फटा आँचल - Best Award Winning Short Film Story

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जहाँ गरीबी और मासूमियत का दम घुटता है — राजीव सिन्हा की एक मार्मिक रचना


❄️ जमा देने वाली ठंड और कोहरे में सिमटा गाँव

वह जनवरी महीने का प्रातःकाल था। जनवरी महीना ऐसा महीना हैं जो वर्ष का सबसे अधिक शीतल और सबसे अधिक कष्टदायी भी होता हैं। जनवरी महीने की ठंडक का स्मरण करके ही शरीर काँप उठता है।


अब ग्रामीण क्षेत्र होने के कारण वहां ऊँचे - ऊँचे ईमारते तो नहीं थे, लेकिन इतना तो जरुर था की वहां कुछ ऐसे भी घर थे जो अनायास ही हमारे मानस पटल पर पुरानी कला-सस्कृति और राजा - महाराजाओ के समय की याद दिला जाती थी। उन घरो के बीच जाने वाली सकड़ी-सकड़ी गलियां और सकड़ी सड़के ग्रामीण समाज के विकास के दौड़ में आज भी पिछड़े रहने के प्रतीक के रूप में जरुर दिखते थे।


लेकिन उस दिन वे सकड़ी गलियां, सड़के और दूर-दूर तक फैले सपाट खेत-खलिहान, सब के सब घने कोहरे की प्रकोप का ऐसे शिकार हो गए थे, मानो गाँव के गाँव का अस्तित्व ही मिट गया हो। समूचा क्षेत्र घने कोहरे और जानलेवा ठण्ड की चपेट में था। सुबह के उस समय में दृश्यता मात्र चार से पांच मीटर ही रह गई थी। शीत लहर और तेजी से गिरती ओस ने शीतलता को इतना बढ़ा दिया था, मानो वह ईलाका किसी इन्सान तो क्या, किसी जीव के बसने लायक ही न रहा हो। सारा ईलाका मरघट की भांति ऐसे वीरान पड़ा था, मानो वहाँ कोई मानव तो क्या कोई नीव जन्तु भी नही बसता हो। जिधर देखो, उधर सन्नाटा और देखने के लिए दृश्यता भी कहाँ थी। कोहरे के कारण मुश्किल से चार से पांच मीटर दूर ही तो देखा जा सकता था। गाँव, गली, सड़क, खेत-खलिहान हर ओर बस सन्नाटा ही सन्नाटा छाया हुआ था।



🔥 अलाव के ईद-गिर्द सिमटी दुनिया

हाँ, कुछ साहसी लोग इतना सब होने पर भी अपने घरों के द्वार पर लकड़ी और पुआल का अलाव लगाकर ठंड को चुनौती देने में ज़रूर लगे हुए थे। प्रकृति की इस निष्ठुरता के कारण जहाँ किसान अपने खेतों, मजदूर अपने काम पर, और अन्य व्यवसाय में लगे लोग अपने-अपने व्यवसायों पर नहीं जा पा रहे थे, वहीं पढ़ाई करने वाले छात्र-छात्राएँ भी घर पर बैठे रहने के लिए बेबस थे। लेकिन जिसने भी प्रकृति की इस क्रूरता के विरुद्ध संघर्ष करने का साहस दिखलाया, प्रकृति ने उसे बड़ी निष्ठुरता से मार डाला और वे काल के ग्रास बन गए।


न जाने हर बार गरीब और बेबस मनुष्य ही इसका शिकार क्यों होते हैं? अमीरों के पास तो कई सुख-सुविधाएँ होती हैं, साधन होते हैं, और उनके विकल्प भी होते हैं। मगर गरीब क्या करे? ऐसी जानलेवा ठंड से बचने के लिए वह कैसे अपना तन ढके, घर में रहकर कैसे अपना और अपनों का पेट भरे?


इस ठंड में गरीबों के पास घुरा (अलाव) ही उसका जीवन-रक्षक और सच्चा साथी होता है। मगर दिन-रात अलाव लगाकर आग तापने से तो पेट नहीं भरेगा। पेट भरने के लिए तो भाग-दौड़ करनी ही होगी, काम करना होगा। लेकिन इस ठंड में काम भी कैसे हो?


न जाने गरीबों से ही हर बार इतनी कड़ी परीक्षाएँ क्यों ली जाती हैं? हर साल अखबारों में और रेडियो व टीवी के समाचारों में ठंड से अनेकों लोगों के मारे जाने के समाचार आते हैं। मगर फिर भी हर साल वही ठंड, वही मृत्यु, वही समाचार और वही हम...!!



👧 भीषण ठंड और छह साल की मासूम रूबी

लेकिन क्या किया जाए? जब तक जिंदगी है, तब तक संघर्ष है, तब तक चुनौती है। और उस दिन उस जानलेवा ठंड को चुनौती देते हुए छः वर्ष की छोटी सी रूबी स्कूल जाने के लिए तैयार थी। छः वर्ष की उस दुबली-पतली मासूम रूबी एक फ्रॉक और पुराने हाफ स्वेटर के बल पर उस काल-रूपी ठंड को चुनौती देती हुई हाथ में एक कॉपी व दो पुरानी किताबें लेकर घर के दरवाजे से बाहर निकलती हुई अपनी माँ से बोली --


'माय! हम स्कूल जाय हियो!' (माँ, मैं स्कूल जा रही हूँ……!)


“आज स्कूल मत जा, बेटी...!"


"बहुत ठंड है! जान चल जैतो हमर नुनु!" (जान चली जाएगी, मेरी नुनु/बेटी!)


मगर रूबी तो कुछ और ही सोच रही थी। माँ की बात को अनसुना करती हुई रूबी घर के दरवाजे से तेजी से निकली। घर के बाहर द्वार पर खूंटे से बंधी हुई गाय पुआल में मुँह घुसाए निष्प्राण सी बैठी थी। रूबी गाय की ओर देखती हुई आगे निकल गई। पड़ोसी के द्वार पर दो-तीन लोग घुरा (अलाव) ताप रहे थे। रूबी उन लोगों के करीब से गुजरने के बाद भी उन्हें नहीं पहचान पाई। एक तो कुहासा और दूसरे मुँह तक ढके ओढ़ने। रूबी उन लोगों की भी अनदेखी करती हुई सड़क पर आ गई। सड़क पर सन्नाटा, उँसाँसे भरती हुई शीतल वायु, हर ओर कुहासा! धरती पर मानो बादल ही उतर पड़ा हो।



🐾 प्रकृति का कहर, बेज़ुबाँ की ममता और मासूम रूबी का अटूट हौसला

एक ओर प्रकृति का इतना भयानक कहर और दूसरी तरफ नन्ही सी, छोटी सी, दुबली-पतली, क्षीण काया वाली रूबी, जिसके पैर में चप्पल भी नहीं थी। प्रकृति के उस भयानक कहर के सामने भी रूबी के हौसले को तोड़ना नामुमकिन साबित हो रहा था / वह नाकाम साबित हो रही थी। रूबी सड़क पर जाकर अपनी सहेली कजरी को पुकारने लगी--


'कजरी... ऐ कजरी... कजरी... ऐ कजरी, कहाँ है? हम स्कूल जा रहे हैं, चलेगी नहीं हमारे साथ?'


मगर प्रत्युत्तर में न कोई आवाज आई और न ही कोई वहाँ आता हुआ दिखा।


आज रूबी को अकेले ही स्कूल जाना पड़ेगा। खाली पैर, घुटनों तक की पतली फ्रॉक, हाफ स्वेटर, घुटनों के नीचे तक उघड़े पैर और जबर्दस्त ठंड! फिर भी हौसला बुलंद। रूबी पीठ तक आई अपनी छोटी सी उलझी चोटी को हिलाती हुई हाथ में कॉपी-किताब लिए स्कूल जाने वाली सड़क पर बढ़ गई।


थोड़ी दूर आगे जाने पर रूबी ठिठककर खड़ी हो गई।


'ये क्या?.... सड़क के बीच में यह गोल सा काला पत्थर कहाँ से आ गया?..... कल तो यह नहीं था!' रूबी मन-ही-मन सोचने लगी।


फिर वह कुछ सोचकर आगे बढ़ी। नजदीक जाने पर उसने देखा कि जिसे वह गोल सा काला पत्थर समझ रही थी, वह पत्थर नहीं, बल्कि उसकी सहेली, गली की कुतिया कजरी थी। रूबी को अपने आप पर हँसी आ गई।


'ये कुहासा भी न!' रूबी अपने चेहरे पर आई कुहासे की बूँदों को पोंछते हुए अपने आप से बोली।


कजरी रोज उसके साथ घर से स्कूल तक जाती थी और स्कूल से लौटते वक्त बीच रास्ते में उसके साथ हो जाती थी। इस तरह कजरी रूबी की पक्की सहेली बन गई थी। उस समय कजरी अपने समान काले रंग वाले दो छोटे बच्चों को अपने में चिपकाए बिल्कुल गोल बनकर बैठी थी।


"जाएगी नहीं स्कूल!" रूबी उस काली कुतिया को छूते हुए बोली।


रूबी के छूने पर कुतिया रूबी की ओर देखती हुई मद्धिम आवाज में कूँ-कूँ करने लगी। मानो वह कह रही हो—'बहुत ठंड है, बच्चे भी छोटे हैं, अपने छोटे बच्चों को छोड़कर जाने का मन नहीं कर रहा है आज।


रूबी की आवाज से उसके दो छोटे-छोटे काले रंग वाले बच्चे भी नींद से जग गए। वे दोनों भी रूबी को अपनी छोटी-छोटी आँखों से ऐसे देखने लगे, मानो कह रहे हों—'बहुत ठंड लग रही है। हम माँ की गोद में हैं। मेरी माँ को कहीं चलने के लिए मत कहो आज।


उस नन्ही सी रूबी को कजरी और उसके दो नन्हे दूधमुँहे बच्चों पर दया आ गई। रूबी ने कुछ दूर खलिहान में पड़े पुआल के कुछ गट्ठर लाकर सड़क किनारे रख दिए।


"कजरी, इस पर आकर बैठ जा, बहुत ठंड है न! इस पर बैठने से तुम्हे ठंड नहीं लगेगी! आ जा!"


कुतिया ऐसी थी मानो वह सचमुच में रूबी की बात समझ रही हो। वह वहाँ से उठकर रूबी के द्वारा बिछाए गए पुआल पर बैठ गई। कजरी के पीछे-पीछे उसके दोनों छोटे बच्चे भी अपनी माँ से चिपककर बैठ गए।


"अब हम जा रहे हैं, ठीक है?" रूबी आगे बढ़ते हुए बोली।


“कूँ-कूँ-कूँ,” कुतिया रूबी को जाते हुए देखकर मुँह से अलग-अलग आवाज निकालने लगी। उसके दोनों छोटे-छोटे बच्चे भी अपने कान खड़े करके रूबी को दुखी होकर देखने लगे।


मानो वे सब रूबी को स्कूल जाने से रोक रहे हों और कह रहे हों—“मुझे पुआल की गर्मी का अहसास कराकर तुम क्यों इतनी ठंड में जान से खेलने जा रही हो? जाओ, घर लौट जाओ।”


“कूँ-कूँ-कूँ……” कजरी अब भी बोलती जा रही थी। उस समय कजरी की आँखों से आँसू बह रहे थे।


“अब क्या हुआ, कजरी? तुम अपने बच्चों के साथ आराम करो! हम स्कूल से आ रहे हैं, ठीक है?” रूबी एक बार फिर घूमकर कजरी से बोली और फिर तेजी से स्कूल की ओर बढ़ गई।



👻 सनसनाती हवा, पेड़ों का खौफनाक सन्नाटा और "जय माँ दुर्गा" का साहस

खाली पैर, कम कपड़े, घुटनों तक उघड़े पैर और हड्डी कपकपा देने वाली ठंड! लेकिन रूबी आगे बढ़ रही थी। ओस की बूंदों से उसका चेहरा भर चुका था। वह सब दुखों को बर्दाश्त करती हुई आगे बढ़ रही थी। तभी उसे सड़क के एक किनारे पीपल का पेड़ और दूसरे किनारे नीम का पेड़ दिखा। उसके पैर ठिठक गए।


दूर-दूर तक कोई नहीं! पेड़ों से अजीब-अजीब सी आवाजें निकल रही थीं। ओस की बूंदों का ऊँचाई पर स्थित पत्तों से लुढ़ककर नीचे के पत्तों व जमीन पर गिरने से टप-टप की आवाज आ रही थी। उस शांत वातावरण में वह आवाज बहुत भयावह लग रही थी। हवा उसाँसें भर रही थी। पूरा माहौल भूताहा लग रहा था। रूबी को अचानक याद आया कि गाँव वाले कहते हैं कि इन दोनों पेड़ों पर चुड़ैल रहती है। अब वह क्या करे?


रूबी का कलेजा धक-धक करने लगा। एक बार मन किया कि जोर से माँ को पुकारे, लेकिन माँ तो वहाँ नहीं थी। वहाँ तो दूर-दूर तक कोई भी नहीं था! क्यों आई वह अकेले? माँ तो उसे स्कूल जाने से मना कर रही थी, लेकिन वह माँ की बात नहीं मानी। वैसे वह भी क्या करती? आज स्कूल जाना भी तो जरूरी था।


तभी उसे माँ की बात याद आई— माँ कहती है, "दुर्गा माय चुड़ैल को भगा देती हैं। ...... जय माय दुर्गा, जय माय दुर्गा, जय माय काली, जय माय काली……” जपते हुए रूबी दौड़कर आगे निकल आई।

🥶 सुन्न पड़ते हाथ-पैर, हल्कू चाचा का अलाव और सपनों की ओर फिर एक दौड़

अब रूबी पीपल व नीम के पेड़ से बहुत दूर आ चुकी थी। दौड़ते-दौड़ते वह थक भी गई थी, लेकिन ये क्या...? उसके हाथ-पैर कहाँ हैं? रूबी को उस समय ऐसा लग रहा था जैसे उसके हाथ-पैर हैं ही नहीं! उसने अपने हाथ और पैर की ओर गौर से देखा—अरे... ये तो हैं ही नहीं...! एक हाथ से दूसरे हाथ और पैर को छुआ तो वे सुन्न... थे! वह घबरा गई। तभी उसे ध्यान आया कि कुछ दूर पर हलकू चाचा का घर है।


“हलकू चाचा, हलकू चाचा! मेरे हाथ-पैर नहीं हैं।” ठंड से कपकपाती छोटी-सी, भोली-भाली रूबी हलकू चाचा के करीब जाकर बोली। हलकू चाचा सब समझ गए। रूबी के हाथ-पैर ओस से भीगे थे। पैरों में घास-फूस सटे हुए थे।


हलकू चाचा ने दौड़कर नन्ही रूबी को गोद में उठा लिया। रूबी का पूरा शरीर बर्फ (की तरह ठंडा) था। हलकू चाचा पास में ही लगे घूरे (अलाव) के पास उसे ले गए और कुछ देर उसके हाथ-पैर को आग से सेकते रहे। तब जाकर रूबी को चैन मिला।


ठीक होते ही रूबी, चाचा की गोद से उछलकर स्कूल की तरफ भागी। चाचा बहुत मना करते रहे, लेकिन वह नहीं मानी। कुहासा अब बहुत कम हो गया था और अब स्कूल भी नजदीक ही था। मंजिल के करीब पहुँचते-पहुँचते रूबी को अपनी आशाएँ पूरी होती हुई दिखने लगीं, जिसके लिए उसने माँ की बात काटी, कजरी की मूक मनाही पर भी आगे बढ़ी, चुड़ैल वाले पीपल के पेड़ को भी दुर्गा माय का नाम लेकर पार कर गई, और हलकू चाचा के मना करने पर भी भागी।



💖 आशा में बहुत शक्ति है, मगर कमजोर भी यही बनाती है -- माँ का फटा आँचल और नन्हीं रूबी के ख़ूबसूरत सपने

आज स्कूल में पैसा मिलेगा। दो दिन पहले ही उसने पाँचवीं क्लास में पढ़ने वाले रोहित भैया से पूछा था। उसी ने आज का दिन बताया है।


रूबी के सपने सच होने का समय आ गया था। वह स्कूल की ओर बढ़ रही थी और मन-ही-मन सोच रही थी—


‘कितनी ठंडक है! उसके पास चप्पल भी नहीं है। उन पैसों से वह अपने लिए चप्पल खरीदेगी। पड़ोस में रहने वाली उसी की उम्र की झुनकी कितनी अच्छी चैन (ज़िप) वाली स्वेटर पहनती है! वह सुंदर-सुंदर, लाल रंग की स्वेटर पहनकर छत पर खड़ी होकर उसे अपना स्वेटर दिखाती है। उसने भी माय (माँ) से वैसा स्वेटर माँगा था। माँ कहती है, “फसल अच्छी नहीं हुई, तो पैसा कहाँ से लाएँ?”’


लेकिन अब वह इन पैसों से अपने लिए खूब अच्छा-सा स्वेटर खरीदेगी—बिल्कुल झुनकी जैसा! वह माँ के साथ बाजार जाएगी। अगर बाजार जाएगी, तो लाल रंग का एक स्कार्फ भी लेगी, जैसा कि उसकी सहेली बिंदा लगाती है। कुछ पैसों से वह अपनी माँ के लिए भी स्वेटर खरीदेगी। बेचारी के पास एक भी स्वेटर नहीं है! कितना मानती है वह हमको! एक बार जब वह काली बिल्ली देखकर जोर से चिल्लाई थी, तब माँ अपने खाने के लिए ले जा रहे दूध का कटोरा दूर फेंकते हुए कैसे उसके पास दौड़कर आई थी! उस दिन वह भूखी ही रही थी, फिर भी उसको गोदी में लेकर दिनभर दुलार करती रही थी।


बाबूजी कहते हैं, एक बार वह हॉस्पिटल में तीन दिन तक बेहोश थी। तब भी माँ तीन दिन तक उसके पास ही रही और उसके लिए रोती रही। बहुत अच्छी है माँ उसकी! दस दिन पहले की बात है, वह गोयठा (उपला) लेने गई थी, तब वह गोयठा पर एक बिच्छू को देखकर कितनी जोर से चिल्लाई थी! माँ उस बिच्छू को मारने के बाद भी उसे दिनभर गोदी में लेकर ऐसे बैठी रही, मानो बिच्छू ने उसे काट ही लिया हो।


फिर वह माँ के दूध नहीं होने पर भी उसके ब्लाउज़ को हटाकर उसे पीने लगी थी और तब माँ ने उसके पूरे शरीर को अपने आँचल से ढक दिया था। लेकिन वह उसके मुँह को कहाँ ढक पाई थी? माँ का आँचल तो फटा था, उसका मुँह तो उघार ही रह गया था! तब रूबी को कितनी हँसी आई थी यह देखकर और फिर उसको हँसते देखकर उसकी माँ भी तो हँसने लगी थी! इसलिए अब वह उन पैसों से माँ के लिए एक साड़ी भी खरीदेगी।


सोचते-सोचते रूबी को अचानक से याद आया, "फिर जो पैसे बच जाएँगे, उससे रुनकी जैसा एक स्कूल बैग लूँगी और काली कलम भी लूँगी, और हाँ... एक कॉपी भी लूँगी!"


🏫 मंज़िल की चौखट, इकलौती फ्रॉक की लाचारी और गरीबी का अहसास

रास्ता कट गया। अब तो वह अपनी मंजिल पर पहुँच ही गई! कितना कष्ट उठाकर आज वह स्कूल पहुँची है। स्कूल का भवन दिखते ही रूबी को अपना छोटा सा स्वप्न पूरा होता हुआ जान पड़ा। शरीर में ठंड से कंपकंपी थी, फिर भी अपनी जरूरतें पूरी होने का उल्लास, निश्चित रूप से शरीर के इस दुखदायी कष्ट पर भारी पड़ रहा था।


खाली पैर, कुछ दिन पहले खरीदा हुआ फ्रॉक, घुटनों के नीचे तक उघड़े पैर, हाफ स्वेटर, पीठ पर लटकती हुई छोटी सी चोटी, हाथ में कॉपी-किताब लिए मासूम सी नन्ही रूबी स्कूल के गेट से जल्दी से अंदर आई।


रूबी को याद है, माँ ने कुछ दिन पहले ही उसके लिए एक फ्रॉक खरीदा था—कहीं आने-जाने के लिए। वही एक फ्रॉक है उसके पास, जिसे पहनकर वह महीनों स्कूल आती-जाती है। उसकी सहेली झुनकी के पास तो एक-दो नहीं, चार-चार फ्रॉक हैं! झुनकी के पास तो सूट भी है। लेकिन उसके पास तो बस एक ही फ्रॉक है। बाजार भी वह उसी फ्रॉक को पहनकर जाती है। किसी रिश्तेदार या परिवार के यहाँ भी माँ उसे वही फ्रॉक पहनाकर ले जाती है। अब माँ भी क्या करे? उसके पास इतने पैसे ही नहीं हैं कि बाहर-भीतर पहनने के लिए उसे और भी फ्रॉक खरीदकर दे सके। स्वयं माँ के पास भी तो इस जानलेवा ठंड में अपना शरीर बचाने के लिए एक स्वेटर तक नहीं है, ओढ़ने के लिए शॉल भी नहीं है!


🏫 स्कूल में पैसों की चहल-पहल, मास्टर जी का भय और रूबी का बढ़ता इंतज़ार

रूबी ने देखा कि स्कूल में आज बहुत सारे बच्चे आए हुए हैं। सभी बच्चे उस ठंड में भी बहुत खुश नज़र आ रहे हैं। पैसे जो मिलने हैं, वे भी बहुत खुश हैं। उसको भी आज पैसा मिलेगा।


सारे सर जी भी आ गए हैं। कुछ सर जी तो हेड सर के ऑफिस में हैं। पैसे का हिसाब-किताब जो करना है। रूबी भी हेड सर जी के ऑफिस का नजारा देखना चाहती है। कुछ बच्चे खिड़की से अंदर झांक रहे हैं। अरे, उन बच्चों में तो उसकी सहेली झुनकी भी है! फिर रूबी को भी वहीं जाना चाहिए। मन में ऐसा विचार आते ही रूबी दौड़कर झुनकी के पास पहुँची। कुछ सर जी अटेंडेंस रजिस्टर देख रहे हैं।


तभी सभी बच्चे भागने लगे। कोई बच्चों को वहाँ से भगा रहा था। रूबी भी सभी बच्चों के साथ वहाँ से भागी। कुछ दूर भागने के बाद वह रुक गई। अरे, वह तो सुधीर भैया हैं, वही हमलोगो को वहाँ से भगा रहे थे! सातवीं में पढ़ते हैं। अगले साल हाई स्कूल में नाम लिखवाएँगे। सर जी से ज्यादा सुधीर भैया ही बच्चों पर शासन करते हैं। बड़े जो हैं! देखो तो हमसब को भगाकर वह किस तरह खिड़की के पास खुद खड़े हो गए! साथ में मनोहर भैया और दिनेश भैया भी हैं। सब के सब बहुत बदमाश हैं। खैर, इससे रूबी को क्या! वह उनसे लड़ने थोड़ी जाएगी।


अब जल्द ही सर जी उसके वर्ग में आएँगे। उसका नाम पुकारेंगे। फिर वह सर जी के पास जाएगी। सर जी उसके हाथ में पैसे देंगे। फिर क्या? फिर वह घर चली जाएगी। बस! और पैसे माँ के हाथ में रख देगी। माँ कितना खुश होगी!


वो देखो, बाइक से पंकज सर भी आ गए! पंकज सर ही शहर से पैसे लाते हैं। अब तो स्कूल में पैसा भी आ गया। तभी तो खून को जमा देने वाली ठंडी हवा के साथ-साथ भोला सर भी सरकंडे की पतली डंडी लिए बच्चों को वर्ग की ओर खदेड़ने लगे हैं। बच्चों को वर्ग की ओर खदेड़कर भोला सर निश्चित हो गए।



🧱 बर्फ़ीला फर्श, एक बोरी का सहारा और मासूम दोस्ती की गर्माहट

अब सभी बच्चे अपने-अपने क्लास रूम आ चुके हैं। कुछ दादागिरी करने वाले लड़के जो एक-दो शिक्षक के करीबी भी हैं, वही बाहर हैं। बाकी सभी बच्चे अपने-अपने वर्ग में आ चुके हैं। रूबी भी अपनी सहेली झुनकी के साथ अपने वर्ग में पहुँच चुकी है। झुनकी उसका हाथ पकड़े हुए जमीन पर बैठने के लिए एक सही स्थान की तलाश कर रही है। स्कूल में सर जी के बैठने के लिए तो कुर्सियाँ हैं, मगर इस जानलेवा ठंड में बच्चों के बैठने के लिए एक भी बेंच किसी भी वर्ग में नहीं है।


सभी बच्चे नीचे बैठने के लिए अपने साथ लाई बोड़ी बिछाने लगे। लेकिन रूबी तो अपने साथ बोड़ी लाई ही नहीं! वह तो बोड़ी लाना भूल गई। अब क्या होगा? उसे बर्फ जैसी ठंडी जमीन पर ही बैठना होगा। नहीं, उसकी सहेली झुनकी जो है, उसके साथ! झुनकी अपने बैठने के लिए बोड़ी लाई है। झुनकी बोड़ी को थोड़ा सा खिसका कर रूबी के बैठने के लिए जगह बनाने में सफल हो गई। रूबी, झुनकी से सट कर बैठ गई। एक पैर बोड़ी पर तो दूसरा पैर खाली जमीन पर। अब झुनकी भी क्या करे? बोड़ी ही छोटी है।


सभी बच्चे आपस में खूब बातें करते हैं। इन बच्चों को स्कूल में शिक्षा मिले-न-मिले पर ये बच्चे आपस में बातचीत करना खूब सीख जाते हैं। सर जी को भले ही इन बच्चों से बात करने में रुचि न हो, परन्तु इन बच्चों को आपस में बात करने में बहुत मज़ा आता है।


📜 नाम पुकारे जाने की आस, पेट की चुभन और माँ की गोद का स्वप्न

रूबी को मालूम है, अभी ऊँचे वर्ग में पैसा बँट रहा है। "अब मेरे वर्ग का भी नंबर आएगा। तब सर जी हमारे वर्ग में भी आएँगे और हमको भी पैसा देंगे।" बुधनी अपनी सिर को खुजलाते हुए बोली।


ये बच्चे ठंड में कम ही नहाते हैं। सर जी भी इन्हें पानी से बचने की ही सलाह देते हैं। जान बचेगी तो पढ़ाई होगी। पहले जान, फिर पढ़ाई और जान बचाने के लिए ठंडे पानी से दूर रहना जरूरी है।


जब सभी बच्चे बात करने में व्यस्त थे, उसी बीच लाली वर्ग के बाहर झांकने के लिए दौड़ पड़ी। वह कुछ ही देर में बाहर का समाचार लेकर आ गई।


"सर जी अब तीसरी वर्ग में आ गए हैं। वे वहाँ खूब पैसे बाँट रहे हैं।" लाली की नाक में ठंड से पानी आ रहा है। वह फ्रॉक उठाकर नाक में आए पानी को पोंछते हुए फिर चहक कर बोली, "अब उसके वर्ग का ही नंबर है।"


सभी बच्चे खुश होकर लाली को आशा भरी निगाह से देखने लगे। सभी बच्चे एक बार फिर आपस में बातचीत करने में व्यस्त हो गए। बच्चे बहुत मिलनसार हैं। भले ही सर जी इन बच्चों की परवाह न करें, पर ये आपस में एक-दूसरे की जरूर परवाह करते हैं। तभी किसी ने चहक के आवाज लगाई, सर जी आ रहे हैं और सचमुच में सर जी हाथ में रजिस्टर लिए वर्ग में आ गए। वे वर्ग में प्रवेश करके एक ओर रखी कुर्सी पर बैठ गए।


सर जी पैसा मिलते ही बच्चों को जल्दी से घर चले जाने की हिदायत देने लगे। सर जी कहते हैं, रास्ते में कहीं मत रुकना, नहीं तो बच्चा समझकर कोई पैसा छीन लेगा।


अब तो सर जी नाम पुकारकर पैसा बाँटना भी शुरू कर दिए हैं। लेकिन ये ठंडी हवा तो रुकने का नाम ही नहीं ले रही है। खिड़की से अंदर आ रही है। अब खिड़की बंद भी कैसे करें, खिड़की में पल्ला रहे तब न! रूबी के पेट में हल्की-हल्की चुभन हो रही है। शायद उसे ठंड लग गयी है, नहीं, घर से स्कूल वह तेज कदम चल कर आयी है इसलिए। मगर सुबह तो वह ठीक से खाना भी नहीं खाई थी। लेकिन अब क्या होगा?


वह दोनों पैर को छाती तक सिकोड़ते हुए ठंड से बचने का प्रयास कर रही है। मगर ठंड तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है। खैर, अब कुछ देर की बात है। पैसा मिलते ही वह घर चली जाएगी और वह माँ के हाथ में पैसा देगी। जल्द ही उसका नाम पुकारा जाएगा। वह सर जी के पास जाएगी और फिर पैसा लेकर सीधे वह घर की ओर भागेगी और घर पहुंचकर माँ की गोद में बैठ जाएगी। फिर वह माँ से कहेगी, "माय, हमरा खाना दे।" (माँ, मुझे खाना दीजिए।) माँ उसे अपनी गोद में बैठाकर खाना खिलाएगी। फिर माँ उसे अपने आँचल में छिपा लेगी, तब ठंड कैसे लगेगी?


रूबी को ऐसा लगा कि वह माँ की गोद में है। माँ उसके सिर पर हाथ फेर रही है।



💔 वीरान कक्षा, टूटती आशाएं और सर्द होते फर्श पर अकेलापन

लेकिन, वह तो स्कूल में थी। माँ की गोद में कैसे आ गई? तभी रूबी की नींद टूटी तो उसने देखा कि वह तो अब भी स्कूल में ही है। लेकिन अब वर्ग का नजारा बदला हुआ है। वह खाली जमीन पर पड़ी है। उसकी सहेली झुनकी अपनी बोड़ी लेकर जा चुकी थी। लगता है पूरा वर्ग, ......नही-नही, पूरा स्कूल ही खाली हो चुका है! दूर-दूर तक न कोई बच्चा है और न ही किसी बच्चे का शोर-गुल ही सुनाई पड़ रहा है।



🥺 "हमर पैसा, सर जी!" — टूटती आस, मास्टर जी की सहानुभूति और एक आखिरी उम्मीद

सब को पैसे मिल गए। लेकिन रूबी को तो पैसे नहीं मिले हैं। अचानक घटित मुसीबत से रूबी हक्का-बक्का रह गई। वह दौड़कर सर जी के ऑफिस की ओर भागी। वहाँ भोला सर जी दिख गए। सर जी को देखकर रूबी की टूटती आस जग गई। उसकी जान में थोड़ी जान आ गई। मगर हृदय की घबराहट में कमी नहीं आई।


भोला सर जी भी जाने की तैयारी में थे। तभी भोला सर की निगाह दरवाजे पर खड़ी रूबी पर पड़ी। सर जी अचंभित होकर अभी रूबी से कुछ बोलने ही वाले थे कि रूबी भोला सर जी से धीरे से बोल पड़ी, "हमर पैसा, सर जी!"


शायद सर जी रूबी की आवाज नहीं सुन पाए या फिर उसकी आवाज नहीं समझ पाए।


"क्या हुआ रूबी बेटी, तुम अब तक यहीं हो?" भोला सर रूबी के करीब आकर उसके सिर पर हाथ रखते हुए बोले, "देखो तो! अब अंधेरे भी होने वाला है। सभी बच्चे कब के अपने-अपने घर चले गए। ठंड भी कितनी है! यह जानलेवा ठंड और तुम्हारे शरीर पर इतने कम कपड़े! बेटी, जान चली जाएगी। जल्दी से घर चले जाओ।"


अब रूबी सर जी को कैसे बताए कि इसी जानलेवा ठंड से बचने के लिए ही तो वह इतना कष्ट उठाकर आज स्कूल आई है! इन पैसों से ही तो वह गर्म कपड़े खरीदेगी।


"क्या हुआ रूबी? तबीयत खराब है?" रूबी को वहीं खड़ी देख सर जी ने रूबी से दोबारा पूछा।


"हमर पैसा, सर जी!" रूबी की आशा टूटती जा रही थी। सर जी की सहानुभूति भरी बातों से उसकी आँखों में आँसू आ गए।


"क्या, तुमको पैसा नहीं मिला?" सर जी चौंक कर बोले।


"नय सर जी! हमर पैसा नय मिल्लय, जी।" (नहीं जी, मुझे पैसा नहीं मिला।) रूबी बहुत ताकत लगाकर धीमी आवाज में बस इतना ही बोल पाई।


"कहाँ थी तुम? क्या कहीं खेल रही थी?..... अच्छा, चल हेडमास्टर के पास चलते हैं। तुमको पैसा दिलवाते हैं।"



🕯️ जब तक साँस है, तब तक आस है — भोला सर जी का ढाँढस और गरम खाने की चाहत

सर जी आगे-आगे, भोली-भाली सी छोटी रूबी सर जी के पीछे-पीछे हेड सर जी के ऑफिस तक पहुँच गई। रूबी की टूटती हुई आस जाग गई। जैसे तेल के अभाव में बुझते हुए दीये में किसी ने थोड़ा सा तेल डाल दिया हो और दीये में एक बार फिर थोड़ी सी लौ तेज हो गई हो।


"सिन्हा जी, जरा देखिए तो! इस बच्ची को पैसा नहीं मिला है।" भोला सर हेड सर के ऑफिस में अंदर जाते ही बोले, "बेचारी कितनी घबराइ हुई है! अब तक यह घर नहीं गई है।"


"कहाँ थी अब तक तुम, रूबी?" भोला सर के पीछे खड़ी रूबी से हेड सर ने पूछा।


हेड सर की बात सुनकर रूबी और घबरा गई, मगर उसे कोई जवाब नहीं सूझा। वह चुप रही।


"बात कर रही होगी क्लास में सहेली से या खेल रही होगी। है ना, रूबी!" भोला सर रूबी की ओर देखते हुए बोले। बदले में रूबी ने अपना सिर 'नहीं' में हिलाया।


"अच्छा, कोई बात नहीं है। घबराओ मत। हेड सर अभी रजिस्टर देख रहे हैं। तुमको अभी पैसा मिल जाएगा, ठीक है।"


भोला सर की बात पर रूबी ने 'हाँ' में अपना सिर हिलाया। उस समय भोला सर की बातें रूबी को अमृत के समान लग रही थीं।


"और हाँ, पैसा लेकर सीधे घर चले जाना। अंधेरा होने वाला है। तुम्हारा गाँव भी दूर है। रास्ते में कहीं भी नहीं रुकना, नहीं तो बच्चा समझकर कोई पैसा छीन लेगा। समझी, रूबी?"


बदले में, रूबी ने अपना सिर एक बार फिर 'हाँ' में हिलाया।


भोला सर की बातें रूबी के लिए संजीवनी बूटी की तरह काम कर रही थीं। खत्म होती आस अब लौट चुकी थी। चेहरे पर उम्मीद की किरण और आँखों में चमक आ गई। देर से ही सही, मगर उसे पैसा तो मिलेगा! ठंड का क्या? ठंड तो आता-जाता रहता है। पैसा मिलते ही वह सीधे घर जाएगी और माँ को पैसे देगी। पेट में चुभन भी हो रही है, पर कोई बात नहीं। माँ उसे गरम-गरम खाना खिलाएगी। वह माँ से भात-दाल और आलू का भरता बनाने को कहेगी। फिर उसके लिए माँ भात-दाल और आलू का भरता बनाएगी, उसको खाना देगी। हाँ, वह तो माँ की गोद में बैठकर ही खाना खाएगी! गरम-गरम भात-दाल और आलू का भरता खाकर वह ठंड को भूल जाएगी। फिर वह माँ की गोद में आराम करेगी।



💔 "हाज़िरी कम है!" — एक ही पल में टूटा मासूम सपनों का महल

अभी रूबी ऐसा सोच ही रही थी कि तभी हेड सर रजिस्टर पलटते हुए उदास हो गए।


"क्या हुआ हेडमास्टर साहब?" भोला सर ने हेडमास्टर साहब से पूछा।


रूबी चौंकी। हेड सर का चेहरा देखकर दोबारा जगी आस टूटती हुई जान पड़ी।


"रूबी की तो हाजिरी ही कम है। अब पैसे इसको कैसे दें?" हेडमास्टर साहब ने रजिस्टर पलटते हुए कहा।


हेडमास्टर साहब की बात सुनकर भोला सर भी दुखी हो गए। वे जानते थे कि इतनी ठंड में भी रूबी पैसे के लिए ही रुकी हुई है। अब अगर रूबी को पैसा नहीं मिला, तो उसपर क्या बीतेगी।


रूबी हेड सर की बात सुनकर स्तब्ध हो गई। उसके पास बोलने के लिए कोई शब्द नहीं थे। हमेशा खुश रहने वाला चेहरा अब स्याह पड़ चुका था। रूबी का छोटा सा मासूम चेहरा आँसुओं से भरा था।



🪔 💔 🪔 💨 जब अचानक से कोई आशा टूटती है, तब उसी को पता होती है उस पर क्या गुजर रही है...

उम्मीद या आशा में वह शक्ति है जो एक कमज़ोर को भी बलवान बना देती है। लेकिन जब यही उम्मीद या आशा अचानक से टूटती है, तब बलवान से बलवान प्राणी भी निर्बल और क्षीण-हीन हो जाता है। यह कीमत वसूलना जानती है—यदि यह इंसान को लड़ने की शक्ति देती है, तो उसे सबसे लाचार भी यही बनाती है।

"रूबी बेटी.................!" भोला सर अपने पीछे खड़ी रूबी की ओर मुड़कर देखने लगे।


रूबी के सारे सपने टूट चुके थे। उसकी उम्मीदें सर्द हवाओं में तैर रही थीं। रूबी को अब मास्टर जी की आवाजें सुनाई नहीं पड़ रही थीं।


रूबी कुछ समझ नहीं पा रही थी। बस वह लगातार घर की ओर भाग रही थी। दौड़ रही थी अपने घर की ओर—अपनी माँ की गोद में सोने के लिए। पेट में सुई-सी चुभन, फिर भी दौड़ रही थी वह! न जाने कहाँ से उसमें इतनी शक्ति आ गई थी।



🖤 आशा कीमत वसूलना जानती है और जब यह कीमत वसूलती है तो व्यक्ति इसकी कीमत देने लायक नहीं बचता — माँ की गोद और एक अंतिम चिर-निद्रा

हलकू चाचा का घर पार कर गया। चुड़ैल वाली नीम-पीपल का गाछ (पेड़) आने वाला है और तेजी से होता अंधेरा! मगर कोई फर्क नहीं पड़ता। रूबी तो दौड़ रही है और अब तो चुड़ैल वाली नीम-पीपल का गाछ भी पार कर गया। कजरी भी अपने दोनों छोटे-छोटे बच्चों के साथ रूबी के पीछे-पीछे दौड़ने लगी। मगर रूबी न रुकी, न कुछ बोली।


पड़ोसी का घर! अपने घर के बाहर खूंटे से बंधी गाय! मगर रूबी तो भाग रही है। उसका कहीं रुकने का नाम नहीं। रूबी को किसी से कोई मतलब नहीं।


रूबी के घर का दरवाजा! अब रूबी अपने घर के अंदर-- माँ की गोद और फिर रूबी सो गई --हमेशा-हमेशा के लिए! दूसरी दुनिया में जागने के लिए।

♦ ♦ ♦

संध्या होने वाली है। रूबी का शरीर माँ की गोद में है। रूबी का पूरा शरीर माँ के आँचल से ढँका हुआ है, मगर मुँह खुला है। माँ के फटे आँचल से रूबी का चेहरा दिख रहा है, मानो कह रहा हो—

माय, हम आपके लिए नई साड़ी खरीदने के लिए पैसा नहीं ला पाए... हम परिस्थिति से हार गए। इस दुनिया में प्रेम की कोई पूछ नहीं, भावना की कोई क़द्र नहीं। हम थक गए हैं। अब हम थककर आराम कर रहे हैं। माय, आपकी आँचल की छाँव से ज़्यादा सुकून हमको कहाँ मिलेगा? फटा ही सही...... है तो माँ का आँचल.......!

घर के ओसारे में बैठी माँ का हृदय-विदारक चीत्कार! गोधूलि वेला की घनघोर मायूसी। माँ की गोद में रूबी का शरीर। चारों दिशाओं में गूँजायमान होता माँ का करुण रोदन!


माँ का आँचल


"रूबी ! उठ न बेटी........! बेटू...... ! उठ न !"

"हमर अच्छी बेटी ! उठ न नुनु.....!"

"तुम्हरे लिए गरम - गरम खाना बनाये है, बेटी !....उठ न हमर बच्ची |"

"खाना नही खायेगी ! उठ न रूबी ! बाहर तुम्हरे साथ खेलने कजरी आयी है | उठ न बेटी...!"

"खाना खा ले, बेटी !.....हमरा छोड़ के अकेले - अकेले कहाँ चली गई मेरी बच्ची.....!"

♦ ♦ ♦

कल होकर राज्य के कुछ अखबारों में छपा-- "इस भीषण ठंडक ने राज्य में एक छह वर्ष की गरीब मासूम बच्ची की जान ले ली.......!"


लोगों ने एक निगाह उस पर दौड़ाई, फिर पेज पलट कर दूसरी चीज पढ़ने में व्यस्त हो गये........ इस बार भारत ने क्रिकेट में इतिहास रच दिया ....!!!

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🪔 अब हम तो सफर करते हैं...
अब हम तो सफर करते हैं...
रहा बेचैन हमेशा, इस बर्बाद दुनिया में,

मर कर ही सही, चैन तो मिला हमको।
जी कर नहीं, चिरनिद्रा में सोकर चैन तो मिला हमको।

क्या गम है, अगर कफ़न भी न मिला तन ढकने को हमको?
पर ये क्या कम है,
कफ़न के बदले, फटा ही सही,
मगर माँ का आँचल तो प्रारब्ध से मिला ही हमको!
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Writer Credentials & Details:
  • Screenwriter: Rajiv Sinha (Delhi-Based Writer)
  • Membership: Screenwriters Association (SWA), Mumbai (No. 59004)
  • Format Availability: Feature Films, Web Series & Short Films
© All Rights Reserved. इस कथा/स्क्रिप्ट का सर्वाधिकार लेखक के पास सुरक्षित है। बिना अनुमति किसी भी प्रकार से प्रतिलिपि (Copying), रूपांतरण (Adaptation) या व्यावसायिक उपयोग करना कॉपीराइट नियमों के विरुद्ध है।
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