सरला भट्ट की चीखें बनाम मनमोहन-यासीन की हंसी: नेहरू से राहुल तक कांग्रेस का पूरा सच

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सांकेतिक चित्र (AI द्वारा निर्मित)

कश्मीर की वादियों में जब एक निहत्थी हिंदू स्त्री, सरला भट्ट, दरिंदों के बीच अपनी इज्जत और जिंदगी की भीख मांगते हुए चीख रही होगी, तब उसकी आवाज़ तत्कालीन दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक नहीं पहुँची। लेकिन इसके ठीक विपरीत, जब उसी मासूम सरला भट्ट की आबरू लूटने और उसे गोलियों से भूनने वाला नरपिशाच यासीन मलिक नई दिल्ली आता है, तो देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री आवास पर तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह के चेहरे की मुस्कान और आतंकियों के प्रति उनकी आवभगत देखते ही बनती है। अच्छी बात यह है कि उन दोनों की वे मधुर मुलाकात कैमरे से नहीं बच पायी नहीं तो आज के तथाकथित विपक्षियों की टीम फिर कहती - 'सबूत दिखाओ !'


कश्मीर में एक हिंदू बेटी की दर्दनाक चीखें और देश की राजधानी में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह की वो 'शर्मनाक' हंसी - भारतीय राजनीति के इतिहास का वह सबसे काला और घिनौना विरोधाभास है, जिसे चाहकर भी कभी मिटाया नहीं जा सकता। पूरे 36 वर्ष के लंबे और कष्टदायी इंतजार के बाद, जम्मू-कश्मीर पुलिस की स्टेट इन्वेस्टिगेशन एजेंसी (SIA) द्वारा दाखिल 737 पन्नों की चार्जशीट ने आखिरकार इस बात पर मुहर लगा दी है कि कश्मीरी हिंदू नर्स सरला भट्ट के अपहरण, अमानवीय क्रूरता, सामूहिक बलात्कार और हत्या का मुख्य मास्टरमाइंड कोई और नहीं, बल्कि प्रतिबंधित JKLF का सरगना यासीन मलिक ही था। यह चार्जशीट केवल एक कानूनी दस्तावेज नहीं है, बल्कि जवाहरलाल नेहरू से लेकर राहुल और प्रियंका गांधी तक, पूरी कांग्रेस लीडरशिप के उस वैचारिक और नैतिक पतन का एक जीवंत प्रमाण पत्र भी है, जिसने वोट बैंक की खातिर हमेशा हिन्दुओ के खून की सौदेबाजी की।



जवाहरलाल से लेकर राहुल-प्रियंका तक: गांधी-नेहरू परिवार का 'हिंदू-विरोधी' सन्नाटा



कांग्रेस की इस जनघाती सोच की जड़ें आज की नहीं, बल्कि आजादी के समय से ही गहरी हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी इस परिवार ने केवल तुष्टीकरण के एजेंडे को आगे बढ़ाया है:


जवाहरलाल नेहरू की ऐतिहासिक भूलें: कश्मीर की समस्या को संयुक्त राष्ट्र (UN) में ले जाकर उलझाने वाले और वहां धारा 370 का बीज बोने वाले जवाहरलाल नेहरू ही थे। उन्होंने घाटी में शेख अब्दुल्ला को खुली छूट दी, जिसने भविष्य में कश्मीरी पंडितों के उत्पीड़न का आधार तैयार किया। नेहरू की इसी अदूरदर्शिता की कीमत सदियों तक हिंदुओं को चुकानी पड़ी।


इंदिरा गांधी और राजीव गांधी का मौन समर्पण: जब 1989-1990 में कश्मीर में मस्जिदों से "रलीव, गलीव या चलीव" (रहो, मरो या भागो) के नारे गूंज रहे थे। वास्तव में, यह कश्मीरी भाषा है और इनके अर्थ क्रमशः - रलीव (Raliv) इसका अर्थ है "हममें मिल जाओ" यानि "धर्म परिवर्तन कर लो", गलीव (Galiv) इसका अर्थ है "मर जाओ अर्थात मरने के लिए तैयार हो जाओ !" चलीव (Chaliv) इसका अर्थ है "यहाँ से भाग जाओ" या कश्मीर छोड़ दो! उस समय देश में हिन्दुओ पर इतनी बड़ी आफत आयी हुई थी और केंद्र की राजनीति में, सरकारी तंत्र के अधीन चलने वाले दूरदर्शन समाचार में पूरी तरह शांति थी। केंद्र की सत्ता के अधीन वाले सभी अखबारों की हेडलाइनों में वे मुद्दे नदारत थे। क्योकि सत्ता में कांग्रेस कांग्रेस फन मारकर बैठी थी। कांग्रेस हिन्दुओ के पक्ष में बोलती भी कैसे ! ये तो उनलोगो से मिली हुई थी। राजीव गांधी ने कश्मीरी हिंदुओं के उस वीभत्स पलायन और नरसंहार पर संसद से लेकर सड़क तक चुप्पी साधे रखी। बाद के आये सभी कांग्रेसी प्रधानमंत्रियों ने भी उसी परंपरा को कायम रखा, चाहे नरसिंहा राव हो या फिर बाद में दो कार्यकालों तक रहे मनमोहन सिंह। सब के सब एक जैसे। चेहरा अलग काम एक।


सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह का 'रेड कारपेट' वेलकम: 2006 में तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सोनिया गांधी के इशारे पर प्रधानमंत्री आवास में यासीन मलिक को बुलाकर उसके साथ मुस्कुराते हुए फोटोशूट करवाया। जिस हाथ पर सरला भट्ट और वायुसेना के जवानों के खून के दाग थे, उस हाथ को देश के पीएम ने सहलाया।



राहुल गांधी और प्रियंका गांधी वाड्रा की सेलेक्टिव संवेदना


आज मुस्लिमों के लिए देश की कोने-कोने में जाकर अपनी राजनीतिक रोटियां सेकने पहुंचने वाले राहुल और प्रियंका गांधी के मुंह से कभी कश्मीरी पंडितों या सरला भट्ट का नाम तक नहीं निकला। उत्तर प्रदेश में प्रियंका गांधी "लड़की हूँ, लड़ सकती हूँ" का नारा देती हैं, लेकिन सरला भट्ट जैसी कश्मीरी हिंदू बेटी के साथ हुई क्रूरता और बलात्कार पर उनका यह फेमिनिज्म और संवेदना पूरी तरह दम तोड़ देती है। राहुल गांधी विदेशों में जाकर भारत के लोकतंत्र पर व्याख्यान देते हैं, लेकिन अपनी ही पार्टी द्वारा आतंकियों को दिए गए संरक्षण पर हमेशा मौन व्रत धारण कर लेते हैं। गाजा के लिए सोनिया गाँधी सहित सभी कांग्रेसी आंसू बहा रहे है पर मजाल है, इनके मुँह से कभी हिन्दुओ पर हो रहे क्रूरता का जिक्र आये।



35 साल बाद खुली पाप की किताब: 737 पन्नों की गवाही


सरला भट्ट के अपहरण और वीभत्स हत्याकांड के मामले में पूरे 36 वर्ष बाद न्याय की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम उठाया गया है। जांच एजेंसियों ने इस जघन्य अपराध को अंजाम देने वाले गुनहगारों के खिलाफ अदालत में 737 पन्नों की एक विशाल और विस्तृत चार्जशीट दाखिल की है। इस आधिकारिक दस्तावेज में न केवल सरला भट्ट के साथ हुई अमानवीय क्रूरता की पल-पल की कहानी दर्ज है, बल्कि इसमें प्रतिबंधित अलगाववादी संगठन जेकेएलएफ (JKLF) के पूर्व सरगना यासीन मलिक और उसके गुर्गों की उस गहरी साज़िश को भी बेनकाब किया गया है, जिसके तहत घाटी में कश्मीरी हिंदुओं को चुन-चुनकर निशाना बनाया गया था। दशकों तक फाइलों में दबे इस सच का 737 पन्नों के आधिकारिक दस्तावेज के रूप में सामने आना, कांग्रेस और तत्कालीन हुक्मरानों के उस सिस्टम के मुंह पर करारा तमाचा है जिसने इतने सालों तक इस पर पर्दा डाले रखा।



सरला भट्ट कांड: कांग्रेस के संरक्षण में दबाई गई फाइलें


18 अप्रैल 1990 को श्रीनगर स्थित शेर-ए-कश्मीर इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (SKIMS) हॉस्पिटल की नर्स सरला भट्ट को यासीन मलिक के सहयोगी आतंकवादियों ने अगवा किया। कई दिनों तक बंधक बनाकर उनके साथ सामूहिक बलात्कार किया गया, घोर अमानवीय यातनाएं दी गईं और फिर गोलियों से छलनी कर उनकी नग्न लाश सड़क पर फेंक दी गई।


कांग्रेस समर्थित सरकारों ने इस वीभत्सु कांड की फाइलों को 36 सालों तक ठंडे बस्ते में डाले रखा। सबूत नष्ट किए गए, बैलिस्टिक रिपोर्ट गायब की गईं, ताकि यासीन मलिक और उसके जैसे अलगाववादी नेताओं का 'सेक्युलर' चेहरा खराब न हो। कांग्रेस के लिए सरला भट्ट की चीखें मायने नहीं रखती थीं, उनके लिए मायने रखता था कश्मीर का अलगाववादी इकोसिस्टम, जिसे वे दिल्ली में बिरयानी खिलाकर पाल रहे थे।



"संसाधनों पर पहला हक": तुष्टीकरण का कांग्रेस मॉडल


यह वही कांग्रेस पार्टी है, जिसने मुस्लिम तुस्टीकरण के लिए सारी सीमायें पार कर दी। मनमोहन सिंह ने प्रधानमंत्री रहते हुए सरेआम कहा था कि "देश के संसाधनों पर पहला अधिकार अल्पसंख्यकों, विशेषकर मुस्लिमों का है।" जबकि सबको पता है मुस्लिम देश में अल्पसंख्यक भी नहीं है। देश की कमजोर न्यायिक व्यवस्था, कमजोर सरकार और मुस्लिमों के अपने स्वयं के अजेंडे के कारण इनकी संख्या तेजी से बढ़ रही है।


हिंदू आतंकवाद का झूठा नैरेटिव: चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे जैसे कांग्रेसी गृहमंत्रियों के कार्यकाल में, मुस्लिम वोट बैंक को खुश करने के लिए 'भगवा आतंकवाद' और 'हिंदू आतंकवाद' जैसे झूठे शब्द गढ़े गए। हिंदुओं को आतंकवादी साबित करने के लिए पूरी सरकारी मशीनरी लगा दी गई, जबकि असली आतंकवादी जैसे यासीन मलिक और बिट्टा कराटे दिल्ली के फाइव स्टार होटलों में सरकारी खर्च पर ऐश कर रहे थे।


आज जब 36 साल बाद सरला भट्ट को कानूनी रूप से इंसाफ मिल रहा है और यासीन मलिक के पापों का घड़ा फूट चुका है, तो देश को यह याद रखना होगा कि इस इंसाफ की राह में सबसे बड़ा रोड़ा कौन था। जवाहरलाल नेहरू से शुरू हुआ हिंदुओं की अनदेखी का यह सिलसिला राहुल और प्रियंका गांधी तक आज भी बदस्तूर जारी है।


स्मारकों और भाषणों में खुद को देश का रहनुमा बताने वाले इस राजनीतिक कुनबे का असली सच यही है कि इन्होंने सत्ता के लिए हमेशा आतंकवादियों के सामने घुटने टेके और हिन्दुओं के स्वाभिमान व सुरक्षा का सौदा किया। 'स्मृतिटक' के माध्यम से आज देश की जनता के सामने यह कड़वा सच आना जरूरी है कि कश्मीर के घावों के पीछे केवल आतंकी संगठन नहीं थे, बल्कि दिल्ली में बैठी कांग्रेस सरकार और गांधी-नेहरू परिवार की सरपरस्ती भी उतनी ही जिम्मेदार थी।


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