही छूती रहेगी।

— कोटि-कोटि नमन (राजीव सिन्हा) 🙏✨

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