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उसकी हर बात में हंसी थी, तभी तो वो खुशी थी - खुशी (भाग - 3)

smrititak.com - उसकी हर बात में हंसी थी, तभी तो वो खुशी थी - खुशी (भाग - 3)

अगले दिन जब खुशी मेरे छत पर आयी तो वह बिल्कुल नए अंदाज में थी। आते ही उसने मुझसे कहा, "आज मैं इस क्षेत्र की कुछ चुनिंदा जोकरों को साथ लाई हूँ। बिल्कुल नई टाईप की है ये सब।"

" खुशी ! कहाँ है तुम्हारे जोकर !" मैंने खुशी से हँसते हुए कहा।

" वे सब नीचे है। ऊपर आने के लिए वे सब मेरे आदेश का इंतजार कर रहे हैं, सर !" खुशी मुझसे ऐसे बोली मानो कोई कमांडो अपने ऑफिसर से बात कर रहा हो।

"क्यों ! उन्हें अपने साथ क्यों नहीं लाई, खुशी ! "

" मैं आपके परमिशन के लिए आई थी, सर !"

" ओके ! परमिशन ग्रांटेड ! "

"थैंक यू सर !"

ऐसा कहकर वह छत के एक ओर की रेलिंग के सहारे अपने सिर को झुका कर नीचे खड़ी उन बच्चियों से बोली, "आ जाओ मेरे सैनिकों !"

सीढ़ी की ओर देखा। वहां पांच छोटी-छोटी बच्चियां आती हुई दिख गई। सचमुच, वे सब के सब बच्चियां महान हंसमुख थे। उनकी हरकते कॉमेडी के सारे रिकार्ड तोड़ने वाले थे। उनकी हरकतों के सामने टीवी पर के सारे कॉमेडी सोज फेल थे। उनकी कॉमेडी देखकर यूट्यूब पर कॉमेडी वीडियो अपलोड करने वाले सारे युट्यूबर भी अपना सिर पकड़ लेते, ये सोचकर कि इस धरती पर उनसे भी बड़े-बड़े कॉमेडियन उपस्थित है और उन्हें एक सफल कॉमेडी यूट्यूब चैनल चलाने के लिए अभी बहुत कुछ सीखना शेष है।

उन बच्चियों को देखकर मुझे ऐसा लगा कि उनको पढ़ाने वाले टीचर को भी उन पर गुस्सा करने के लिए पहले बहुत रिहर्सल करना होता होगा तभी शायद वे उनपर गुस्सा कर पाते होंगे। गुस्सा लाने के लिए उन्हें तरह तरह के प्रयास करने होते होंगे। शायद उनमे एक प्रयास अपने जीवन के सबसे भयानक दुश्मन को याद करना भी हो सकता है और तब भी उन्हें कठिनाई से उनपर गुस्सा आता होगा।


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खुशी की हर बात में हंसी थी। उसके जाने के बाद भी मुझे उसकी बातों और हरकतों को याद करने पर हंसी आ जाया करती थी। लेकिन इसके बावजूद वो कभी कभी बहुत गंभीर भी हो जाया करती थी। कभी-कभी मुझे उसकी ना केवल बातें बल्कि व्यवहार भी रहस्मयी मालूम पड़ता था। मुझे ऐसा लगता था खुशी के – ‘दो चेहरे’ हैं। एक 'बहुत हंसमुख' तो दूसरा गंभीर नहीं बल्कि 'अति गंभीर'। जिसको मुस्कुराये हुए शायद बर्षो बीत गए हों।

लेकिन उसका वास्तविक चेहरा कौन सा था, ये बातें मेरी समझ में नहीं आ रही थी। हंसते-हंसते अचानक से उसका गंभीर नहीं बल्कि अति गंभीर हो जाना और गंभीर होते-होते फिर अचानक से मुस्कुराने लगना।

वैसे ये बातें मेरी समझ में नहीं आयी और फिर इसे दुर्भाग्य कहे या फिर समय की कमी कहे या फिर वहां पर मेरी अति व्यस्तता भरी जीवन कहे, मगर कारण जो भी था, सच्चाई यह थी कि मैं उससे कभी भी इस बिषय पर बात नहीं कर पाया और न ही मैं कभी भी उसके प्रति सहानुभूति प्रकट कर पाया।

लेकिन हाँ, इस सच्चाई पर कोई पर्दा नहीं डाल सकता था कि खुशी एक हंसमुख लड़की थी। नाम के अनुरूप वो सचमुच में खुशी थी। वैसे ये भी एक सच था कि वो अपने नाम का विलोम शब्द ' दुःखी ' की सार्थकता को भी पूर्णतः सिद्ध करती रहती थी। ऐसा प्रतीत होता था उसने अपने जीवन में बहुत दुःख झेले है, ऐसे दुःख जिसने उसका सब कुछ छीन लिया हो। लेकिन वो कौन-सा दुःख था, जो खुशी जैसी एक कमसिन व अति दिव्य सुन्दर बाला को अंदर से इतना तोड़ दिया था।


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अभी कुछ ही समय बीता था कि इसी बीच मेरे बचपन का दोस्त शिशिर मिश्रा का दिल्ली से फोन आ गया। उसने मुझे जल्द से जल्द दिल्ली बुलाया था। वो वहां किसी बड़े राजनीतिक संगठन का सदस्य था। शिशिर मिश्रा मेरे हाई स्कुल का फ्रेंड था। उसके साथ मेरा भाई जैसा रिश्ता था। वो भी मेरे भविष्य को लेकर चिंतित था। क्योकि अब तक मैं जिस भी राह पर चल रहा था, उसमें मेरा भविष्य कुछ भी नहीं था। मैं उस राह पर चल रहा था जिसका कोई ठिकाना नहीं था। वहां गांव में भी मेरा कुछ भी नहीं था। न स्कूल मेरा और न एक इंच जमीन ही मेरी। फिर वो गांव मेरे किस काम के। फिर वो जॉब मेरे किस काम की। स्कूल का मालिक जब चाहता, एक झटके से मुझे हटा सकता था। वहां मैं भले ही अनगिनत बच्चो के जीवन में शिक्षा रूपी प्रकाश फैला रहा था मगर मेरा स्वयं का जीवन वहां अंधकार से भरा हुआ था और ये बातें मुझे हमेशा खटकती रहती थी। इसलिए मैं हर हालत में वो स्थान छोड़ना चाह रहा था और ये मेरे लिए सुनहला अवसर था जब मेरे मित्र ने मुझे दिल्ली में सेट्ल होने का निमंत्रण दिया था।

शिशिर मिश्रा मेरा सगा भाई जैसा अपना था। स्कूल से लेकर इंटरमीडिएट के कॉलेज तक की पढ़ाई हमने साथ-साथ मुंगेर में ही की थी। उसके बाद वह दिल्ली चला गया था और मैं आगे की पढ़ाई मुंगेर में ही रहकर करने लग गया था। उसके विचार और रहन-सहन बिलकुल मेरे जैसे रहे थे। हमदोनो ने गरीबी और असफलता को बहुत पास से देखा था। वो मेरी समस्याओ से पूरी तरह अवगत था। इसलिए उसके प्रस्ताव को इंकार करने का कोई अर्थ ही नहीं था। उसके प्रस्ताव को इंकार करने का अर्थ था अपने पैर में स्वयं कुल्हाड़ी मारना, जो मैं किसी भी कीमत पर नहीं कर सकता था। इसी कारण मैंने तत्काल उसको कह दिया था कि मैं 15 से 20 दिन के अंदर दिल्ली आ रहा हूँ।


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ईधर स्कूल प्रबंधक को भी मैंने अपने निर्णय से अवगत करा दिया। मेरे इस निर्णय से समूचा स्कूल स्तब्ध था। क्या शिक्षक या विद्यार्थी ! सब के सब सदमे में थे। क्योकि वो स्कूल मेरे नाम और काम के कारण चल रहा था। अब मेरे नहीं रहने पर उनका क्या होगा, उनके भविष्य का क्या होगा, सबकी यही चिंता थी। लेकिन मैं अपने भविष्य के साथ कोई समझौता करने को तैयार नहीं था। दूसरे अनगिनत बच्चो का भविष्य बनाने के लिए मैं अपना आगे का जीवन तहस-नहस नहीं कर सकता। क्योकि ये दुनिया मतलबी है। ये लोग तब तक हमारा गुणगान करेंगे जब तक उन्हें हमसे काम निकल रहा है। काम निकलते ही ये हमें ऐसे लात मारेंगे - ऐसे लात मारेंगे कि कल्पना भी करना बेमानी होगी कि कभी इनके लिए भी हमने कुछ किया था। केवल इनके अभिभावक ही नहीं बल्कि ये सब के सब बच्चे भी ऐसा ही करेंगे। वे हमें पहचानने से भी इंकार कर देंगे या फिर इनमें ही कई नमूने तो ऐसे भी निकलेंगे जो धोखेवाजी के साथ साथ कई और भी भयानक घाव देंगे।

धीरे-धीरे मेरे जाने का समय पास आता जा रहा था जबकि खुशी का गांव में कहीं अता-पता नहीं था। चंदन से पूछने पर पता चला कि वह गांव से बाहर गई हुई है। मुझे लगा कि अब खुशी से मेरा मिलना शायद सम्भव नहीं हो पायेगा। क्योकि मेरा उस गांव में न कोई घर द्वार था और न ही मेरा वहां एक इंच की जगह जमीन थी। लोग तो मतलबी होते ही है। स्थान छोड़ने पर कौन किसको अपनी स्मृति में रखता है। इसलिए मुझे लगा खुशी से अब मेरा दोबारा मिलना कभी नहीं हो पायेगा।


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वो गोधूलि वेला था। मौसम अच्छा था। मन में भी प्रसन्नता थी कि अब मेरे भी आगे बढ़ने का समय आ गया। कहते है बारह बर्ष में एक कुत्ते का भी दिन फिरता है। देर से ही सही लेकिन आगे बढ़ने की एक आशा की ठोस किरण मुझे भी दिखी थी। ऐसा लग रहा था अब मेरे भी दिन फिरने वाले है। जीवन में मिलने वाले भांति भांति के लगातार दुःख और असफलता ने मेरे जीवन को नर्क से भी बद्तर बना दिए थे। जीवन की अब कोई चाह नहीं बची थी मगर न जाने किस आशा से इस बोझिल व मनहूस जीवन को ढोये जा रहे थे। जीवन में अब तक जो भी लोग मिले थे सबने अलग अलग तरह के घाव देने के अलावे और कुछ भी नहीं दिया था।

होश सँभालने के बाद जीवन में पहली बार हमारा मन प्रसन्नता का अनुभव किया था। क्योकि अब हमारे भी दिन फिरने वाले थे। लेकिन इसके बीच उस नवयौवना ने भी मेरे मन मस्तिष्क में एक महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था। उसकी अनुपस्थिति ने उस स्थान को रिक्त कर दिया था। लेकिन भविष्य में मिलने वाली सफलता रूपी सुख की मृगमरीचिका उसकी कमी पर भी भारी पड़ गया था। क्योकि जीवन में सुःख क्या होता है उसे मैंने कभी देखा ही नहीं था। एक के बाद दूसरा, दूसरे के बाद तीसरा, तीसरे के बाद चौथा दुःख - बस यही हमारे जीवन की अब तक की सच्चाई थी। इसी कारण अब तक मैं जीवन जी नहीं रहा था बल्कि उसे किसी तरह से ढो रहा था।



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उस संध्या वेला को यही सब मैं सोच रहा था। खुशी की स्मृति मन मस्तिष्क पर छायी हुई थी और उन्ही स्मृतियों को लेकर मैं उस बड़े से स्कूल भवन के फर्स्ट फ्लोर के ओपन एरिया के उस एकांत स्थल पर टहल रहा था। तभी सीढ़ी पर कुछ हलचल सुनाई पड़ी। मुझे आभाष हुआ खुशी आयी है। क्योकि खुशी का आगमन ज्यादातर इसी बेला में हुआ करता था।

तभी अगले की क्षण मेरी दृष्टि एक नन्ही सी बकरी पर गई। वो सीढ़ी पर से होते हुए इवनिंग वाकिंग करने के लिए मेरे पास आयी थी। उस बकरी को देखकर मेरा मन प्रसन्नता से भर गया। क्योकि वो बकरी खुशी की थी। प्रायः संध्या के समय खुशी के आने से पहले वो नन्ही बकरी आया करती थी। वो नन्ही बकरी खुशी के आगमन के प्रतिक थी। मैं समझ गया मेरी खुशी आ गई है।

खुशी के जाने के बाद वो नन्ही बच्ची भी मेरे पास नहीं आ रही थी और आज कई दिनों के बाद वो मेरे पास आयी थी। वो बच्ची छत पर आते ही पहले की भाँति आज भी उस साफ साफ चिकने चिकने फर्श पर बड़े आनंद के साथ टहलने लगी। फिर अगले ही पल खुशी भी मेरे सामने थी। वो पहले ही की भांति मुस्कुराते हुए मेरे सामने आयी। लेकिन इस समय मैं गंभीर था। उसे देखकर मुस्कुरा नहीं रहा था बल्कि मायूस था। दुःखी था क्योकि उस क्षेत्र में मैं कुछ दोनों का अतिथि था। आने वाले समय में न मैं वहां रहूँगा और न ये दिव्य नवयौवना का चेहरा मेरे सामने होगा। सब कुछ एक झटके में बदलने वाला था।


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"क्या हुआ सर जी, आप मुझ पर क्रोधित है। ठीक है। आप का क्रोधित होना बिलकुल सही है। मैंने बिना बताये जाने का जो अपराध किया था। आपका क्रोधित होना बताता है कि आप मुझसे कितना अपनापन रखते है। लेकिन अब मैं वायदा करती हूँ कि अब से मैं कभी बिना बताये आपसे दूर नहीं जाउंगी और अब से मैं आपको कभी भी अकेला नहीं छोडूंगी !"

उस समय खुशी की वे बातें सुनकर मैं और भी परेशान हो गया। अब उसे मैं किस मुँह से बताता कि अगले कुछ दिनों में मैं वो नहीं बल्कि मैं ही उससे दूर और हमेशा के लिए दूर जा रहा हूँ, फिर कभी नहीं लौटने के लिए।

खुशी को अपलक निहारते हुए मैं गहरी चिंता में डूब गया। एक ओर करियर तो दूसरी ओर लड़की। किसको छोड़े किसके पीछे भागे। बड़ा विचित्र धर्म संकट था।


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जीवन में कई ऐसे भी पल आ जाते हैं जब कुछ स्मृतियां टीस बनकर ह्रदय को कचोटने लगती है। अंतर्मन में भावनाओं की तरंगे उत्पन्न होकर जीवन के अस्तित्व को हिलाने लगती है। मैं खुशी को लेकर गहरी चिंता में डूब गया।

"अगर आप मेरे लिए चिंतित है तो छोड़ दीजिए चिंता और फुल इंजॉय कीजिए मेरे साथ और वो भी फुल लाइफ के लिए क्योंकि अब मैं आपको छोड़कर कहीं नहीं जाने वाली हूँ।" खुशी लगभग मुझे लगे लगाते हुए बोल पड़ी।

"हां हां क्यों नहीं !" मैंने अपने गंभीर चेहरे पर बनावटी मुस्कुराहट लाते हुए बोला।

तभी सीढ़ी पर किसी के आने की आहट सुनकर खुशी मुझसे थोड़ी दूर हट गई। मैंने देखा चंदन की बड़ी बहन सोनल मेरे लिए चाय लेकर आई थी। सोनल खुशी की सहेली थी दोनों एक ही कॉलेज में और एक ही क्लास में पढ़ा करती थी।

सोनल के आने के बाद खुशी को और बल मिल गया। वह प्रसन्न होकर सोनम से बोलने लगी, "देखो तो सोनम ! सर जी मुझे भूल गए है। मैं इतने दिनों के बाद आई हूँ। लेकिन मेरे आने पर सर जी खुश होने की बदले और गंभीर हो गए है। मैंने सुना था जुदाई के बाद मिलन होने पर प्यार और भी गहरा होता है। प्रेमी अपनी प्रेमिका को गले लगाकर किस करता है। लेकिन मेरा प्रेमी कैसा है। प्यार करना तो दूर है यह तो मुझसे बात भी नहीं कर रहा हैं और तो और मुझसे दूर होकर मुँह लटकाये खड़ा है।

खुशी और सोनल एक दूसरे के प्रति पूरी तरह से पारदर्शी थे। वे दोनों एक दूसरे के मन की बातें साझा किया करते थे। इसलिए खुशी सोनल से इतना खुलकर बोले जा रही थी।

"मुझे ना सही कम से कम मेरी बकरी की इस छोटी सी बच्ची को तो गोद में उठाकर दुलार करते। बेचारी कितने दिन बाद यहाँ आयी है और सर जी है कि इससे बात भी नहीं कर रहे है।" खुशी इधर उधर टहलते हुए बकरी की उस छोटी बच्ची को अपनी गोद में लेती हुई बोली।

"हां खुशी तुम सही बोल रही हो।" उस समय सोनल के चेहरे पर भी मायूसी थी। वह मेरी ओर देखकर खुशी से बोली, "लेकिन क्या करें। यह समय ही ऐसा है कि सब के सब दुःखी है।

"अच्छा ! ऐसा क्या हो गया सोनल ! मैं तो अभी अभी ही आयी हूँ। इसलिए मुझसे कुछ भी मालूम नहीं है।" खुशी सोनल को ध्यान से देखते हुए बोली, "क्या बात है सोनल ! बताओ न ! सर जी के साथ-साथ आज तुम भी इतना गंभीर दिख रही हो। क्या बात है सोनल, बताओ मुझे ! मेरे जाने के बाद अचानक ये सब क्या से क्या हो गया !"

खुशी उस अज्ञात भय से भयभीत हो गई जिसकी जानकारी अभी उसे नहीं थी।


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"सर जी जा रहे हैं !" सोनल छत के बगल में फैली आम की एक विशाल शाखा पर बैठे दो पक्षियों को एकटक से देखते हुए बोली।

"कहां ?" खुशी ने अधीरता से पूछा। उस समय उसका चेहरा तुरंत मलिन पड़ गया था

"दिल्ली !" सोनल खुशी की ओर न देखकर आम के वृक्ष की डाल पर बैठे पक्षियों के जोड़े को देखते हुए गंभीर मुद्रा में बोली।

"तो फिर कब आएंगे, सर जी !" खुशी सोनल के पास जाकर उसके कंधे को पकड़कर ऐसे बोली मानो उसकी जान अब निकलने वाली हो।

अत्यधिक घबराहट के कारण बोलते हुए में खुशी की आवाज अटक रही थी, "सर जी दिल्ली से फिर कब आएंगे ! बोलो न सोनल ! सर जी दिल्ली से फिर कब आएंगे !"

"कभी नहीं !" खुशी के बहुत पूछने पर सोनल एक ही झटके से बोल पड़ी। सोनल अब भी एकटक से डाल पर के पक्षियों के जोड़े को देख रही थी।


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"क्या !" खुशी निस्तब्ध हो गई। उसकी गोद से छोटी सी वह बकरी की बच्ची नीचे जमीन पर गिर गई। उसी समय उन हलचलों के बीच डाल पर बैठे हुए दो पक्षियों में से एक पक्षी उड़कर उंचे आकाश की ओर चला गया। दूसरा पक्षी डाल पर अकेला बैठा इधर-उधर सिर घुमा घुमा कर शायद अपने साथी को तलाश करने लगा लेकिन उसके साथी अब वहां कहाँ था। वो तो दूर गगन में उड़ गया था। डाल पर बैठा वह अकेला पंछी भी थक कर अपने साथी की तलाश में उड़ गया। मगर दुर्भाग्य से वह पंछी अपने साथी की तलाश में साथी की विपरीत दिशा में उड़ गया था।

"कब जा रहे हैं सर जी !" बहुत देर बाद खुशी अपने आप को संभालते हुए सोनल से बोली।

"परसों दोपहर में !" सोनल खुशी की ओर देखते हुए बोली। वैसे कल सर जी का जन्मदिन है। सभी बधाई देने आएंगे तुम भी आना।


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"यह तुम कह रही हो, सोनल ! सर जी ने तो मुझे नहीं बुलाया न। खुशी की आँखे आंसुओ से नहा रहे थे। वह मेरी और हताश होकर देखे जा रही थी।

"जन्मदिन पर बधाई लोग बुलाकर नहीं लेते है बल्कि लोग स्वयं आकर उन्हें बधाई दिया करते है। सोनल के कड़वे वचन सुनकर खुशी और भी मायूस हो गई। भरी आँखों से निराशा लिए अब भी खुशी मुझे देखे जा रही थी। वो मुझसे बहुत कुछ कहना चाह रही थी। मगर सोनल की उपस्थिति ने उसे चुप रहने पर विवश कर दिया था। लेकिन वो मन की आँखों से बिना कुछ बोले भी मुझे बहुत कुछ बोले जा रही थी। वो उस समय मुझसे भावनात्मक स्नेह पाने की आशा से रो रही थी। हमेशा मुस्कुराने वाला चेहरा आज आंसुओ से भरा हुआ था। खुशी रो रही थी।


"खुशी ! ये क्या ! तुम रो रही हो ! जानती हो, तुमने ही मुझे खुश रहना सिखाया है और आज ....... आज तुम्ही इस तरह से रो रही हो। नहीं खुशी ---- नहीं ! ऐसा नहीं करते ! " खुशी के दोनों बांहो को पकड़कर उसे ढ़ाढस बंधाते हुए मैंने कहा, "खुशी ! तुम अपने आप को कभी अकेला मत समझना ! समझ गई न ! अब तुम अकेली नहीं हो। मैं सदैव तुम्हारे साथ हूँ। मैं केवल दिल्ली जा रहा हूँ। मैं कोई दुनिया से नहीं जा रहा हूँ। चिंता मत करो ! मैं कल भी तुम्हारे साथ था, मैं आज भी तुम्हारे साथ हूँ और कल भी तुम्हारे साथ रहूँगा। तुम कल जरूर आना मैं तुम्हारा इंतजार करूंगा, खुशी ! हाँ खुशी, मैं तुम्हारा इंतजार करूँगा ! तुम कल जरूर आना। मुझे जन्मदिन की बधाई देने के लिए। समझी !"


"ठीक है सर जी ! आप नहीं बुलाते तब भी मैं आती। मैं कल आऊंगी और आपके जाते समय परसो भी आऊँगी और परसो आपके साथ-साथ मुख्य सड़क तक आपको छोड़ने भी जाऊंगी।" खुशी स्थिर दृष्टि से मुझे देखते हुए बोली।


इतना कहकर खुशी बिना फिर आगे एक शब्द भी बोले वहां से जाने के लिए सीढ़ी की ओर बढ़ गई। सीढ़ी पर से उतरकर खुशी नीचे के दरवाजे से होते हुए बाहर सड़क पर आ चुकी थी और मैं ऊपर छत पर से उसे बस उसे देखे जा रहा था।


उस संध्या को खुशी अपनी गोद में बकरी की अबोध बच्ची को लिए धीरे धीरे अपने घर की ओर बढ़ती जा रही थी और मैं ऊपर छत पर से उसे लगातार देखे जा रहा था -- बस उसे देखे जा रहा था। मेरी दृष्टि बस उसे ही देखे जा रही थी। पता नहीं मैं उसे कब तक देखता रह गया और देखते ही देखते कब वो मेरी आँखों की पहुंच से बाहर हो गई थी। खुशी अब जा चुकी थी।


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अगला भाग :
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Khushi......!!

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R S


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