वह गरीब थी लेकिन स्वाभिमानी थी; उसके पास धन का अभाव था मगर वह महत्वाकांक्षी थी। एक छोटे से शहर के साधारण कॉलेज से पढ़ी निशा दिल्ली के बड़े स्टूडेंट्स पर भारी पड़ती थी, क्योंकि उसकी आँखों में देश की टॉप ब्यूरोक्रेट्स में शामिल होने का अटूट सपना था।
गरीब की बेटी बनी कलेक्टर - प्रेरक लघु फिल्म पटकथा
(दिवाकर घर आता है। वह थका हुआ और बीमार सा दिखता है। घर आकर गिलास में पानी पीता है और एक ओर बैठ जाता है। तभी दूसरे कमरे से उसकी बेटी निशा उसके पास आती है।)
निशा: पिताजी! आप कब आए? मुझे पता ही नहीं चला।
दिवाकर: बेटी तुम पढ़ाई में लगी थी न, इसलिए पता नहीं चला। आज तबियत ठीक नहीं लग रही थी और थकावट भी थी, तो सोचा घर जाकर आराम करूँ।
निशा: यह तो आपने अच्छा किया पिताजी! आप बैठिए, मैं आपके लिए चाय बनाकर लाती हूँ।
(चाय बनाकर लाती है और देती है)
दिवाकर: रख दो बेटी! (पैसे निकालते हुए) यह लो बेटी पाँच हजार रुपये! तुमने कहा था न कि परीक्षा की तैयारी के लिए नोट्स लेने हैं।
निशा: जी पिताजी! (पैसे लेती है)
दिवाकर: निशा, आज दुकान में बिक्री भी ज्यादा नहीं हुई थी। लेकिन क्या करें, भाग्य में जितना संघर्ष लिखा है वह तो भोगना ही पड़ेगा।
निशा: (हाथ छूकर देखती है) पिताजी! आपको तो तेज बुखार है! आप चाय पीकर आराम कीजिए, मैं अभी डॉक्टर साहब से दवाई लाती हूँ।
(दवाई लेकर निशा वापस आती है)
निशा: यह लीजिए पिताजी! डॉक्टर ने कहा है चिंता की कोई बात नहीं है, बस मौसम बदलने का असर है।
दिवाकर: सब भगवान की कृपा है बेटी, वरना हम गरीब लोग गंभीर बीमारी का खर्च कहाँ से उठा पाएंगे! अब तो बस एक ही सपना है कि तुम आईएएस (IAS) परीक्षा में सफल हो जाओ।
निशा: कोशिश तो पूरी कर रही हूँ पिताजी, आगे ईश्वर की इच्छा!
दो दिन बाद...
निशा: क्या हुआ पिताजी? आज फिर आपको वैसा ही बुखार लग रहा है!
दिवाकर: हाँ निशा, लगता है दवा का असर खत्म हो गया है।
निशा: आप आराम कीजिए, मैं डॉक्टर साहब से कोई कड़ा पावर वाली दवा लेकर आती हूँ।
(निशा दवा लेकर लौटती है, उसके चेहरे पर गंभीर चिंता है)
निशा: पिताजी, डॉक्टर ने कहा है कि बिना मेडिकल टेस्ट करवाए अब और दवा नहीं दे सकते।
दिवाकर: मेडिकल चेकअप...! इसमें तो काफी पैसे लगेंगे। लेकिन तुम मुझसे कुछ छिपा रही हो निशा... बताओ डॉक्टर को क्या शक है?
निशा: पिताजी, वह तो रिपोर्ट के बाद ही साफ़ हो पाएगा।
दिवाकर: एक तरफ तुम्हारी पढ़ाई का खर्च, घर का खर्च और अब मेरी बीमारी... पर तुम चिंता मत करो! जब तक मैं हूँ, तुम्हारी तैयारी रुकने नहीं दूंगा। यमराज भी आए तो खाली हाथ लौटेगा, क्योंकि तुम्हें अफ़सर बने बिना मैं मरने वाला नहीं हूँ!
अगला दिन (रिपोर्ट का दिन)...
(निशा मेडिकल रिपोर्ट्स लेकर आती है, उसकी आँखों में आँसू हैं)
दिवाकर: निशा बेटी... निराश नहीं होते। रिपोर्ट्स में जो है, उसका अंदाज़ा डॉक्टर ने मुझे कल ही दे दिया था। देखो, मेरे चेहरे पर कोई शिकन नहीं है।
निशा: (रोते हुए) पिताजी... आप मेरे सामने मुस्कुरा रहे हैं ताकि मेरा मनोबल न टूटे, लेकिन कल रात मैंने आपको अकेले में रोते देखा था! मैं आपकी आँखों से गिरे एक-एक आँसू की सौगंध खाकर कहती हूँ—मैं किसी भी कीमत पर यूपीएससी (UPSC) क्लियर करके रहूँगी! मैं आईएएस ऑफिसर बनकर ही रहूँगी!
कहानी जारी है...
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