वो मेरी पहली और अंतिम पसंद थी - खुशी (भाग - 5)

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smrititak.com - वो मेरी पहली और अंतिम पसंद थी - खुशी (भाग-5)

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अगले दिन में बहुत व्यस्त रहा। दिनभर स्कूल के समय बच्चे तथा स्कूल के बाद जानकारों का मुझसे मिलकर मुझे जन्मदिन की बधाई के साथ साथ गिफ्ट देने का सिलसिला दोपहर ढलने तक जारी रहा।

इसके अलावा कल में एक नए मंजिल की तलाश में अपने कदम बढ़ाने जा रहा था मगर इतने सबके बावजूद मेरे मन में कोई खुशी नहीं थी बल्कि मन में निराशा के घनघोर काले बादल छाते जा रहे थे। मेरा छोटा सा कमरा रंग-बिरंगे गिफ्ट्स से भरा हुआ था मगर ह्रदय घनघोर निराशा से भरा था। मुझे ऐसा लग रहा था मानो, कोई मेरा कोई अपना छूट रहा था। लेकिन मैं समझ नहीं रहा था कि मेरे सुने से अंतर्मन में किसने इतना गहरा स्थान बना लिया था जिसकी कमी मुझे बेचैन किये जा रही थी।

मैं उस निशांत छत पर अकेले टहलता हुआ गहरे विचारों में खोया था। पता नहीं उस विचार को चिंतन कहा जाए या चिंता इसका निर्णय तो मैं गांव छोड़ने के बहुत बाद ही कर पाया था।

हाँ, मुझे ऐसा लग रहा था कि मेरे अंतर्मन को किसी का बेसब्री से इंतजार था। लेकिन कौन था वह .....?

मैं अभी ऐसा सोच ही रहा था तभी सीढ़ी पर से आती पायलों की झनझनाहट की आवाज से मेरी एकाग्रता भंग हो गईं थी। मैं एकाग्रचित्त होकर एकदम से सीढ़ी पर ही देखने लगा।


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वो खुशी थी। आज वह न केवल पायल पहने हुए थी बल्कि बहुत सजी-धजी भी थी। उस समय खुशी सर्वांग सुंदरी दिख रही थी।

खुशी को अपने करीब देखकर अचानक से मेरे मन की सभी निराशा दूर हो गई। मेरा मन प्रसन्नता से भर गया। मैंने महसूस किया कि मेरे अंतर्मन को खुशी का ही इंतजार था जिसके बदले मेरे जीवन में मिलने वाली सभी खुशियां भी मुझे खुशी देने में पूरी तरह से नाकामयाब साबित हो चुकी थी।

मगर ये क्या .......? आज खुशी तो बदली बदली सी लग रही है ........!! आज खुशी के चेहरे पर से खुशी गायब थी। उस समय वह सज सवँर कर भी हताश - सी दिख रहीं थी। बिल्कुल बेसुध सी लड़की ........ !

मैंने आगे बढ़कर अपने दोनों हाथों से खुशी के दोनों बाँहों को पकड़ा। तभी मेरा ध्यान खुशी के हाथों पर गया। वह अपने दोनों हाथो को पीछे किये हुई थी। शायद उसने हाथ में कुछ ले रखा था।

आज बरसों बाद में इतना खुश था। वह भी केवल खुशी के कारण। उस समय तक मुझे यह विश्वास हो गया था कि खुशी ही मेरे जीवन को खुश रख सकती है। वहीं मेरे जीवन की पहली पसंद है।

लेकिन भाग्य की यह कैसी विडंबना है कि जिस खुशी ने मुझे खुशी दी थी आज उसी के चेहरे पर खुशी कोसों दूर थी।


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खुशी निश्छल दृष्टि से मुझे एकटक से ऐसे देखे जा रही थी मानो उसके नेत्रों को मेरे अलावा और कुछ देखने की इच्छा ही न रह गया हो। उसने मुँह से मुझसे कुछ नहीं कहा मगर उसकी आंखों ने उस निशांत से वातावरण में मुझसे वह सबका दिया था जो शायद कोई एक जन्म साथ में रहकर भी न कह पाया हो।

बिना कुछ बोले उसने अपने दोनो हाथो को मेरी ओर आगे बढ़ाया। उसके हाथों में कोई गिफ्ट का डब्बा था।

मैं भाव विभोर होकर उस गिफ्ट का डब्बा उसके हाथों से लगभग छिनते हुए अपने हाथ में ले लिया।

"वेरी वेरी हैप्पी बर्थडे, सर !" खुशी की आंखों में मेरे लिए अपार प्रेम था, "मेरी शुभकामनाएं हैं कि यह दिन आपके जीवन में बार बार आएं। आप सभी संकटो से बचे रहें। आपको मेरी भी उम्र लग जाए .......!!!!"

"खुशी ...........!!! तुमने यह क्या कह दिया मुझसे ! तुमने मुझे अपनी उम्र देने की बात क्यों कह दी। तुमको मालूम है कि तुम मेरे लिए कितना महत्वपूर्ण हो !" मैंने खुशी से कहा, "हाँ खुशी ! तुम मेरी सबसे प्रिय हो। इसका मैंने आज ही आभाष किया है। आज ही मुझे आभाष हुआ है कि मेरा जीवन ही नहीं बल्कि मेरे मन की खुशी भी तुम्हारे बिन अधूरी है। मेरे लिए जहां खुशी है वही तुम हो और जहां तुम हो वही मेरी खुशियां है।"

"हाँ खुशी ! मेरे जीवन की बड़ी से बड़ी उपलब्धि भी तुम्हारी कमी को पूरा नहीं कर सकता है। मंजिल अगर ना मिले तो मैं बर्दाश्त कर सकता हूँ। लेकिन यदि तुम मुझे न मिली तो मैं बर्दाश्त नहीं कर सकता क्योंकि मंजिल मेरे लिए है मैं मंजिल के लिए नहीं हूँ। मंजिल खुशी देने का साधन मात्र है, साध्य नहीं है। लेकिन तुम खुशी देने वाली साधन नहीं बल्कि साध्य हो। तुम ही मेरी वास्तविक मंजिल हो। तुम्हारे बिना मेरी हर उपलब्धि बेकार है, मेरी हर मंजिल अधूरी है। फिर ऐसी परिस्थिति में तुमने मुझे अपने जीवन की उम्र वाली शुभकामना देकर कोई शुभकामना नहीं बल्कि श्राप दे दिया है।"


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"खुशी ! अगर तुम्हें ऐसा ही करना था तो क्यों मेरे मन में अपने प्रेम की भावना को जगाया l क्यों नहीं मुझे अकेले रहने दिया ! क्यों मेरे करीब आई ! क्यों मुझे खुश रहना सिखाया ! खुशी से बोलते बोलते मैं भावुक हो गया l "

"आइम सॉरी सर ! प्लीज मुझे क्षमा कर दीजिये ! दोबारा मैं ऐसी बातें अब नही बोलूंगी l मैं आपसे प्रॉमिस करती हूँ कि आपके नेक्स्ट बर्थ डे पर मैं अपनी उम्र देने वाली बात नही बोलूंगी l "

"मैं जानती हूँ, सर ! आप मुझे बहुत बहुत मानते हैं। भले ही आपने अपने मुंह से कभी भी इसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया मगर आपकी अंतर्मन की भावना ने मुझ अनाथ लड़की को इतने दिनों में कभी मां बनकर तो कभी पिता बनकर कभी भाई बनकर तो कभी सच्चा दोस्त बनकर इतना प्रेम, इतना अपनापन दिया कि मैं भूल गई थी कि मेरा इस दुनिया में कोई नहीं है ...........मैं भूल गई थी कि मैं एक अनाथ लड़की हूँ। आपका दिया गया प्रेम मैं जीते जी तो क्या मर कर भी नहीं भूल सकती। आपकी ये नाराजगी मुझे बहुत पसंद आई है। आज मेरी भी आंखें भर आई है। लेकिन ये आंसू दुःख के नहीं बल्कि अपार खुशी के हैं। अब मुझे पक्का यकीन हो गया है कि मैं अकेली नहीं हूँ। मुझे अब मेरा जीवन साथी मिल गया है।"

"हाँ खुशी ! तुम मेरी पहली और अंतिम पसंद हो। मैं अपने रास्ते बदल सकता हूँ, अपनी मंजिल बदल सकता हूँ लेकिन अपनी पसंद को किसी कीमत पर भी नहीं बदल सकता हूँ !"

"मैं भी आपसे उतना ही प्रेम करती हूँ। मैं आपको कभी भी निराश नहीं करुँगी। मैं भूल से भी आपको कभी धोखा नहीं दूंगी।"

"तो खुशी, आज से तुम मेरी हो न !"


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"मैं तो बर्षो से केवल और केवल आपकी हूँ और आगे भी मैं सदैव आपकी ही रहूँगी ! यह मेरा वादा है। क्योकि मैंने आपसे प्रेम किया है। वैसे भी प्रेम कोई वस्तु नहीं है जिसे बेचा जाए या दुसरो से बदला जाए। प्रेम में तो समर्पण होता है। ऐसा समर्पण जिससे मानव तो क्या भगवान भी वश में हो जाते हैं !"

"मीरा के निर्दोष और निश्छल प्रेम में तो इस सृष्टि के रचयिता भी बस में हो गए थे। फिर उनकी रचना की बात ही क्या है। प्रेम कोई गंदी चीज भी नहीं है, जिसको समाज से छुपाया जाएं l बशर्ते यह निश्छल, निर्दोष, निष्पाप और निस्वार्थ रूप में हो और हम दोनों का प्रेम वास्तव में ऐसा ही निष्पाप है।" खुशी स्थिर दृष्टि से मुझे देखती हुई बोले जा रहीं थी।

"तो ठीक है, खुशी ! मैं अभी तुम्हारे मामा मामी के पास जाकर तुमसे शादी की बात करने जा रहा हूँ। मुझे डर नहीं है आगे क्या होगा और जो भी होगा हम उसे झेलने में एक कदम भी पीछे नहीं हटेंगे।" मैंने खुशी की इच्छा जानकर उसे कहा।

"किसी से भी डरने की जरूरत नहीं है और ना ही कहीं जाने की जरूरत है। हम सब लड़की वाले हैं इसलिए हमारी परंपरा के अनुसार हम सब स्वयं ही आपके दरवाजे पर आए हैं।" खुशी के मामू ने सीढ़ी पर से ऊपर आते हैं मुझसे कहा।

मैंने देखा खुशी के मामू के साथ ही खुशी की मामी भी थी। उन दोनों के पीछे पीछे मेरा दोस्त रवि एवं उनके माता-पिता भी थे। उन सभी को वहां अचानक से आने से मैं चौंक गया। लेकिन खुशी मुस्कुराने लगी।

तब बात मेरी समझ में आयी कि खुशी अपने मामा मामी व रवि सर से पहले ही मुझसे शादी करने की बात पक्की कर ली हैं और यह सब तय योजना के अंतर्गत हुआ हैं। यही कारण था कि वह निश्चिंत थी। क्योकि उसे मालूम था उसकी शादी की बात मुझसे करने के लिए वे लोग आने वाले हैं। उस समय मुझे खुशी की उस प्रबंधन को देखकर जितना आश्चर्य हुआ उतनी ही प्रसन्नता भी हुई।

"हम सब अपनी प्यारी खुशी की शादी की बात आपसे करने आए हैं ! हम सब चाहते हैं कि मेरी प्यारी खुशी के साथ आप शादी करके इसको अपनी धर्मपत्नी बनाएं ! इससे केवल खुशी को ही नहीं बल्कि हम सभी के साथ-साथ इनके स्वर्गवासी माता-पिता और इनके छोटे भाई की आत्मा को भी शांति मिलेगी।" खुशी की मामी ने खुशी के कंधे पर हाथ रखकर मुझसे बोलने लगी।


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उस समय खुशी की मामी बिल्कुल दोस्ताना अंदाज में खुशी के कंधे पर हाथ रखकर उसे और मुझे देख रही थी। उनके चेहरे पर प्रसन्नता छायी हुई थी। खुशी की मामी का व्यवहार खुशी के साथ सहेलीनुमा था।

खुशी की मामी की बातों का समर्थन उसके मामू और मेरा दोस्त रवि व उनके माता-पिता ने भी किया। उन्होंने मुझे खुशी के साथ शादी करने को भी प्रेरित किया। उन्होंने खुशी के साथ साथ मेरे व्यवहार की भी प्रशंसा की।

"आपलोग निश्चिंत रहे ! मैंने खुशी को पहले ही पसंद कर लिया हैं इतना ही नहीं हम दोनों ने एक दूसरे को वचन दिया हैं कि इस जन्म में हम दोनों एक दूसरे की बनकर रहेंगे। हमें कोई मनुष्य तो क्या मृत्यु भी हमें एक दूसरे से अलग नहीं कर सकती हैं। खुशी मेरी हैं और मैं खुशी का हूँ। हमदोनो सदैव एक दूसरे का बनकर रहेंगे। खुशी मेरी होने वाली पत्नी हैं और मैं खुशी का होने वाला पति हूँ। मैं तीन महीने बाद खुशी के साथ शादी करूंगा क्योंकि मैं कल बाहर हूँ। मैं भाई समान दोस्त के पास दिल्ली जा रहा हूँ। वहां मुझे अपनी रोजी-रोटी की व्यवस्था करने में ज्यादा समय नहीं लगेगा क्योंकि मेरे आगे की योजना पहले से ही तय हो चुकी है। जल्दी ही आप लोगों की इच्छा से शादी का दिन तय कर लेंगे। इस बीच खुशी मेरे संपर्क में रहेगी। मेरा मोबाइल नम्बर खुशी के पास हैं ही। मैं आप लोगो को अपने दोस्त का पता और फोन नंबर भी दे रहा हूँ। ताकि यदि मेरा फोन कभी न लगे तो आप उसके द्वारा भी मुझसे संपर्क कर सकते हैं। इसलिए चिंता की कोई बात नहीं हैं। आज से खुशी मेरी हैं और मैं खुशी का हूँ।"


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"चूँकि खुशी के मम्मी पापा नहीं हैं। इसलिए खुशी की शादी का निर्णय हमें ही करना था, जो एक मान्य अभिभावक होने के नाते व अपना कर्तव्य निभाते हुए हमने कर दिया और एक मान्य अभिभावक होने के नाते आज हमने खुशी की शादी आप से तय कर दी हैं। अब शादी के बाद खुशी आपके साथ दिल्ली जाये या अपनी पटना वाली कोठी पर रहे, ये निर्णय मेरी भाँजी खुशी को ही करना हैं।" खुशी के मामू ने उपस्थित लोगो के सामने कहा।

"ठीक हैं ! शादी के बाद खुशी जहाँ रहे, यह खुशी की इच्छा के ऊपर निर्भर हैं, लेकिन खुशी जहाँ भी रहेगी वो मेरे ह्रदय में वास करेगी।" मैंने खुशी को देखते हुए उपस्थित लोगो से कहा।

"वैसे तो मैं आपके ह्रदय में वसती हूँ और आप मेरे ह्रदय में वसते हैं मगर शादी के बाद मैं वही रहूँगी, जहाँ आप रहेंगे।" खुशी ने मुझसे कहा।

उस समय खुशी की मामी ने खुशी को मुझे पहनाने के लिए सोने की एक कीमती चेन दिया, जिसको खुशी ने सभी की उपस्थिति में मेरे गले में डाल दिया।

उसके बाद खुशी के मामू मामी व रवि वहां से चले गए। सभी के चेहरे पे प्रसन्नता थी। उन सभी के जाने के बाद अब खुशी मेरे साथ उस बड़े से बिल्डिंग में बिलकुल अकेली थी।

उनलोगो के जाते ही खुशी मुझसे गले लग कर रोने लगी। खुशी को मैंने भरोसा दिया कि जल्द ही उसे मैं अपनी पत्नी बनाकर साथ रखूँगा और फिर जीवन में हर खुशियां ही खुशियां होगी। दुःख का कोई नामोनिशान नहीं होगा। हर ओर केवल और केवल खुशियां ही खुशियां होगी। खुशी को मैंने भरोसा दिया कि बस दो महीने की दूरी है फिर हम दोनों हमेशा हमेशा के लिए साथ रहेंगे। इसलिए अब चिंता की कोई बात नहीं हैं। ये दो महीने ऐसे ही कट जायेगे। इस बीच फोन पर हम नियमित संपर्क में रहेंगे।

मेरी बातों को सुनकर खुशी प्रसन्न हो गई। उसने मुझसे पूछा, "कल आप यहां से कितने बजे निकलेंगे !"

"वही दोपहर के करीब एक बजे !" मैंने खुशी से कहा।


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"ठीक है ! मैं कल आपके पास 10 बजे ही आ जाऊंगी। फिर आपके साथ यही पर तीन घंटे बिताउंगी और आपके जाने के समय मैं आपके साथ मुख्य सड़क तक आपको छोड़ने भी जाऊंगी। आपको बस पकड़ने के बाद ही मैं वापस आउंगी।"

"हाँ खुशी ! ये ठीक हैं !"

"वैसे तो मेरी इच्छा हैं कि मैं आपके साथ ही दिल्ली चली जाऊँ ! यदि आप चाहे तो !"

"मैं तुम्हारी मन की भावना को समझ रहा हूँ, खुशी ! यदि ऐसा हुआ तो हम वो भी कर सकते हैं क्योकि मैं जिस फ्रेंड के पास जा रहा हूँ, वो आर्थिक रूप से सक्षम हैं। यदि कल तुम बिना किसी तैयारी के भी चल देती हो तो भी वहां दिल्ली में हमे कोई दिक्क्त नहीं होगी। क्योकि वहां पहुंचते ही वो हमारे लिए सारी व्यवस्था तत्काल कर देगा।"

"चिंता मत कीजिये ! मेरे भी भी दिल्ली में कई जानने वाले हैं और पैसे की आप चिंता मत कीजिये। अपने पास पैसे की कोई कमी हैं।"

"तो ठीक हैं ! तो कल तुम भी मेरे साथ चलो। अब हम तुम्हे अकेला यहाँ एक दिन भी नहीं छोड़ सकते हैं। आज ही तुम घर जाकर थोड़ी तैयारी कर लोग और कल दस बजे यहाँ अपना बैग लेकर मेरे पास आ जाओ। कल हम दोनों यहाँ से निकल जायेंगे।"

"ठीक हैं ! यही तो मैं चाहती थी। मैं अब आपके बिना एक दिन भी नहीं रह सकती। मैं कल आपके साथ दिल्ली चलूंगी और वहां से आने के बाद पटना में धूम धाम से शादी करेंगे। पटना में अपना बड़ा सा घर तो हैं ही और पैसे भी हैं ही। बस एक जीवन साथी की कमी थी और आपके आने के बाद वो भी पूरा हो ही गया हैं।" खुशी ने मुझसे गले लग कर कहा, "तो अब मैं आपके साथ यात्रा की तैयारी करने घर जा रहीं हूँ। कल दस बजे मैं अपना बैग लेकर यहाँ आ जाउंगी !"

खुशी मुझसे गले लग कर अंतिम विदाई ली।


Dil Ko Chhune Wali Ek Yadgar Kahani......Khushi


खुशी मेरी ओर लगातार देखते हुए धीरे धीरे सीढ़ी की ओर तरफ बढ़ने लगी। उसके चेहरे पर मुस्कान थी मगर ह्रदय में मुझसे बिछड़ने का गम था। जाते जाते खुशी बीच बीच में मुड़कर प्रेम की कसक भरी दृष्टि से ऐसे देखे जा रहीं थी मानो, उसे मेरे पास से जाने का बिलकुल भी मन नहीं कर रहा हो। उस समय उसकी आँखे आँसुओ से भरी हुई थी।

"खुशी ! चिंता मत करो ! यह वियोग केवल एक रात की हैं। फिर कल से हम दोनों रात दिन हमेशा साथ साथ रहेंगे। फिर हमें कोई भी रोकने वाला नहीं होगा।" मायूस होकर मुझसे दूर जाती हुई खुशी से मैंने जोर से कहा।

मेरे भरोसा देने पर उसने स्वयं ही अपने आंसुओ को पोछकर दूर से ही ऐसे मुस्कुराई, मानो वो मेरी बातो का समर्थन कर रहीं हो।

जाते हुए खुशी को देखकर मैं मन ही मन सोचने लगा,'ऐसी लड़की जिसने मेरे लिए में खुशियों की बहार लायी हैं। वही लड़की मेरी पत्नी बन कर अब कल से हमेशा हमेशा के लिए मेरे साथ रहने वाली हैं और अब दुःख किस बात की जब मेरी जीवन को खुशी देने वाली खुशी में अपने साथ है। '

खुशी अपने मामू के घर की ओर बढ़ रही थी। मैं छत पर से घर की ओर जाते हुए अपनी होने वाली पत्नी खुशी को लगातार देखे जा रहा था। मैं उसे तब तक देखता रह गया जब तक वो मेरी आँखों की पहुँच से ओझल न हो गई।



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अगला भाग :
वो मुझे हमेशा हमेशा के लिए छोड़कर दूर बहुत दूर चली गई - खुशी (अंतिम भाग)

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