महालया, सनातन धर्म में है इस दिन का विशेष महत्व

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महालया, सनातन धर्म में है इस दिन का विशेष महत्व

महालया



आश्विन मास की अमावस्या को महालया (Mahalaya) के नाम से जाना जाता है। हिन्दू पंचांग में यह दिन वर्षा ऋतू की समाप्ति और शरद ऋतू के आगमन के साथ वर्ष में एक बार आता है। समूचे भारत में इस समय मौसम बड़ा सुहावना होता है। वातावरण में न अधिक गर्मी होती है और न ही अधिक सर्दी। एक तरह से यह समय अनायास ही बसंत ऋतू की स्मृति करा जाता है।


सनातन धर्म में मनाये जाने वाले प्रत्येक त्यौहार और उत्सव जीवन से जुड़ा हुआ है और उनका आम जीवन में बहुत महत्व है, प्रत्येक त्यौहार एक शृंखला की भांति जीवन की विभिन्न मनोभाव की अभिव्यक्ति का माध्यम है। इसके साथ ही ये सभी के सभी त्यौहार आत्मिक, अलौकिक और परमार्थ के मार्ग पर लें जाने वाले है।



क्या महालया बंगाल का पर्व हैं?


कुछ लोग महालया को बंगाल का पर्व मानते है। कई न्यूज एजेंसीज की वेबसाइट में इस पर्व के साथ बंगाल और बंगालियों को जोड़कर देखा गया होता है। वे इस त्यौहार को एक समूह में सीमित करके दिखलाते है। वे इसे बंगाल और बंगालियों का त्यौहार बतलाते है। जबकि ऐसी कोई बात नहीं है। महालया किसी क्षेत्र विशेष और वहां के लोगो से जुड़ा कोई क्षेत्रीय त्यौहार नहीं है बल्कि यह सनातन धर्म के प्रमुख त्योहारों में से एक है। यह केवल बंगाल और बंगालियों का ही त्यौहार नहीं हैं बल्कि यह सभी सनातनियों का प्रमुख त्यौहार हैं और इस त्यौहार को सभी सनातनियों को श्रद्धा के साथ मनाना चाहिए।


महालया का वर्णन हिन्दू धर्म शास्त्रों में मिलता है। महालया का शास्त्रों में बड़ा महत्व बतलाया गया है। महालया के अनुष्ठान के बारें में अग्नि पुराण, पद्म पुराण, विष्णु पुराण जैसे कई पुराणों में चर्चा की गई है।



क्या हैं महालया?


महालया का अर्थ हैं, देवी दुर्गा व उनकी अन्य शक्तियों का पृथ्वी पर आह्वान या निमंत्रण। यह मंत्रोच्चारण के द्वारा संपन्न होता है। इस तरह से यह दिन अमावस्या की अँधेरी रात्रि को देवी के आह्वान के रूप में मनाया जाता है। अब यही कारण हैं कि शारदीय नवरात्रि में बनाये जाने वाली माँ दुर्गा की प्रतिमा में कलाकार महालया के दिन ही माँ दुर्गा की प्रतिमा को नेत्र प्रदान करते है। इसी दिन प्रतिमा को पूरा करने का काम भी लगभग संपन्न कर लिया जाता हैं क्योकि अगले दिन के प्रातः काल की कलश स्थापना के साथ ही शारदीय नवरात्रि का आरम्भ हो जाता हैं।



कब आता महालया हैं?


महालया प्रत्येक वर्ष आश्विन की अमावस्या को आता हैं, अर्थात आश्विन की अमावस्या को ही महालया के नाम से जाना जाता हैं। इस तरह महालया वह दिन होता है जिस दिन पितृ पक्ष (Pitri Paksh) की समाप्ति हो जाती है यानि महालया पितर पक्ष (Pitar paksh) के अंतिम दिन को कहते है। महालया को महालया अमावस्या (Mahalaya Amawasya) के नाम से भी जाना जाता है। चूँकि यह दिन पितृ पक्ष का अंतिम दिन होता है, इसलिए इस दिन उन सभी पितरो का भी तर्पण किया जाता है, जिनका वे या तो नाम नहीं जानते या फिर जिनसे वे परिचित नहीं है। इस दिन का तर्पण उन सभी अज्ञात पितरो के निमित्त होता हैं, जिनसे उनके परिवार के सदस्य अवगत नहीं हैं। अब यही कारण है कि महालया के दिन को सर्व पितृ अमावस्या अथवा पितृ विसर्जनी अमावस्या या फिर कई स्थानों पर इस दिन को मोक्षदायिनी अमावस्या के नाम से भी जाना जाता है। इस दिन सभी ज्ञात - अज्ञात पितरो का तर्पण होता है।



क्या है पितृ तर्पण करने का अर्थ?


पितृ को तर्पण करने का अर्थ है उन्हें जल अर्पित करना, उन्हें भोजन सामग्री भेंट करना। पितरो का तर्पण करने से पितृ दोष (Pitri dosh) के साथ ही कई ग्रह बाधाओं में या तो कमी आती है या फिर वे पूर्णतः दूर हो जाते हैं। माना जाता है कि पितर महालया के दिन अर्थात संध्या होने से पहले ही वापस पुनः अपने लोक गमन कर जाते है।



महालया के दिन से ही शारदीय नवरात्रि की शुरुआत हो जाती है।


महालया के दिन से ही दुर्गा पूजा अर्थात आश्विन की नवरात्रि की शुरुआत हो जाती है। इस दिन 15 दिन से चला आ रहा पितृ पक्ष का अंत होता है और उसके बाद देवी पक्ष आरम्भ होता है। चूँकि पितृ पक्ष में कोई शुभ कार्य नहीं किया जाता है मगर महालया के साथ ही शुभ व पवित्र समय का आगमन हो जाता है। क्योकि उसके अगले ही दिन प्रतिपदा से आश्विन की नवरात्रि आरम्भ हो जाती है। अर्थात महालया के अगले ही दिन आश्विन की कलश की स्थापना के साथ पहली पूजा होती है। इस तरह महालया पितृ पक्ष की समाप्ति और आश्विन की नवरात्रि के आरम्भ का दिन है। इस दिन को पितरो की विदाई और माँ दुर्गा के आगमन के रूप में भी मनाया जाता है। जिसको महालया का नाम दिया गया हैं।


सनातन धर्म की मान्यता के अनुसार इसी दिन माँ दुर्गा अपने लोक से पृथ्वी पर आती है और नवरात्रि तक पृथ्वी पर वास करती है। महालया के दिन ही माँ दुर्गा अपने भक्तो के घर आती है और फिर दस दिन तक वहां वास करती है। नवरात्रि की समाप्ति के साथ ही देवी पुनः अपने लोक की ओर प्रस्थान कर जाती है। इस तरह महालया ही वह दिन है जिस दिन माँ दुर्गा दस दिन के लिए धरती पर आती है।


महालया के दिन ही सभी देवी देवताओ ने मिलकर महिषासुर (Asur Mahisasur) के वध के लिए माँ दुर्गा (Maa Durga) का आह्वान किया था। उसी के बाद माँ दुर्गा प्रकट होकर महिषासुर से बड़ा भयानक युद्ध किया और फिर अंत में उस असुर का संहार कर दिया।



तो क्या हर बार महालया के अगले दिन से शारदीय नवरात्रि आरम्भ होती है?


नहीं, ऐसा सदैव नहीं होता है। जब वर्ष में अधिमास लगता है और उससे आश्विन मास प्रभावित होता हैं अर्थात आश्विन मास को दोहरा दिया जाता है, तब ऐसा नहीं होता। वैसी स्थिति में पितृ पक्ष की समाप्ति अर्थात महालया के अगले दिन नवरात्रि शुरू न होकर उसके एक महीने बाद शुरू होती है। यह स्थिति वर्ष 2020 में हो चुकी है, जब पितृ पक्ष की समाप्ति के एक महीने बाद नवरात्रि शुरू हुई थी। उससे पहले वर्ष 2001 और वर्ष 1982 में भी ऐसा संयोग हो चुका हैं, जब आश्विन महीना में मलमास लग गया था और नवरात्रि महालया के अगले दिन शुरू न होकर एक मास बाद शुरू हुई थी।



मलमास, अधिमास, अधिक मास क्या हैं?


अधिमास को अधिक मास, पुरुषोत्तम मास, मलमास भी कहते है। मलमास का अर्थ है, फीका, मलिन महीना। चूँकि इस माह का न कोई देवता होता है और न ही सूर्य की सक्रांति होती है। इस कारण यह मास मलिन कहलाता है। इसे ही मलमास कहते है। इस कारण इस महीने कोई भी शुभ कार्य का आयोजन नहीं किया जाता है।


अब यही कारण है कि आश्विन में मलमास लगने पर महालया के एक महीने बाद अर्थात मलमास की समाप्ति के बाद नवरात्रि आरम्भ होती है। अधिक मास अर्थात मलमास प्रत्येक तीन वर्ष में एक बार लगता है। लेकिन यह प्रत्येक वर्ष अलग अलग महीने पर लगता है और जब मलमास आश्विन में लग जाता है, तभी महालया के एक महीने बाद नवरात्रि आरम्भ होती है।


मलमास का एक नाम पुरुषोत्तम मास भी है। इसका कारण यह है कि इसी मास में भगवान् विष्णु ने नरसिह का अवतार धारण करके हिरण्यकश्यप का वध किया था। इसी कारण इस महीने का एक नाम पुरुषोत्तम मास भी है।



वर्ष 2023 का महालया (2023 Ka Mahalaya Kab Hai)


वर्ष 2023 का महालया 14 अक्टूबर को हैं और इसके अगले दिन 15 अक्टूबर से नौ दिनों तक मनाये जाने वाली शारदीय नवरात्रि आरम्भ हैं, जो 23 अक्टूबर तक चलेगी। 24 अक्टूबर को दशमी हैं। दशमी को ही दशहरा के नाम से भी जाना जाता हैं। इस तरह वर्ष 2023 का दशहरा 24 अक्टूबर को हैं।



वर्ष 2023 के पंचांग में महालया कब से कब तक (Mahalaya 2023 In Hindi)?


पंचांग के अनुसार 2023 का आश्विन माह का कृष्ण पक्ष की अमावस्या अर्थात महालया 13 अक्टूबर की रात्रि 9:50 से आरम्भ होकर अगली तिथि 14 अक्टूबर की मध्य रात्रि 11:24 तक रहेगा।



इस बार महालया पर सूर्य ग्रहण भी लग रहा हैं।


वही इस दिन सूर्य ग्रहण भी लग रहा हैं। मगर यह भारत में नहीं दिखेगा क्योकि यह रात्रि के समय लग रहा हैं। सूर्य ग्रहण 14 अक्टूबर 2023 की रात्रि 8:34 से मध्य रात्रि 2:25 तक रहेगा। लेकिन इस सूर्य ग्रहण का पितरो के पूजन, तर्पण पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसका प्रातः काल से आरम्भ होने वाली नवरात्रि की कलश स्थापना के समय पर भी कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा। इसके दो कारण हैं, पहला यह रात्रि को लग रहा हैं जो भारत में नहीं दिखेगा। दूसरा, यह भारत में नहीं दिखेगा, जिस कारण भारत में कही पर भी सूतक नहीं लगेगा। हालाकिं सूतक ग्रहण के 12 घंटे पहले लग जाता हैं मगर यह नियम तब लागू होता हैं जब ग्रहण उस क्षेत्र में दिख रहा हो, जबकि 14 अक्टूबर 2023 का लगने वाला सूर्य ग्रहण रात्रि के समय लगने के कारण भारत में नहीं दिखेगा इसलिए ग्रहण सम्बन्धी किसी भी नियम का पालन करने की आश्यकता ही नहीं हैं।


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Mahalaya Amavasya 2023:जानें, महालया का अर्थ, महत्व व तिथि | सर्व पितृ अमावस्या | Mahalaya 2023 Date



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लेखन :

राजीव सिन्हा

(राजीव सिन्हा लेखक है। साथ ही वे ज्योतिष शास्त्र व धर्म के भी जानकार है।)

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