भारतीय राजनीति में समय-समय पर ऐसे कई संगठन और आंदोलन सामने आते रहे हैं जो स्वयं को जनता की आवाज़ बताकर स्थापित करने की कोशिश में लगे रहे हैं। हालांकि कुछ संगठन वास्तव में जनहित के मुद्दों को उठाते हैं, लेकिन अधिकांश ऐसे रहे है जिनका उद्देश्य केवल राजनीतिक माहौल का लाभ उठाकर, या फिर जनता की भावनाओ के साथ खिलवाड़ करके अपने लिए स्थान सुरक्षित करना रहा हैं।
आज देश में जिस कॉक्रोच जनता पार्टी को लेकर चर्चा हो रही है, उसे लेकर भी कई प्रकार की प्रतिक्रियाएँ सामने आ रही हैं। जहाँ भाजपा विरोधी इसे व्यवस्था परिवर्तन की नई आशा के रूप में देख रहे हैं, तो ठीक उसी के विपरीत आलोचक इसे विपक्ष की हताशा के एक उदाहरण के तौर पर देख रहे है। लेकिन इनके हालियां कार्यों को देखकर यह कहना भी गलत नहीं होगा कि यह केवल एक और राजनीतिक प्रयोग है, जिसका उद्देश्य जनता की समस्याओं का समाधान नहीं बल्कि एक विशेष वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाना है।
कॉकरोच जनता पार्टी : अपने बयानों के कारण संदेह के घेरे में
हाल के दिनों में सोशल मीडिया पर 'कॉक्रोच जनता पार्टी' (CJP) का यह उभार देश के अनेको लोगो के लिए एक विशेष प्रकार की राजनीतिक कौतूहल जैसी स्थिति उत्पन्न कर दी है। जहाँ एक तरफ इसके समर्थक इसे एक नया वैचारिक आंदोलन मान रहे हैं, वहीं दूसरी तरफ राजनैतिक विश्लेषकों और अनेको लोगो के बीच इसके वास्तविक एजेंडे, इसकी फंडिंग और इसके पीछे काम कर रही अदृश्य ताकतों को लेकर गंभीर प्रश्न भी उठने लगे हैं।
इस संगठन के अब तक के कार्यों और बयानों को देखते हुए कुछ विश्लेषकों का मानना है कि इस संगठन का उद्देश्य किसी युवा नेतृत्व को आगे बढ़ाने या देश की वास्तविक समस्याओं पर सरकार का ध्यान आकर्षित करना नहीं है बल्कि एक विशेष वैचारिक एजेंडे को आगे बढ़ाना है। जानकारों का मानना है कि इसकी राजनीति का केंद्र राष्ट्रहित कम और सत्ता विरोध अधिक दिखाई देता है। लोगो का मानना है कि मूल रूप से यह भारतीय जनता पार्टी विरोधी संगठन दीखता है न कि जनता के हितो को उठाने वाली पार्टी। यही कारण है कि इसके समर्थकों में वे लोग ही अधिक भरे हैं जो वर्षों से भारतीय जनता पार्टी और हिंदुत्व की विचारधारा के विरोध में सक्रिय रहे हैं।
भारतीय राजनीति में ऐसे संगठनों का आगमन कोई नई बात नहीं
भारतीय राजनीति में यह पहली बार नहीं हुआ है जब किसी नए संगठन को “व्यवस्था परिवर्तन” के नाम पर समाज में लाया गया हो। चाहे राज्य स्तर पर हो या केंद्र स्तर पर, जनता ऐसे प्रयोग पहले भी देखती आई है। चाहे बिहार में प्रशांत किशोर के नेतृत्व में जन सुराज पार्टी हो—जो बिहार के विगत चुनावों में अपना खाता तक नहीं खोल पाई—या फिर अन्य क्षेत्रीय दल, जनता ने सबके काम को परखा है।
प्रमुख क्षेत्रीय दल और उनके राजनीतिक प्रयोगों की हकीकत:
• अरविंद केजरीवाल की 'आम आदमी पार्टी': लगभग एक दशक पहले बनी यह पार्टी शुरू में बहुत विख्यात हुई थी। उस समय केजरीवाल एक ईमानदार और संघर्षशील जननेता के रूप में उभरे, जिन्होंने दिल्ली की राजनीति में कांग्रेस और भाजपा दोनों की जड़ों को चुनौती दी। लोगों को लगा कि राजनीति में पहली बार उनके बीच का आदमी आया है। पर दुर्भाग्य से, वे इस विश्वास पर खरे नहीं उतर पाए। वही मुस्लिम तुष्टीकरण वाले वोट बैंक की पॉलिसी और हिंदू विरोधी मानसिकता सामने आई। केजरीवाल ने अपने ट्विटर (आज X) हैंडल के एक पोस्ट में पूरे विश्व के हिंदुओं की आस्था पर खुलेआम चोट करते हुए स्वास्तिक के चिह्न को झाड़ू से मारते हुए दिखाया था। परिणाम यह हुआ कि आंदोलन और पारदर्शिता के नाम पर शुरू हुई यह पार्टी, धीरे-धीरे उसी पारंपरिक राजनीतिक शैली में उतर गई जिसका विरोध करके वह अस्तित्व में आई थी।
• समाजवादी पार्टी: कभी उत्तर प्रदेश में सपा को अजेय माना जाता था, लेकिन बदलते राजनीतिक समीकरणों में लोगों को उसके वास्तविक उद्देश्य सब समझ आने लग गए और समय के साथ वह कमजोर होती गई।
• तृणमूल कांग्रेस (TMC): पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी की पार्टी ने तो सारी हदें ही पार कर दीं। बंगाल की पहचान दुर्गा पूजा से है, जबकि उनके शासन में दुर्गा पूजा तक मनाने पर पाबंदी लगा दी गई थी। स्थिति यह थी कि वहाँ के लोगों को इसके लिए कलकत्ता हाई कोर्ट का सहारा लेना पड़ा। इसके अलावा, तुष्टीकरण में राष्ट्रहित को किनारे रखकर घुसपैठियों को शरण देना और राज्य के हिंदुओं के साथ शरणार्थियों जैसा बर्ताव करना शामिल रहा। जनता ने उन्हें भी ऐसा सबक सिखाया जिसका अनुमान टीएमसी के कार्यकर्ताओं को भी नहीं था।
• शिवसेना (उद्धव गुट): इसी प्रकार वैचारिक समझौतों और विरोध की राजनीति के कारण महाराष्ट्र में उद्धव ठाकरे की राजनीति का भी पतन हो गया। इन उदाहरणों से स्पष्ट होता है कि केवल लोगों को भटकाने वाले नारों, विरोध की राजनीति और मुस्लिम तुष्टीकरण के दम पर अब राजनीतिक रोटी नहीं सेंकी जा सकती। इसके लिए राष्ट्र और जनता के प्रति निष्ठावान बनना पड़ता है।
सोशल मीडिया का युग: रातों-रात लोकप्रियता की क्रांति
आज सोशल मीडिया के दौर में किसी भी नए संगठन को रातों-रात लोकप्रिय बनाया जा सकता है। कुछ प्रभावशाली चेहरे, कुछ आक्रामक बयान, कुछ वायरल वीडियो और एक विशेष प्रकार की प्रचार रणनीति, बस इन सबके माध्यम से ऐसा माहौल तैयार किया जाता है कि मानो कोई नई क्रांति आने वाली हो। लेकिन किसी भी संगठन का इतनी तेज़ी से देशव्यापी स्तर पर फैलना कई प्रश्न भी खड़े करते हैं। राजनैतिक विश्लेषकों के बीच इस बात को लेकर भी चर्चाएं तेज़ हैं कि इस पूरे अभियान और इसके आक्रामक प्रचार-प्रसार के पीछे किस तरह के संसाधन या देसी-विदेशी तत्व काम कर रहे हैं? जब किसी आंदोलन के वैचारिक और वित्तीय स्रोत पूरी तरह स्पष्ट न हों, तो उसकी नीयत पर संदेह होना एक आम धारणा है। लेकिन भारतीय मतदाता अब पहले की तुलना में कहीं अधिक जागरूक है। जनता केवल नारों से प्रभावित नहीं होती, बल्कि समय के साथ काम और चरित्र दोनों का मूल्यांकन करती है।
'कॉकरोच जनता पार्टी' — क्या यह वास्तव में “जनता की पार्टी” है?
कई लोगों को इस नए संगठन में एक वैकल्पिक राजनीति की उम्मीद दिखाई दे रही है। लेकिन इतिहास बताता है कि केवल भाजपा विरोध या हिंदुत्व विरोध के आधार पर कोई स्थायी राजनीतिक शक्ति तैयार नहीं की जा सकती। देश की जनता विकास, सुरक्षा, रोजगार, सुशासन और सांस्कृतिक पहचान जैसे मुद्दों को भी उतना ही महत्व देती है। यदि कोई संगठन केवल विरोध की राजनीति करेगा और मुस्लिम तुष्टीकरण के दम पर आगे बढ़ना चाहेगा और कोई जनता के सामने कोई सकारात्मक दृष्टिकोण प्रस्तुत नहीं करेगा, तो उसका भविष्य भी उन्हीं दलों जैसा हो सकता है, जो कभी अपने समय में बहुत जनाधार रखने की लिए जाने जाते थे।
भविष्य का असली विपक्ष या सिर्फ एक बुझता हुआ दीया?
भारत की राजनीति में जनता अंतिम निर्णायक होती है। कोई भी संगठन कितनी भी बड़ी बातें कर ले, कितनी भी वैचारिक लड़ाई लड़ ले, अंततः जनता उसके काम, नीयत और व्यवहार को देखकर ही निर्णय करती है। यही लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति है। इसलिए किसी भी नए राजनीतिक प्रयोग को लेकर अंधभक्ति या अंधविरोध दोनों से बचना चाहिए। जनता को हर संगठन और हर नेता का मूल्यांकन तथ्यों, काम और राष्ट्रीय हित के आधार पर करना चाहिए।
संभव है कि आने वाले समय में यह संगठन भी उसी रास्ते पर जाए जिस पर पहले कई राजनीतिक प्रयोग किये जा चुके हैं। शुरुआत में उत्साह, फिर बड़े दावे, उसके बाद आंतरिक विरोधाभास और अंत में जनता का मोहभंग — भारतीय राजनीति इस चक्र को कई बार देख चुकी है। इसलिए आवश्यक है कि देश की जनता भावनाओं के बजाय विवेक से निर्णय ले और हर नए राजनीतिक चेहरे को समय की कसौटी पर परखे।
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