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खुशी (अंतिम भाग) - A Heart Touching Story In Hindi

smrititak.com - खुशी (भाग - 1)

Heart Touching Love Stories in Hindi - :


अगले दिन मेरा बहुत व्यस्त कार्यक्रम था। वहां से निकलने की तैयारी में लगा रहा। उस दिन स्कूल में अवकाश था इसलिए समूची बिल्डिंग सुनी सुनी सी थी।

उसी दौरान घूमते - टहलते हुए एक लड़का मेरी बिल्डिंग में मेरे पास आया। उसने मेरे जाने को लेकर अपने मन के दुःख से मुझे अवगत करवाया। साथ ही एक बहुत ही बुरा समाचार भी मुझे सुनाया। उसने बताया कि आज सुबह गांव के एक बगीचे में एक लड़की की किसी ने हत्या कर दी है।

उसकी बात सुनकर मैं चौंक पड़ा।

"ओह ! ये तो बहुत ही बुरा किया है उस हत्यारे ने ! नाम क्या था, उस लड़की का ?" मैंने उस लड़के से पूछा।

"नम्रता ! नम्रता नाम था उस लड़की का !" लड़के ने मुझे बताया, " आप तो उसे अच्छी तरह से जानते है। आपके पास तो प्रायः वो आया करती थी।"

"नम्रता .....!!!! इस नाम की किसी लड़की को मैं नहीं जानता हूँ। हाँ हो सकता है, इस नाम की कोई लड़की मेरे स्कुल में पढ़ती होगी। मगर इस नाम की कोई लड़की मेरे पास नहीं आया करती थी। " मैंने लड़के से कहा।

लड़के ने मेरी बातो का कोई उत्तर नहीं दिया। कुछ देर बिल्डिंग में ईधर उधर टहलकर वह आराम से चला गया।

लड़के के हाव भाव देखकर मैंने अनुमान लगाया कि वह लड़का बात बनाने के इरादे से ऐसी बातें कर रहा होगा। वैसे भी वे लड़के बातूनी ज्यादा थे। वे लोग प्रायः किसी बात को ठीक से जाने समझे ही बोलने वाले में से थे। इसलिए मैंने उनकी बातो को गंभीरता से नहीं लिया और अपनी आगे की तैयारी में फिर व्यस्त हो गया।


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दिन के दस बज चुके थे लेकिन अब तक खुशी का कोई अता-पता नहीं था। सुबह से ही मैंने कई बार उसके मोबाइल पर भी कॉल लगाया था मगर हर बार वह स्विच ऑफ बता रहा था। मेरी समझ में नहीं आ रही थी कि उसने दस बजे आने का समय दिया था। आना तो दूर उसने अपना फोन भी स्विच ऑफ कर लिया है। इसका क्या कारण हो सकता है। मैं चिंता में पड़ गया।

जैसे जैसे समय आगे बढ़ता जा रहा था वैसे वैसे मेरी चिंता बढ़ती जा रही थी। मैं बीच बीच में लगातार उसे फोन भी कर रहा था। मगर पहले की तरह वो लगातार स्विच ऑफ बताये जा रहा था। मैं छत पर से ही नीचे सड़क पर उसे तलाशने लगा। मगर ये क्या ...... रोज की तरह शांत दिखने वाली वो ग्रामीण सड़क आज मुझे भीड़भाड़ भरी दिख रही थी। उस सड़क पर अनेकों लोगों के आने जाने से भीड़ सी लग गई थी।

'पता नहीं क्या बात हो गई !' घबराहट भरे पल में मैंने ऊपर छत पर रेलिंग के सहारे टिकते हुए उन आते जाते लोगों की बातो को ध्यान से सुनने लगा,

भीड़ में ही एक स्त्री ने दूसरे से कहा, "किस पापी ने उस सुकुमारी की हत्या कर दी। उसके जैसा सुशील और नेक ह्रदय वाली लड़की से किस ने अपनी गिरी हुई दुश्मनी निकाली। जो भी हो भगवान उसका भला नहीं करेगा।"

भीड़ में ही एक स्त्री ने दूसरे पुरुष से पूछते हुए आगे बढ़ रही थी, "नम्रता, उतनी सुबह उद्यान में क्या करने गई थी ?"

साथ चलते हुए अन्य पुरुष का मुझे उत्तर सुनाई पड़ा, "वह रोज मॉर्निंग वॉक के लिए जाया करती थी, आज भी वह मॉर्निंग वॉक के लिए ही गई हुई थी। शायद हत्यारिन पहले से ही वहां उसका इंतजार कर रही थी। हो सकता है दोनों के बीच कुछ कहासुनी भी हुई होगी।"

भीड़ में चलते हुए कई स्त्री पुरुषो की आखे नम थी। कोई इसके लिए भगवान को दोष दे रहा था और इस कारण उनके चेहरे पर दुख मिश्रित रोष भी थे।


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उन लोगों की बातों को सुनकर मुझे बहुत दुःख हुआ। लगा गांव की कोई भोली सी लड़की को किसी ने मार दिया है। तभी मुझे खुशी के बारें फिर चिंता हुई।

'कही वो लड़की मेरी खुशी तो नहीं है ..... नहीं -- नहीं -- नहीं ... ऐसा किसी कीमत पर नहीं हो सकता है। मेरी खुशी सुरक्षित है। उसे कुछ नहीं हो सकता है।' मैंने फिर उसे फोन लगाया। लेकिन पहले ही भांति फिर मुझे उसका फोन स्विच ऑफ आया। मैं अब बहुत घबरा गया था। 'ये क्या हो गया है खुशी को। दस से ग्यारह बजने वाले है। उसका आना तो दूर की बात है। उसने तो अपना फोन भी स्विच ऑफ कर लिया है। ये क्या हो रहा है मेरे साथ।'

मैं फिर घबराया। अब मुझे खुशी की चिंता सताने लगी थी। मैं तत्काल अपने कमरे में गया और दूसरों के द्वारा दी गई सभी गिफ्ट को नजरअंदाज करता हुआ खुशी के द्वारा दिए गए गिफ्ट को खोल कर देखने लगा। देखा वह शीशे का एक बंद बॉक्स था। उस बंद बॉक्स के अंदर एक छोटा सा उद्यान था। उस उद्यान में एक सुंदर सी गुड़िया एक पेड़ नीचे गहरी नींद में सो रही थी।

मैं खुशी के द्वारा दी गई उस गिफ्ट को अभी ठीक से देख ही रहा था तभी चंदन मेरे पास आया। चन्दन उस समय बहुत निराश और दुखी था। वह हताशा भरी दृष्टि से मुझे देखने लगा। मैंने सोचा कि मैं यहां से जा रहा हूँ इसलिए वह इतना दुखी है। मैंने उसे फिर जल्द मिलने का आश्वासन भी दिया।

मेरी बातें सुनकर चंदन की आंखों में आंसू आ गए। लेकिन वह मुझसे कुछ नहीं बोला। मैंने चंदन की तरफ से ध्यान हटाकर फिर से घड़ी को देखा। दोपहर के बारह बज चुके थे। व्याकुल होकर मैं कमरे से बाहर खुले बरामदे में आ गया। आगे बढ़ कर रेलिंग के पास गया। नीचे आते जाते लोगो को देखने लगा। भीड़ अब भी वैसी की वैसी ही थी। लोग आ जा रहे थे। मैं ऊपर छत पर से ही नीचे सड़क पर लोगो की आती जाती उस भीड़ में खुशी को तलाशने लगा। लेकिन उस भीड़ में वो लड़की मुझे कही भी नजर नहीं आयी। मुझे दूर दूर तक कहीं भी खुशी दिखाई नहीं पड़ी। खुशी को कहीं नहीं पाकर मैं निराश हो गया था। मन ही मन मैंने सोचा कि अब मुझे खुशी है के घर पर जाकर ही उससे मिलना होगा। ऐसा सोच कर मैं नीचे जाने के लिए मुड़ा। मैंने देखा चंदन मेरे पीछे खड़ा रो रहा था।

लेकिन उस समय मुझे उसका रोना देखकर चिड़चिड़ाहट महसूस हुई। मैं उसकी ओर से अपनी आंखें घुमाते हुए नीचे जाने की इच्छा से सीढ़ी की ओर देखने लगा।


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"किसका इंतजार कर रहे हैं सर, अब आप ?"

"तुम्हें मालूम नहीं है, मैं किसका इंतजार कर रहा हूँ !" मैंने चिढ़ कर चंदन से कहा।

"हाँ मालूम है, इसलिए तो मैं आपसे पूछ रहा हूँ कि अब आप किसका इंतजार कर रहे हैं ?" चंदन रोते हुए मुझसे बोला।

"खुशी का ........!!!" मैं चौंकते हुए चंदन की ओर देखा। चंदन की बात में मुझे किसी बहुत बड़ी भयानक अनिष्ट की झलक दिख रही थी। मेरे मन की घबराहट बहुत बढ़ गई थी

"सर, अब आप उनका इंतजार मत कीजिये। खुशी दीदी अब आपके पास कभी नहीं आएगी सर ....... वो अब आपके पास कभी नहीं आ सकती है सर !!!!"

"ये तुम क्या बकबक कर रहो चन्दन !!!!" मैंने लगभग डांटते हुए उसे कहा।

"मैं वही कह रहा हूँ सर, जो आज की सच्चाई है। वो अब आपके पास कभी नहीं आएगी। वो तो अब कहीं और जाने वाली है।" चंदन रोते हुए मुझसे बोला, खुशी दीदी अब आप को क्या पहुँचायेगी, वो तो अब स्वयं दुसरो के द्वारा पहुचायें जाने का इंतजार कर रही है और वो भी चार कंधों के सहारे ......!!!!"

"ये तुम क्या कह रहे हो चंदन, कही तुम पागल तो नहीं हो गए हो l " अचानक से मैं चंदन पर क्रोधित हो गया।

"तो क्या अब तक आपको कुछ भी ज्ञात नहीं है ?"

"क्या नहीं ज्ञात है हमें !"

"सर ! वो हंसमुख - सी, प्यारी रूपवाली खुशी दीदी - अब हमारे बीच नहीं रही। किसी ने आज सुबह गांव के बाहर वाले उद्यान में उनकी हत्या कर दी है ........!!!!" चंदन ने बहुत दुखी होते हुए मुझसे बोला।


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"क्या .............!!!!!" चंदन की बात ने मेरे ह्रदय पर जबर्दस्त प्रहार किया। मेरे हाथ से खुशी का दिया हुआ वह शीशे का गिफ्ट टूट कर नीचे ठोस फर्श पर गिर गया। शीशे का वह बॉक्स नीचे जमीन पर गिरते ही चूर चूर होकर जहां-तहां दूर-दूर तक बिखर गया।

"सर ! आप अपने आप को संभाले ! मैं जानता था कि आपको इस बात से जबर्दस्त सदमा लगेगा इसलिए अब तक मैंने यह बातें आपको नहीं बतलाई। लेकिन सच्चाई छिपाने से भला कब तक छिप सकती हैं। सच्चाई का सामना करना भी एक साहस का काम है और मुझे ज्ञात है आप एक साहसी मानव हैं l "

"लेकिन मैंने सुना है कि जिस लड़की की हत्या हुई है उसका नाम तो नम्रता है। फिर तुम खुशी की हत्या की बात तुम क्यों कर रहे हो ?" मैं बहुत कठिनाई से अपने आपको सँभालते हुए किसी तरह चंदन से इतना बोल पाया। मुझे चन्दन की बातों पर अब भी विश्वास नहीं हो रहा था। मुझे ऐसा लग रहा था खुशी मेरे पास आ रही होगी। खुशी के आने पर मैं चंदन की घटना बातों को उसे सुनाऊंगा। फिर वो भी चन्दन को डाँटेगी।

"सर नम्रता और कोई नहीं बल्कि वह खुशी ही थी। उसी के ही दो नाम है ..... और अब तो है भी कहना कहाँ सही है ........ वो तो अब हम सब से दूर बहुत दूर चली गई है, जहाँ से कोई लौट कर वापस नहीं आता है।"

"तो क्या खुशी का ही एक नाम नम्रता था .....?" मैं अवाक् होकर चंदन को देख रहा था।

"हाँ सर ! खुशी कॉलेज का नाम था तो नम्रता उनका घरेलु नाम था !"

चंदन की बात ने मुझे अंदर तक हिला कर रख दिया था। मैं सिर पकड़ कर कुछ समय के लिए बैठ गया। मेरे सिर चकरा रहे थे। आंखों के आगे अंधेरा छा गया था। चंदन मुझे बार-बार साहस बंधा रहा था लेकिन मुझे उसकी बातें सुनाई नहीं पड़ रही थी। मैं चुपचाप खुशी के घर की ओर बढ़ रहा था। रास्ते में और भी कई लोग चल रहे थे। मगर मुझे किसी की आवाज सुनाई नहीं पड़ रही थी। मेरी आँखों के सामने बस खुशी ही खुशी दिख रही थी। कभी उसका हंसना, कभी उसका मुस्कुराना, कभी उसका गंभीर हो जाना, कभी उसका मायूस हो जाना तो कभी उसका रोना ....... आज - आज हर रूप मुझसे आकर पूछ रही थी - सर ! देखते ही देखते ये क्या हो गया। मैं आपके बीच से चली गई .... चली गई !


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चलते चलते मेरे कदम अचानक से एक घर के पास आकर रुक गए। वो घर खुशी में मामू मामी का था और खुशी गांव में उसी घर में रहा करती थी। उस समय उस घर के बाहर बहुत लोगो की भीड़ थी। सभी की आँखे नम थी। कई तो फुट फुट कर रो रहे थे। बेसुध अवस्था में मैं उस भीड़ को हटाता हुआ अंदर बढ़ गया। भीड़ हटते ही मेरे सामने वो दृश्य था, जिसके लिए मैं न तब तैयार था और न आज - आज इतने बर्षो के बाद भी तैयार नहीं कर पाया हूँ।

मेरे सामने हंसने वाला एक चेहरा आज मौन पड़ा था। खुशी आज चिरनिद्रा में सोयी हुई थी। वो मर चुकी थी। अपनी प्रेमिका - अपनी होने वाली पत्नी - खुशी को मैं सामने मृत पड़ा हुआ देख रहा था। मेरी खुशी मर चुकी थी और मैं बेसुध होकर बिना रोये बस उसे स्थिर दृष्टि से देखे जा रहा था - बस उसे ही देखे जा रहा था।

पता नहीं मैं उसे कब तक देखता रह गया। तभी खुशी के मामू और रवि व अन्य लोगो ने मुझे सहारा दिया।

"किसने की मेरी खुशी की हत्या - सौगंध मेरी अच्छाई की मैं अभी के अभी उसको मिटा दूंगा। अब मुझे न अपने जीवन की कोई चिंता है और न अपने किसी करियर की। खुशी के साथ मेरा जीवन भी चला गया और मेरे जीवन में आगे बढ़ने का सपना भी गंगा की धारा में बह गया। अब अगर मैं जीवित भी रहा तो एक जिन्दा लाश बनकर ही जीवन जीता रहूँगा। इसलिए अब न मुझे मृत्यु का कोई भय है और न ही किसी करियर की चिंता है। बताओ किसने की मेरी खुशी की हत्या ! आज मैं धरती पर से उसका नामोनिशान मिटा दूंगा !"


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खुशी के मामू व रवि सर ने मुझे बताया कि आज सुबह जब खुशी रोज की तरह गांव के बाहरी बगीचे में मॉर्निंग वॉक के लिए गई थी वहीं पर किसी ने उसकी हत्या कर दी। खुशी के पुरे शरीर में कई खरोंचे हैं तथा उसके सिर पर भी कई चोट के निशान है। जिससे लगता है कि हत्यारे से बचने के लिए खुशी में अंतिम संघर्ष किया होगा।

खुशी के हाथ में लड़की के टूटे हुए बाल के साथ हेयर क्लिप भी मिला था। यह बाल और हेयर क्लिप खुशी के नहीं है। इससे साफ स्पष्ट होता है कि खुशी को मारने वाला कोई पुरुष नहीं बल्कि उसकी हमउम्र की कोई लड़की थी।

"क्या पुलिस को इसकी सूचना दी गई !" मैंने खुशी के मामू से पूछा।

"अब आप जानते है। हमलोग बहुत ही साधारण घर परिवार से है। आप ये भी समझते होंगे की पुलिस और कोर्ट कचहरी में हम जैसे लोगो की क्या दुर्गति हो जाएगी। मरने वाली तो मर कर चली गई। मगर हमलोग जीते जी कही के नहीं रहेंगे। क्योकि इससे गांव के धनवान घर परिवार से हम लोगो को सामना करना पड़ेगा, जो हम लोग कर नहीं पाएंगे।"

"आपकी बातों से ऐसा लग रहा है, जैसे आप हत्यारिन लड़की को जान रहे है !" मैंने गंभीरता से खुशी के मामू को कहा।


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मेरे इतना कहने पर खुशी के मामू हमें सबसे दूर एक ओर चलने को कहा। मैं उनके साथ थोड़ी दूर चला और जैसे ही वहां सन्नाटा दिखा वैसे ही उन्होंने मुझसे रुकने को कहा। उनके कहने पर मैं वही रुक गया। मेरे रुकते ही खुशी के मामू ने कहा, "हत्यारिन कौन है, यह हम अच्छी तरह से जान रहे है। लेकिन हम वैसे बड़े लोगो का किसी भी तरह से सामना नहीं कर सकते है। खुशी के पहुंच वाले व धनवान घर की लड़की थी मगर आज हमारे बीच न खुशी है और उसके परिवार। सब के सब काल के ग्रास बन चुके है। ऐसी स्थिति में हम अकेले क्या कर सकते है। अगर हम जोश में टकराने का भी साहस कर लेते है तो ये हमारा परिवार भी मिट जायेगा और ये पुलिस, कोर्ट कचहरी में मेरा छोटा सा खेत - घर सब बिक जायेगा। अब आप ही बताइये हम क्या करें। खुशी तो चली गई। वो तो अब किसी भी कीमत पर लौट कर नहीं आ सकती है। लेकिन यदि आगे कुछ कारवाई करते है तो हम सब कही के नहीं रहेंगे।"

"लेकिन किसने की उसकी हत्या ! आप मुझे बताये। आप नहीं लड़ेंगे मैं लडूंगा और मेरे लड़ने का तरीका अलग होगा। मैं किसी पुलिस के पास नहीं जाऊंगा। उसका न्याय मैं अभी के अभी कर दूंगा। उसके बाद चाहे लोग मुझे भी मार डाले। मुझे इससे कोई अंतर नहीं पड़ने वाला है। खुशी के बिना अब मेरी जिंदगी भी सुनी हो गई है। अब तो मुझे भी जिन्दा रहने में कोई रूचि नहीं है। फिर ऐसा बोझिल जीवन रहे या चला जाये। इससे कोई अंतर नहीं पड़ने वाला है।"

"नहीं सर जी ! ऐसा नहीं सोचिये। आप धैर्य से काम लीजिये। हत्यारिन के मेरे पास पक्के प्रमाण मिले है। उसको आप भी अच्छे तरीके से जानते है। वो खुशी की हम उम्र है और उसी के साथ उसी के कॉलेज में पढ़ती है। मगर आपको उसी खुशी का सौगंध है की आप यह बात केवल अपने तक रखेंगे। उसके किये का दंड भगवान ही देगा।"

ऐसा कहकर खुशी के मामू ने मुझे एक एक ब्रासलेट दिखाया, "पहचानते है इस ब्रासलेट को। आप इसको अवश्य पहचानते होंगे। क्योकि जिसको आपने यह ब्रासलेट उपहार में दिया है उसी की कलाई में कल संध्या को मैंने स्वयं देखा था, जब वो खुशी से मिलने के लिए मेरे घर पर आयी हुई थी। जहाँ वो मेरे भगनी खुशी से कुछ बात कर रही थी। यह वो समय था जब मेरे साथ साथ मेरा परिवार और खुशी स्वयं आपसे बात करके अपने घर लौट कर आये थे। तब वो खुशी से मिलने मेरे घर ही आयी थी और उसी अवधि में मैंने उस लड़की की कलाई में इस ब्रासलेट को देखा था।"

'ये देखिये - यही है वो ब्रासलेट जो खुशी के मृत शरीर के पास से मिला था। शायद खुशी के साथ संघर्ष में उसका ब्रासलेट कलाई से बाहर आ गया और हत्या के बाद वो जल्दवाजी में उसे ले जाना भूल गई।" खुशी के मामू उस ब्रासलेट को मुझे दिखाते हुए बोले।


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ब्रासलेट देखते ही मैं पहचान गया। उस ब्रासलेट को दो दिन पहले ही मैंने सोनल को दिया था। अब मैं समझ गया था कि खुशी की हत्या सोनल ने ही की है। मगर क्यों ! फिर इसका उत्तर तत्काल मुझे अपने ह्रदय से मिल गया। दरअसल सोनल अंतर्मन से मुझे चाहती थी और वो ये नहीं चाहती थी कि खुशी से मेरी शादी हो। क्योकि वो मुझसे शादी करना चाहती थी।"

खुशी को मुझसे दूर करने वाली का पता तो चल गया था। मगर मैंने खुशी के मामू को चुप रहने का वचन दे दिया था। इसलिए मैं सब कुछ जानते हुए भी चुप ही समझा क्योकि खुशी के मामू जो कह रहे थे वास्तव में वो एक कड़ुआ सच था। अगर सामने वाला विरोधी आवश्यकता से भी अधिक मजबूत है तो उस परिस्थिति में उससे टकराने का अर्थ है आत्महत्या करना और मैं नहीं चाहता था कि खुशी के जाने के बाद उसके वे मामू - मामी का जीवन संकट में पड़ जाएं, जिन्होंने इतने दिन तक खुशी को रहने का आश्रय दिए। इसलिए सब सोचकर मैं चुप रहना ही सही समझा।

मैं बिना कुछ बोले खुशी के अंतिम दर्शन के लिए चुपचाप बढ़ गया। मेरे सामने वो हंसमुख खुशी चिरनिद्रा में सोयी हुई थी। मैं पुनः खुशी को देखने लगा, "अब यह चेहरा मुझे इस धरती पर फिर कभी नहीं दिखेगा। क्या सोचा था, ये क्या से क्या हो गया। सब कुछ तहस नहस हो गया। मेरे सामने मेरी खुशी बिलकुल मौन होकर सोयी हुई थी। उस समय वहां के वातावरण में बहुत ही कोलाहल था लेकिन मेरे मस्तिष्क में उन कोलाहल की आवाजे नहीं आ रही थी।


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A Short Story in Hindi......Khushi


मेरे कानों में केवल खुशी के ढेर सारी बातें गूंज रही थी। मेरी आंखों के सामने किसी चलचित्र की भांति खुशी के अब तक के अलग अलग रूप दिख रहे थे -- कभी उसका हंसना, कभी उसका मुस्कुराना, कभी उसका गंभीर हो जाना, कभी उसका रूठ कर एक और बैठ जाना, तो कभी उसका आंसू बहाना ......!!!!

लेकिन आज - आज वह खुशी मुझे देखकर न हंस रही थी, न मुस्कुरा रही थी, न गंभीर हो रही थी और न ही मुझ से रूठ रही थी। मृत्यु की नींद में सोने वाली उस लड़की का चेहरा बिल्कुल शांत था।

'ऐसी लड़की जो मेरे जीवन में खुशी की दस्तक देकर अब हमेशा हमेशा के लिए हम से दूर - बहुत दूर जा चुकी थी।'

घोर निराशा से मैं वहां से अपने आवास पर लौट आया। उस समय मेरी आंखों के आगे अंधेरा हो जाता जा रहा था मैं खुशी के गम से पूरी तरह हताश निराश हो गया था। उस के मृतक रूप को देखकर भी मुझे विश्वास नहीं हो रहा था कि मेरी खुशी अब हमारे बीच नहीं रही है


Wo Ladki : (वो लड़की) - KHUSHI


तभी सीढ़ी पर मैंने कुछ चहलकदमी सुनी। मुझे ऐसा लगा मेरी खुशी आ रही है। गौर से मैं उसी ओर देखने लगा। देखा, वो खुशी की बकरी की वही छोटी बच्ची थी जो खुशी अपने साथ प्रायः लाया करती थी।

विक्षिप्त की बातें सब जानने के बाद भी मैं उस मेमने के आने के बाद खुशी के आने का इंतजार करने लगा। मगर जो चला गया है भला वो कब लौटता है। खुशी नहीं आयी मगर मेरे हृदय की बेचैनी इतनी बढ़ गई कि मैं पागलो की भांति हताश होकर उस मेमने को गोद में लेकर खुशी के बारे में पूछने लगा, "तुम अकेली क्यों आयी ! बताओ मेरी खुशी कहाँ है! तुम मेरी खुशी को अपने साथ क्यों नहीं लायी। बताओ मेरी बच्ची ! मेरी खुशी कहाँ चली गई। अब हम उसके बिना कैसे जिंदगी जियेंगे। वो तो जीवन भर का साथ देने की कसमें खायी थी और इस तरह बीच राह में ही मुझे अकेले छोड़कर चली गई। उसे तो मेरे बिना अकेले कहीं भी मन नहीं लगता था तो फिर आज वह मुझे हमेशा हमेशा के लिए छोड़ कर कहाँ अकेले ही कहाँ चली गई है ?"


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"अभी कल ही उसने सभी के सामने मुझसे शादी करके मेरी पत्नी बनने की कसमें खाई थी .....जीवन भर साथ साथ रहने का वादा किया था ....और फिर दूसरे दिन ही वह मुझे इस दुनिया में अकेले छोड़कर चली गई ..... उसे अपने वादे की भी स्मृति नहीं रही .....क्यों रूठ कर चली गई वह मुझसे ....अपना वादा तोड़ कर मुझे अकेला छोड़ कर कहां चली गई - मेरी प्रेमिका - वो लड़की !" मेमने को गोद में लेकर मैं बुरी तरह से विलाप करने लगा।

"सर ! जीवित प्राणी पुरानी कसमे वादे निभाते है। इस दुनिया से जाने वाले कसमें वादे न कसमें वादे निभाया करते है और न ही कसमे वादे करते ! " उसी समय चंदन वहां आ गया, "आपकी खुशी मर चुकी है, सर ! वह इस दुनिया से बहुत दूर - दूसरी दुनिया में चली गयी है, सर ! आपकी खुशी वहां चली गई, जहाँ से कोई भी लौट कर नहीं आता। अगर कुछ शेष रह जाती है, तो वो है उसकी स्मृतियाँ, जिसको कभी भी न भुलाया जा सकता है और न ही इसको कभी मिटाया जा सकता।

"सर खुशी कहीं नहीं गई है। वह तो अब हमारे - आपके ह्रदय में बसती है। जब जब आप - हम इस दुनिया रूपी जहर को पीकर भी खुश रहेंगे तब - तब हमारे अंतर्मन में बसने वाली खुशी की आत्मा भी खुश होगी और उसकी आत्मा को शांति मिलेगी। यही उस महान दिव्य आत्मा के प्रति हमारी और आपकी ओर से सच्ची श्रद्धांजलि होगी।"


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उस समय चंदन से बिना कुछ बोले मैं विक्षिप्त की भांति अपना बैग कंधा पर लिए वहां से निकल कर सड़क पर आ गया। मैं बस पकड़ने के लिए मुख्य सड़क की ओर ओर धीरे-धीरे बढ़ने लगा।

तभी मुझे पीछे से कुछ आवाज सुनाई पड़ी। पलट कर देखा - 'मेरी प्रेमिका व मेरी होने वाली पत्नी खुशी' - आज अंतिम यात्रा पर थी। लेकिन रोज की तरह आज - आज वो अकेली नहीं थी। बहुत सारे लोग उसके साथ साथ चल रहे थे।

आज वह लड़की पैदल नहीं थी बल्कि उस महानिद्रा में सोयी - 'मेरी प्रेमिका व मेरी होने वाली पत्नी खुशी' - आज चार लोगों के कंधो पर सवार होकर अपने जीवन की अंतिम यात्रा कर रही थी।

लेकिन होनी की यह कैसी विडम्बना थी। हम दोनों ही उस गांव वो क्षेत्र को हमेशा हमेशा के लिए छोड़ कर जा रहे थे। न खुशी लौट कर आने वाली थी और न मैं। क्योकि अब मेरा वहां रह ही कौन गया था। वहां तो मैं केवल एक स्कुल टीचर था। इससे ज्यादा वहां मेरी कोई पहचान नहीं थी।

लेकिन इसके साथ ही मुझे खुशी के द्वारा किया गया वादा याद आ गई। उसने कहा था कि कल वो मेरे साथ साथ जाएगी और सचमुच आज वो मेरे साथ साथ चल रही थी।

मैं मन ही मन सोचने लगा 'धन्य हो खुशी - तुम धन्य हो - तुम्हारा निष्कलंक निर्दोष प्यार धन्य है !'


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कहते हैं सच्चे प्राणी की प्रतिज्ञा को भगवान भी पूरा करवाते हैं और आज वह मुझे शत प्रतिशत सच लग रहा था। मरकर भी खुशी ने मुझे पहुंचाने का वादा पूरा कर दिया था।

लेकिन कौन किसको पहुंचा रहा था। वह लड़की मुझे पहुंचाने के लिए मेरे साथ चल रही थी या फिर मैं उसकी अंतिम यात्रा में साथ चल कर उसे पहुंचा रहा था। मैं खुले आकाश की ओर देखकर सोचने लगा, खुशी जिस यात्रा पर जा रही थी वहां से वह लौट कर कभी नहीं आने वाले थी। उसका वह कोमल शरीर जिससे प्राण निकल चुके थे, वो नश्वर शरीर अग्नि में जलकर पंचतत्व में विलीन हो जायेगा। सब कुछ समाप्त हो जाएगा। अगर कुछ रह जाएगी तो वह है उसकी स्मृति ....... कभी ना भूल पाने वाला उसका मधुर स्वभाव ...... !

मुख्य सड़क पर आकर मैं पटना जाने के लिए बस के इंतजार में खड़ा हो गया। मैं सड़क पर खड़ा होकर खुशी की अंतिम विदाई को देख रहा था। हम दोनों के रास्ते अब बदल चुके थे। लोग श्मशान घाट की तरफ जाने वाली सड़क पर उसे ले जा रहे थे।

तभी बस मेरे करीब आकर रुक गई। ड्राइवर के द्वारा आवाज देने के बाद मुझे ध्यान आया कि मैं पागल की भांति बीच सड़क पर ही खड़ा था और बगल से जा रही दूसरी सड़क की ओर देख रहा था जिसपर लोग मेरी प्रेमिका, मेरी होने वाली पत्नी - खुशी की अर्थी को ले जा रहे थे।

"क्या यह बस पटना जाएगी !" बेसुध अवस्था में ही मैंने किसी तरह ड्राइवर से बस इतना सा पूछा।

"हाँ जाएगी ! आइये, बैठ जाइये ! सीट खाली है।" ड्राइवर ने सहानुभूति भरी दृष्टि से मेरी ओर देखते हुए बोला। शायद ड्राइवर मेरी मानसिक स्थिति के बारे में समझ गया था।


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मैं बस पर चढ़ गया। पूरी बस खाली थी। उसमें ड्राइवर के अलावे और कोई भी नहीं था। मैं पीछे की एक खाली सीट पर जाकर बैठ गया। मेरे बैठते ही बस पटना के लिए चल पड़ी।

मैं बस की खिड़की से श्मशान घाट की ओर ले जाती खुशी को देख रहा था। श्मशान घाट जाने वाली सड़क मुख्य सड़क के बगल -बगल से हटी हुई कुछ दूर आगे चलकर तिरछी होकर दूसरी दिशा में मुड़ गई थी। मैं अनवरत खुशी की अर्थी को ही देखे जा रहा था। इधर बस अपनी गति से सड़क पर चल रही थी। उधर तो खुशी धीरे-धीरे मेरी आंखों से पहुंच से दूर होती जा रही थी।

उस समय मुझे ऐसा लग रहा था जैसे मैं अपने जीवन की एक सबसे अपने को यही छोड़कर जा रहा हूँ। लेकिन वह अब कहाँ थी ! वह तो अब कहीं नहीं रह गई थी। उसका अस्तित्व तो हमेशा हमेशा के लिए मिट गया था। उसे तो लोग खाक में मिलाने के लिए अपने कंधों पर ढो कर ले जा रहे थे।


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देखते ही देखते खुशी की अर्थी मेरी आंखों की पहुंच से दूर बहुत दूर हो गई थी। मैं हताशा व निराशा भरी दृष्टि से बस की खिड़की से बाहर सुने खेतों में खलिहानो में पागल की भांति खुशी को ढूंढने लगा। सब कुछ जानते हुए भी विक्षिप्त की भांति मेरी आंखें उन सूने खेतो में उन सूने खलिहानो में खुशी को ढूंढने लगी।

तभी मुझे ऐसा लगा कि मेरी बगल वाली सीट पर आकर कोई बैठ गया है।

'लेकिन उस तेज चाल से चलती हुई बस में कौन आकर अचानक से बैठ गया।' बस की खिड़की की तरफ मुंह किये ही मैं उस समय अनमने ढंग से ऐसा सोच ही रहा था कि तभी मुझे आभाष हुआ कि कोई कोमल हांथो से मेरे कंधे व सर को सहला कर मुझे भरोसा दे रही हो।

मैं शून्य में जाती अपनी चेतना शक्ति को बहुत कठिनाई से खींचते हुए धीरे से सिर घुमा कर अपने बगल में देखने लगा। सीट तब भी खाली थी मगर उस पर खुशी के द्वारा दिए गए गिफ्ट वाली वही गुड़िया पड़ी थी, जो उस शीशे के बॉक्स में गहरी निद्रा में सोई हुई थी।

मैं उस गुड़िया को देखकर और भी हताश हो गया। सोचने लगा, ' यह यहाँ कैसे आ गई ! '

तभी मुझे ध्यान आया चंदन ने हीं खुशी के गिफ्ट का बॉक्स टूटने पर उसके अंदर की वह गुड़िया मेरे हाथ में पकड़ा दिया था - ' मेरी प्रेमिका, मेरी होने वाली पत्नी खुशी ' की अंतिम निशानी के रूप में।

उस गुड़िया को देखकर मैं सोचने लगा, 'गुड़िया गहरी निद्रा में सोयी हुई है ..... मेरी खुशी भी तो अब चिरनिद्रा में ही सो चुकी है, दूसरी दुनिया में जागने के लिए !'

तब मुझे महसूस होने लगा था कि खुशी कहीं नहीं गई है। वह मेरे पास ही है। अदृश्य रूप से ही सही मगर वो मेरे पास है। शरीर नहीं रहा उस - सुकुमारी का। मगर मन की आंखों से वह मुझे मेरे बगल में बैठी दिख रही थी।

बहुत गंभीर थी वह। वह रो रही थी इस समय। मगर मैं चाह कर भी उसकी आंखों के आंसू को नहीं पोछ पा रहा था। रो रो कर कह रही थी वो मुझसे - ' सर ! देखते ही देखते यह क्या से क्या हो गया ! क्या सोचा था अब क्या से क्या हो गया ! '

बस अपनी चाल से पटना की ओर बढ़ रही थी और मैं उस - खुशी - की स्मृति में खोया हुआ था जो, अब हमारे जीवन से, हमारे बीच से दूर - बहुत दूर जा चुकी थी... कभी नहीं लौटने ले लिए ...!! !!



smrititak.com - खुशी (अंतिम भाग)



Khushi......!!

"A Very Heart Touching Story in Hindi for Short Film"

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R S


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