कभी-कभी ऐसा देखा गया है कि जो दुष्ट प्राणी दूसरों के लिए गड्ढा खोदता है, वह खुद ही उसमें गिर जाता है।
इस शॉर्ट फिल्म में इसी भाव को दर्शाया गया है। इसमें दो मुख्य पात्र हैं—पहला सुरेश और दूसरा रवंश कुमार। दोनों में एक संवेदनशील इंसान है तो दूसरा पापी; एक नेक दिल है तो दूसरा दुष्ट आत्मा।
शॉर्ट फिल्म पटकथा (शुरुआती झलक)
पारुल अपनी फ्रेंड निशि के साथ जब पहली बार अपनी एक दूर की आंटी के घर जाने के लिए बस से उतरती है, तो वहाँ दूर-दूर तक कोई नहीं होता। सड़क पर पूरी तरह सन्नाटा छाया होता है। मुख्य सड़क से दो अलग-अलग रास्ते दो अलग दिशाओं में जाते हुए दिखते हैं।
मगर पारुल को किस रास्ते पर जाना है, यह उसे मालूम नहीं है। एड्रेस तो है, लेकिन रास्ता बताने वाला वहाँ कोई मौजूद नहीं। पारुल आंटी को सरप्राइज देना चाहती थी, मगर थककर जब वह फोन लगाती है तो फोन 'नोट रीचेबल' बताता है। तभी उन्हें सामने वाली सड़क से एक आदमी—सुरेश—आता हुआ दिखाई देता है।
पारुल उस अनजान आदमी से नैनसी गाँव का रास्ता पूछती है। सुरेश बताता है कि वह जिस रास्ते से आया है, वही रास्ता नैनसी गाँव की ओर जाता है। लेकिन गाँव यहाँ से छह किलोमीटर दूर है और वहाँ जाने के लिए शाम से पहले कोई साधन भी उपलब्ध नहीं है। रास्ता बेहद सुनसान है। दोनों लड़कियाँ सोच में पड़ जाती हैं कि अब क्या करें, क्योंकि लौटने के लिए भी बस शाम को ही मिलेगी।
तभी दूसरी ओर जाने वाली सड़क से रवंश कुमार बाइक चलाता हुआ आता है। रवंश लड़कियों के करीब आकर बाइक रोकता है और उन्हें गाँव तक छोड़ने की बात कहता है। मगर वह गाँव जाने का रास्ता दूसरी दिशा में बताता है...
अब लड़कियाँ किस पर विश्वास करें? कौन सच बोल रहा है... और कौन झूठ? लेकिन तभी...
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