उस रात को छत पर पहुँचते ही मुझे घोर अकेलेपन का आभाष हुआ - खुशी (भाग - 2)

0

Story in Hindi

smrititak.com - उस रात को छत पर पहुँचते ही मुझे घोर अकेलेपन का आभाष हुआ - खुशी (भाग - 2)

साफ साफ सफेद फर्श पर टहलते हुए उसका छोटा छोटा काला रोयेदार शरीर बहुत ही आकर्षक लग रहा था। इधर उधर टहलते हुए वह अपनी छोटी छोटी दो चमकदार आंखों से बीच-बीच में मुझे भी देख लिया करती थी। चार पैर पर चलने वाली उस अबोध बकरी की बच्ची को शायद वो स्थान बहुत पसंद आ गई थी। अपनी छोटी सी पूँछ को इधर उधर हिलाती हुई वो इवनिंग वॉकिंग का आनंद ले रही थी।

लेकिन तभी मुझे उसकी दृष्टि से ऐसा लगा कि वह बिन बुलाए अथिति की भांति अपने आप को तिरस्कृत जैसा आभाष कर रही है। मैंने सोचा हमारी भारतीय संस्कृति में अतिथि को भगवान समझा जाता है और फिर यह तो मासूम जानवर की मासूम बच्ची है। मुझसे मिलने आयी है। मैंने उसे सम्मान के साथ अपने पास बुलाया लेकिन वह नहीं आयी। मैंने सोचा कोई बात नहीं, छोटी बच्ची है। थोड़ा नखरा तो दिखाएगी ही। आगे बढ़ कर उसे गोद में उठाया। आम के पत्ते की तरह उसके दोनों छोटे छोटे कान बहुत अच्छे लग रहे थे। मेरे बोलने पर वो अपनी भाषा में में - में करने लगी। तब मुझे लगा यह बच्ची भी मुझसे बात कर रही है। कुछ देर तक उसे गोद में घुमाने के बाद उसे फिर से इवनिंग वाकिंग का आनंद लेने के लिए निचे फर्श पर रख दिया। अब वो खुश थी। अब वो पहले की भांति तिरस्कृत जैसा आभाष भी नहीं कर रही थी। इस तरह से जल्द ही वो बच्ची मुझसे घुल मिल गई थी।


ये भी पढ़े : Amarjit - A mysterious Man - Horror Thriller Short Film Script in Hindi


Love Story In Hindi

उस समय मुझे बचपन की स्मृति आ गई जब मैं कई जानवरों के छोटे-छोटे बच्चों के साथ खेला करता था। मैं उस बकरी के बच्चे के साथ भी खेलने लगा। उस बच्ची के साथ देर तक खेलता रहा।

उस समय मैं यह भूल गया था कि यहां मेरी छवि एक गंभीर, कड़क टीचर की है जो बहुत कम हंसता है और कम लोगों से मतलब रखता है।

बकरी के छोटे से बच्चे के साथ खेलने में मुझे यह ध्यान ही नहीं रहा कि कोई मेरे निकट आकर खड़ा भी है और फिर तभी मेरी दृष्टि उस लड़की पर पड़ गई जो स्थिर दृष्टि से मुझे देखे जा रही थी। मैं उसे देखकर कुछ देर के लिए असहज हो गया। फिर क्या वो बिना रुके ही वही से जोर से ठहाके लगा के हंस पड़ी। उसके जोर से ठहाके लगा कर हंसने से मुझे और भी बुरा लगा। तो आज यह यहां तक भी आ गई। इसका इतना साहस कैसे हो गया। मैं आगे उससे अभी कुछ बोलना ही चाह रहा था तभी मुझे ध्यान आया शायद यह बकरी का बच्चा इसी का है।

"हो गया खेला हुआ !" उसने किसी प्रकार अपनी हंसी पर नियंत्रण करते हुए मुझसे कहा।

तभी चंदन भी वहां आ गया। वह संध्या से पहले लैम्प का शीशा साफ कर जाता था। वैसे तो वहां प्रायः लाईट रहती थी। मगर फिर भी कभी-कभी नखरीली प्रेमिका की तरह अचानक भागकर जीवन में अंधकार फैला दिया करती थी। चूँकि वहां रात के नौ बजे तक हमारे पास लड़के लड़कियां पढ़ा करते थे। इसलिए उनके जीवन को रोशन करने के लिए हमें नियमित रोशनी की जरूरत थी।


Rajiv Sinha Ki Stories :-Padhiye Rajiv Sinha Ki Kahaniya Smriti Tak Par


"ऐ चन्दन ! देखो न ! मैं सर जी से कह रही हूं कि मेरी इस छोटी सी बच्ची का भी नर्सरी में एडमिशन कर ले !" लड़की लगातार हँसते हुए ही में बहुत कठिनाई चंदन से बोली।

"आपकी बच्ची ! " चन्दन बकरी की उस काली बच्ची को देखते हुए लड़की से कहा।

"मेरा मतलब है मेरी काली बकरी की काली बच्ची !"

"अच्छा तो कौन पढ़ाएंगे आपके इस काली बच्ची को !" चंदन हंसने लगा।

"और कौन पढ़ाएंगे ! स्कूल के टीचर हमारे सामने खड़े हैं वही पढ़ाएंगे इसे !"

लड़की अब भी मेरी ओर देखते हुए लगातार हंसे जा रही थी, "वैसे भी सर जी इस प्यारी सी काली - सी, भोली भाली सी, रोयेदार बच्ची को बहुत मानते हैं और यह बच्ची भी सर जी को बहुत चाहती है ! देखो न ! यह है मेरी गोद में है और देख रही है सर जी को !"

"क्या करेगी पढ़कर आपकी बकरी !" चंदन लैम्प का सीसा कमरा से बाहर बरामदे में लाते हुए बोला।

"करेगी क्या ! पटना के कॉल सेंटर में काम करेंगी और खूब पैसे कमाएंगी !"

"अच्छा !" चंदन हँसने लगा।

"हां चंदन ! यह फोन पर बात करेगी और बोलेगी में - में !"


Heart Touching Love Stories in Hindi-:


ये भी पढ़े :
वह कहाँ गई-Best Heart Touching Love Story for Short Film in Hindi


लड़की की उस हरकत से मुझे यह पता ही नहीं चला कि मैं भी कब हंसने लगा था। वह पहला अवसर था जब वह लड़की मुझसे इतनी निकट आकर मुझसे बातें कर रही थी।

मुझे हँसते हुए देखकर उस लड़की ने अचानक से हंसना बंद कर दिया और स्थिर दृष्टि से मेरी ओर देखते हुए चंदन से बोली, " मैंने सर जी को पहली बार इतना खुश देखा है !"

" सर जी के साथ मैं पिछले एक वर्ष से रह रहा हूँ । सर जी केवल बाहर से कड़क दीखते है जबकि इनका ह्रदय बच्चे जैसा है। " चंदन मेरी प्रशंसा करते हुए उस लड़की से बोला, "यदि आप इन से घुल मिल जाएंगे तो मेरा मानना है कि इनसे अधिक नेक और विश्वासी इस दुनिया में विरले ही आपको मिलेंगे। इनके मन में किसी के प्रति कोई दुर्भावना नहीं है। जो इनको ठीक से समझ आता है वह बस इनका ही होकर रह जाता हैं ।"


Sad Story In Hindi:Khushi


ये भी पढ़े :
Fata Aanchal (फटा आँचल)-Best Award Winning Short Film Story in Hindi


"मैं तो अभी सर जी को पूरी तरह से समझ गई हूँ। अब मैं इनके लिए रोज बकरी की बच्ची को ऊपर लेती आऊंगी।" लड़की मेरी ओर देखते हुए चंदन से बोली। उसके चेहरे को देखकर ऐसा लग रहा था कि वह मुझसे कुछ और ही बोलना चाह रही थी लेकिन संकोचवश वो नहीं बोल पा रही है। उसने कुछ गंभीरता दिखाते हुए बोला, "ठीक है न सर जी !"

उसकी बातों को सुनकर मैं पहली बार उसे देखकर हंसा।

"आज से आप मुझे भी अपना बना लीजिए !" लड़की मेरी ओर देखते हुए धीरे से बोली।

उस की बातों को सुनकर मैं मुस्कुराया लेकिन इस बार उसके चेहरे पर मुस्कुराहट नहीं थी । वह मेरे निकट आई और उन्मुक्त होकर मेरी ओर देखते हुए धीरे से फिर बोली, "सर जी, आज से आप मुझे भी अपना बना लीजिए !"

उसके चेहरे पर गंभीरता थी उसने अपने अंतर्मन में छुपी हुई बातों का उद्धार किया, "बोलिए न ! अपना बनाएंगे न मुझे !"

"हां हा, जरूर।" मेरे मुंह से अचानक निकल पड़ा, "आज से तुम मेरी हो।"

"सच… !" मेरे द्वारा उसकी बात को मान लेने के बाद वह खुशी से इतना जोर से चिल्ला उठी कि चंदन के हाथ लैम्प का शीशा टूट कर नीचे फर्श पर गिर गया और वह चूर चूर होकर बिखर गया।

"हां बिल्कुल सच !" मैंने अपनी बात की पुष्टि करते हुए लड़की से कहा।

लेकिन मेरे द्वारा अपनी बात की पुष्टि करने के बावजूद उस नौजवान लड़की का चेहरा मुरझा गया। कारण यह था कि किसी अच्छे मौके पर शीशा का टूटना अपशकुन माना जाता है। दुख की बात यह थी कि वह अपशगुन तब घटित हुई जब मैं अपनी ही बात की पुष्टि कर रहा था।

एक ऐसी प्रेम कहानी जो दिल को छू जाए......Khushi


ये भी पढ़े :
अमलतास का वृक्ष-एक अत्यंत मार्मिक, ह्रदय को स्पर्श करने वाली यादगार पौराणिक कथा



उस लड़की का हंसता चेहरा तत्काल मलिन पड़ गया था। शायद उसे टूटे हुए शीशे में भविष्य में घटने वाली अनहोनी की झलक दिख गई थी। हमेशा हंसने वाली उस लड़की के मलिन चेहरे को देखकर मुझे बहुत दुख हुआ।

इसका आभाष चंदन को भी हो गया। उसने लड़की के दुख को कम करने के उद्देश्य से थोड़ी अल्हड़पन दिखलाते हुए बोला, " शीशा है, टूटता ही रहता है। फिर नया आ जाएगा।"

जल्द ही चंदन पास पड़े झाड़ू को उठाकर उन टूटे हुए शीशे के टुकड़े को एक तरफ कर दिया।

"मेरे कारण यह शीशा टूट गया।" लड़की गंभीर होकर बोली। उसके चेहरे पर भय और शोक के भाव दिख रहे थे।

उसने मुझसे कहा, " शीशा का टूटना कितना अशुभ है ! है ना सर जी !"


Dil Ko Chhune Wali Ek Yadgar Kahani......Khushi


"माना जाता है लेकिन हमेशा अशुभ होगा ऐसा भी नहीं है।" मैंने लड़की के मन में उत्पन्न अपशगुन के डर को निकालने की भरसक कोशिश की, "तुम यह अपशगुन वाली बात मन से निकाल दो और पहले की भांति प्रसन्न हो जाओ और हां मेरी तरह तुम भी खुश रहने पर ही अच्छी लगती हो !"

मेरी बातों का लड़की का सकारात्मक असर हुआ। उसने कृतज्ञ दृष्टि से मेरी ओर देखा।

" नाम क्या है तुम्हारा ?" मैंने लड़की से पूछा।

" खुशी ! खुशी नाम है मेरा !" उस लड़की ने कहा, "देखिए न ! मैंने आपको भी खुश कर दिया, है न ! सर जी !"

उसकी बातों में बहुत अपनापन था। बोली में मिठास थी। मानो वो जो बोल रही हो ह्रदय से बोल रही हो। उस बाला का व्यक्तित्व जितना आकर्षक था उतना ही आकर्षक उसका मधुर स्वभाव भी था, जिसमें बरबस किसी को भी अपनी ओर खींचने की असीम शक्ति थी।

"ठीक है ! अब मैं जा रही हूँ।" खुशी नीचे जाने के लिए बकरी की छोटी सी बच्ची को गोद में लिए सीढ़ी की ओर बढ़ गई।

सीढ़ी पर से नीचे उतरते हुए उस लड़की को मैं देखता रहा लेकिन उस समय मेरी दृष्टि में उस लड़की के प्रति क्रोध नहीं बल्कि स्नेह था। मेरे मन में बार-बार एक ही शब्द प्रतिध्वनित हो रहे थे - खुशी !


smrititak.com - उस रात को छत पर पहुँचते ही मुझे घोर अकेलेपन का आभाष हुआ - खुशी (भाग-2)

फिर तो खुशी मुझसे मिलने हर दिन मेरे पास आने लगी। स्कूल की छुट्टी के बाद वह ऊपर छत पर मेरे पास आना न भूलती। वह मुझसे खूब बातें किया करती। कभी-कभी वह अन्य सहेलियों को भी साथ ले आया करती थी और वे सब मिलकर खूब बातें किया करते थे।

खुशी मुझसे कम ही दिनों में इतनी घुल-मिल गई थी मानो वो मुझे बहुत पहले से जानती हो। वह मुझसे बहुत बातें करती। कहती, " मेरा नाम खुशी है। मैं सबको खुश कर देती हूँ। देखिए तो, मैंने आपको भी गंभीर से हंसमुख मनुष्य बना दिया। "

मैं वास्तव में इस बात से आश्चर्यचकित था कि कुछ दिनों से सचमुच मेरे स्वभाव में बदलाव आ गया था। मैं एक गंभीर मानव से एक हंसमुख मानव बनता जा रहा था।

प्रायः खुशी मेरे पास आकर बहुत सारी किस्से - कहानियां सुनाया करती थी। मैं उससे कहा करता था कि तुम्हें तो लेखिका होना चाहिए था।

सचमुच खुशी के किस्से कहानियों में हास्य और ह्रदय - स्पर्शी घटनाओं का विचित्र तालमेल हुआ करता था। उसके द्वारा गढ़ित वैसी ह्रदय को छूने वाली कहानियां कोई माहिर लेखक या लेखिका ही बना सकते थे। खुशी की उस प्रतिभा को देखकर मैं अचंभित सा था।


Ek Thi Ladki (एक थी लड़की) ...... Khushi


"यदि भविष्य में कभी मैं कुछ बड़े स्तर पर काम करने लगा तो मैं तुम्हारे लिए जरूर कुछ करूंगा।"

"क्या कीजिएगा मेरे लिए !" खुशी बोली।

"ज्यादा तो कुछ नहीं कह सकता। लेकिन हां इतना तो अवश्य कर सकता हूँ कि तुम्हारे अंदर जो ये लेखिका वाली प्रतिभा है न ! मैं उसे दुनिया के सामने लाऊंगा। तुम एक बड़ी लेखिका कहलाओगी। तुम्हारी राष्ट्रिय स्तर पर एक अलग पहचान होगी। बस ! यही मेरा सपना है।"

"कहां सर जी यह सब तो एक सपना है और फिर सपना तो सपना ही होता है ना !" उस समय खुशी के चेहरे पर अप्रत्याशित गंभीरता छा गई, "यह कब अपना होता है ! यह तो बस टूटने के लिए ही जन्म लेता है !"

"खुशी ! क्या कह रही हो तुम ! " खुशी के चेहरे पर आयी आकस्मिक गंभीरता से मैं चौंक गया।

"सही कह रही हूँ सर जी ! सपना - सपना ही होता है ! इस दुनिया में वे भाग्यशाली लोग होते है जिनके सपने सच हो जाते है और कम से कम मैं तो इतनी भाग्यशाली लड़की नहीं हूँ कि आपने मेरे लिए जो सपने देखे हैं वे पुरे हो जाएँ।

"खुशी ! ये क्या हो गया है तुम्हे !"

"नहीं सर जी - नहीं ! कुछ नहीं होगा ! ये सब झूठे दिलासे हैं। मैं गांव में जन्म ली हूँ और किसी दिन यही मर जाऊंगी। जब तक मेरी जिंदगी है, तब तक मैं इसे हंसकर जी रही हूँ। आने वाला कल तो बस एक सपना है। जो चल रहा है वही बस अपना है।" स्थिर दृष्टि से सामने सुने खेतो की ओर देखते हुए बहुत मायूस सी हो गई थी वो लड़की उस संध्या को।

उस संध्या को खुशी का अत्यंत मायूस होना मुझे बहुत विचित्र सा लगा था।


Wo Larki(वो लड़की)......Khushi


खुशी के मुँह से किस्से कहानी सुनकर मुझे अपनी माँ की स्मृति आती रहती थी। बहुत समानता था दोनों में। मेरी मां भी मुझे हमेशा खुश देखना चाहती थी और मेरी हर छोटी बड़ी इच्छा को अपनी क्षमता के अनुसार पूरी करती थी। भले ही वो अंदर से दुखी रहे मगर मेरे सामने प्रसन्न दिखने का खूब नाटक किया करती थी वह। सोने से पहले प्रायः एक कहानी भी सुनाया करती थी वो।

'लेकिन मेरी मां तो नहीं रही तो क्या -- खुशी भी !!'


'नहीं नहीं!!!!' मैं घबराकर पलंग पर से उठ बैठा। सामने बिजली के बोर्ड में लगे स्विच को दबाकर बल्ब जलाया। बल्ब के जलते ही कमरे में हर ओर प्रकाश ही प्रकाश छा गया। घड़ी देखा। रात के दो बज रहे थे। कमरे और बाहर बरामदे में हर ओर शांति छायी हुई थी। उस समय उस बड़ी सी बिल्डिंग में मेरे अलावे और कोई भी नहीं था। वहां हर ओर सन्नाटा ही सन्नाटा छाया हुआ था। कमरे में एक ओर रखे जग से ग्लास में पानी डालकर पीया।


पानी पीकर कमरे से बाहर खुले बरामदे में आ गया। यहाँ दूर दूर तक सन्नाटा छाया हुआ था।


.......... वो चांदनी रात थी। चांदनी रात होने के कारण वहाँ हर ओर प्रकाश ही प्रकाश छाया हुआ था। लेकिन मेरे ह्रदय में निराशा रूपी घनघोर अंधकार फैला हुआ था। व्याकुल होकर मैं सबसे ऊपर खुली छत पर जाने वाली सीढ़ी पर चढ़ने लगा......!!


......... उस खुली छत पर पहुँचते ही मुझे वहां घोर अकेलेपन का आभाष हुआ। हवा चल रही थी। लेकिन उसमें उदासी थी। दूर-दूर तक वहाँ केवल सन्नाटा ही सन्नाटा छाया हुआ था ! उन सन्नाटो से मुझे बार बार ऐसी आहटे मिल रही थी जैसे आने वाले दिनों में कोई बहुत बड़ी घटना घटने वाली हो ...... !!!!



smrititak.com - उस रात को छत पर पहुँचते ही मुझे घोर अकेलेपन का आभाष हुआ - खुशी (भाग - 2)


ये भी पढ़े :
उसकी हर बात में हंसी थी, तभी तो वो खुशी थी - खुशी (भाग - 3)


********

खुशी की सभी लिंक एक साथ-एक स्थान पर-

ये भी पढ़े : जब पहली बार वो लड़की मुझे दिखी-खुशी (भाग-1)

ये भी पढ़े : उस रात को छत पर पहुँचते ही मुझे घोर अकेलेपन का आभाष हुआ - खुशी (भाग -2)

ये भी पढ़े : उसकी हर बात में हंसी थी, तभी तो वो खुशी थी - खुशी (भाग - 3)

ये भी पढ़े : चेहरे पर हमेशा मुस्कान रखने वाली उस लड़की का वास्तविक जीवन कितना दुखी था - खुशी (भाग - 4)

ये भी पढ़े : वो मेरी पहली और अंतिम पसंद थी - खुशी (भाग - 5)

ये भी पढ़े : वो मुझे हमेशा हमेशा के लिए छोड़कर दूर बहुत दूर चली गई - खुशी (अंतिम भाग)

********


Khushi......!!

"A Very Heart Touching Story in Hindi for Short Film"

Continue......  maker can contact for this story


For business enquiry,

Rajiv Sinha

(Delhi-based Writer / Author)

Screenwriters Association (SWA), Mumbai Membership No: 59004

Mob. +91 8882328898


(सर्वाधिकार लेखक के पास सुरक्षित है। इसका किसी भी प्रकार से नकल करना कॉपीराईट नियम के विरुद्ध माना जायेगा।)

Copyright © All Rights Reserved

Post a Comment

0Comments
Post a Comment (0)

#buttons=(Accept !) #days=(20)

Our website uses cookies to enhance your experience. Learn More
Accept !