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खुशी (भाग - 1) - A Heart Touching Story In Hindi

smrititak.com - खुशी (भाग - 1)

विद्यालय की छुट्टी हो चुकी थी। सभी विद्यार्थी के साथ साथ शिक्षक भी अपने अपने घर जा चुके थे। मैं अकेला उस दो मंजिले विशाल भवन वाले विद्यालय की ऊपरी छत पर टहल रहा था। उस छत से जहाँ एक ओर गांव के सुने और सपाट खेत दिख रहे थे, तो वही भवन के सामने से जाती हुई सड़क भी दिख रही थी।

ग्रेजुएशन के रिजल्ट लेने के बाद ही मैं उस गांव में चला गया था। मेरे जानने वाली एक महिला के लम्बे समय से किये जा रहे विशेष आग्रह के बाद वहां गया था। वैसे भी मुझे गांव देखने की ईच्छा थी। वहां जाने पर मैं एक प्राइवेट स्कूल में भी पढ़ाने लगा था। इससे मेरी आर्थिक तंगी भी तात्कालिक रूप से समाप्त हों गयी थी। रहने के लिए मुझे स्कूल के द्वितीय तल पर एक शानदार रूम दिया गया था। वह रूम पूरी तरह से सुसज्जित था। उस कमरे में शानदार पलंग, टेबल, कुर्सी, पंखा जैसे जरुरत की सभी आवश्यक चीजे उपलब्ध थी।

स्कूल में पढ़ाने के अलावे मैं विद्यार्थियों को अलग से प्राइवेट ट्यूशन भी दिया करता था। उस समय की जरुरत के अनुसार गांव में रहते हुए कमाई ठीक ठाक थी। मगर उस काम में भविष्य नहीं था। एक तो गांव और उस पर से प्राईवेट काम। इसके साथ ही उस गांव में मेरा कुछ भी नहीं था। वहां मेरी एक सुई भर की भी संपत्ति नहीं थी। इसलिए मुझे भविष्य को लेकर हमेशा चिंता बनी रहती थी। न जाने कब क्या हो जाये ! वैसे तो वो एक शहरीकृत गांव था मगर फिर भी था तो वो गांव ही !



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मुझे वहां गए तीन बर्ष बीत गए थे। वहां मेरी दोस्ती रवि से हो गयी थी। आरम्भ में रवि ने ही मुझे उस स्कूल में पढ़ाने के लिए कहा था। वे स्वयं भी उसी स्कूल में पढ़ाया करते थे।

रवि मेरी ही आयु के थे और साथ ही वो उस क्षेत्र के जाने माने टीचर भी थे। उनका घर हमारे स्कूल के सामने से जाती हुई सड़क के ठीक उस पार था। वह सड़क कुछ दूर जाकर मुख्य सड़क से मिल गयी थी। मुख्य सड़क दुल्हिन बाजार से होते हुए पटना तक जाती थी। पटना वहां से कुछ ही किलोमीटर दूर था।

उस क्षेत्र में वह स्कूल बहुत विख्यात होता जा रहा था। सैकड़ो नहीं हजारो विद्यार्थी उसमे अपना भविष्य बना रहे थे। मुझे उस स्कूल में किसी बर्ष गणित पढ़ाने दिया जाता तो कभी अंग्रेजी। चूँकि उन बिषयो पर तब मेरी अच्छी पकड़ हुआ करती थी। मेरी लगन और परिश्रम के बल पर वह स्कूल लगातार तरक्की की सीढ़ी पर चढ़ रहा था और बहुत कम ही समय में वह स्कूल उस क्षेत्र में लोकप्रिय हो गया।


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मैं अभी इन्ही विचारो की गहराईयो में डूबा था, तभी चन्दन मेरे पास आया। चंदन दशवी का स्टूडेंट था। वह स्कूल प्रबंधक का बेटा था। वह अपने अन्य भाई - बहनो के साथ संध्या के समय मुझसे पढ़ने आया करता था। उस समय उसके चेहरे पर गंभीरता थी। वह बहुत दुखी मालूम पड़ रहा था। तीन बर्ष की अवधि में शायद ही मैंने उसे कभी इतना दुखी देखा था।

उसके दुःख का कारण यह था की मैं उस क्षेत्र को हमेशा हमेशा के लिए छोड़कर कल दिल्ली जा रहा था। उसके ह्रदय में मेरे लिए बहुत अपनापन था।

उसने उदासी भरी दृष्टि से मेरी ओर देखते हुए मेरे हाथ में चाय का गिलास थमाया। कुछ देर की गंभीरता के बाद वह अपनी चुप्पी तोड़ते हुए बोला,"सर ! हमलोग शाम को पढ़ने नहीं आएंगे। माँ की तबियत सही नहीं है।"

उसकी माँ कैंसर पेसेंट थी और मुंबई से कीमो थेरेपी की ट्रीटमेंट ले रही थी।

"ठीक है ..... !" मैंने कहा और फिर चुप हो गया।

चन्दन सीढ़ी पर से धीरे धीरे उतरता हुआ मेरी ओर भी देखे जा रहा था। उसकी आँखे मानो कह रही हो,'अब यह शाम दोबारा कभी नहीं आएगी.........!'

चन्दन चला गया था। उसके जाने के बाद उस भीमकाय भवन में फिर से एक बार सन्नाटा छा गया।


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वैसे आज स्कुल में उत्सव और मातम दोनों का मिश्रित रूप मुझे देखने को मिला था। उत्सव इसलिए क्योकि आज मेरा जन्मदिन है। इसलिए आज स्कूल में उत्सव था और मातम इसलिए क्योकि कल दोपहर को मैं हमेशा - हमेशा के लिए उस गाँव को छोड़कर दिल्ली जा रहा था। मेरा दोस्त शिशिर मिश्रा ने बुलाया था मुझे। वह दिल्ली में किसी बड़े राजनीतिक पार्टी में एक बड़े पद पर आसीन हो गया था। इसलिए उसने मुझे बुलाया था, ताकि मैं ईधर - उधर धक्का खाने की बजाय अपने जीवन को सही दिशा दे सकूँ।

उस दिन मेरा छोटा - सा कमरा गिफ्ट ही गिफ्ट से भर गया था। पलंग से लेकर टेबल, कुर्सी, रैक हर जगह गिफ्ट ही गिफ्ट फैले पड़े थे। विचारमग्न अवस्था में ही मैंने दूर तक फैले उन सुने खेतो की ओर देखा। खेतो के बीच बने चौड़े पगडंडियों पर मुझे कुछ आते - जाते लोग दिख रहे थे। मैं भी वहां अपने जीवन के बिताये उन तीन बर्षो में उन पगडंडियों पर, गाँव के उन सकरी सकरी राहो पर बहुत चल चुका था। मगर फिर भी मैं अब तक कही नहीं पहुँच सका था।

छत पर टहलते हुए मैं रेलिंग के पास जाकर नीचे सड़क की ओर देखने लगा। मेरी दृष्टि किसी की तलाश कर रही थी। लेकिन वह कौन था......., जिसको देखने के लिए मेरी आँखे बेचैन हो रही थी ..... जिसको पास से मैं महसूस करना चाहता था।

मैं दूर तक जाती उस सड़क और सामने दूर तक फैले सपाट खेतो में उस आकृति को तलाशने लगा था। शायद वो कही से आते हुए दिख जाएँ ........ लेकिन वह कौन था......जिसने मेरे अंतर्मन में इतना महत्वपूर्ण स्थान बना लिया था। मैं अतीत से लेकर तब तक के गुजरे हुए एक एक पल का स्मरण बहुत गहराई से करने लगा।


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अभी दो बर्ष पहले ही की बात है। मैं ठीक इसी समय बिल्डिंग के सबसे ऊपरी छत पर इसी तरह टहलते हुए एक सुन्दर लड़की पर मेरी दृषिट पड़ गई थी।

उस लड़की का न केवल चेहरा बल्कि नीचे से लेकर ऊपर तक के शरीर का गठन अत्यंत आकर्षक था। अचानक उस नवयुवती की दृष्टि भी मुझपर पड़ गई। सड़क पर आगे बढ़ते हुए वह लड़की आश्चर्य से मेरी ओर ऐसे देखने लगी, मानो कल्पना में देखी गई कोई आकृति प्रत्यक्ष रूप से आँखों के सामने दिख गई हो।

अचानक उस नवयुवती के चेहरे पर प्रसन्नता छा गई। शायद वह पहले कुछ उदास - उदास सी थी। मगर अब उसके चेहरे पर मुस्कान छा गई थी। बहुत हंसमुख लड़की थी वो। मुझे तब उस कस्बे में रहते हुए एक बर्ष ही हुआ था। मगर फिर भी मैंने इससे पहले उस लड़की को अब तक कही नहीं देखा था।

फिर कुछ दिन तक लड़की मुझे कहीं नहीं दिखी। उस व्यस्त जीवन और आगे की जिंदगी सवाँरने की चिंता में जल्द ही उस घटना के साथ साथ उस मासूम सी लड़की को भी मैं कब भूल गया, ये मुझे तब पता चला जब महीनो बाद वह मुझे सड़क पर फिर सामने से आती हुई दिख गई।


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उसके दोबारा दिखने पर मैं उसे तत्काल ही पहचान गया था क्योकि उसकी सुंदरता की जोर की लड़की उस समूचे क्षेत्र में कही नहीं थी। साथ ही, उसका मुझे देखकर मुस्कुराना मेरे लिए उसकी सबसे बड़ी पहचान बन गई थी। उस समय वह लड़की मेरे सामने से आ रही थी। शायद वह भी मुझे पहचान गयी थी।

मुझे देख कर वह मुस्कुराने लगी। मैंने सोचा वह मुझे प्रणाम करेगी। परन्तु, उसने यह शिष्टाचार न दिखाकर मुझे नाराज कर दिया था। मुझे उस लड़की को देखकर आश्चर्य भी हो रहा था और चिढ भी।

'आमतौर पर इसके उम्र के लड़के लड़कियां मुझे देखकर गंभीर हो जाते है और फिर गुड-मार्निंग, गुड आफ्टरनून, गुड इवनिंग जैसे शिष्टाचार वाले शब्द से मेरा अभिवादन करते है। इस लड़की को अगर ये बोलना नहीं आता है तो कोई बात नहीं, लेकिन यह हाथ जोड़कर प्रणाम तो कर ही सकती है और अगर हाथ नहीं भी जोड़े तो भी काम चलेगा, कम से कम मुँह से प्रणाम तो बोल ही सकती है। फिर मुस्करा कर अभिवादन करें या गंभीर होकर, इससे कोई फर्क नहीं पड़ता।' मैं उस लकड़ी को देखकर सोचने लगा।

उस रात मैं उसी लड़की के बारे में सोच रहा था और सोचते सोचते मुझे कब नींद आ गई, इसका आभाष मुझे तब हुआ जब सुबह की बैच में पढ़ने वाली एक विद्यार्थी मेरे पास आकर मुझे जगाने लगी,"सर जी ! उठिये ! सुबह हो गई है .......!"


smrititak.com - खुशी (भाग - 1)

सुबह से रात तक फिर वही क्लास पर क्लास बदलना, वही ट्यूशन, वही विद्यार्थी, वही सब्जेक्ट ......!

'सब के सब कितना उबाऊ है यहाँ। मेरा जीवन किसी तालाब में भरे हुए पानी की तरह जैसे ठहर सा गया है यहाँ। वैसा पानी जो दुसरो को धोते धोते स्वयं एक दिन मृतप्रायः हो जाता है।' उस दिन छुट्टी के बाद उस विशाल छत पर रेलिंग को पकड़े अकेले खड़ा खड़ा सोचने लगा, अब आगे अपना करियर बनाने के लिए क्या किया जाये। यहाँ से जो रास्ते आगे जाते है वे शहर की ओर ही जाते है। लेकिन शहर में भी जाकर हम क्या करेंगे। मेरे पास तो कोई टेक्नीकल नॉलेज भी नहीं है। कॉम्पिटिशन एग्जाम में भी सफलता नहीं मिल रही है। एक तो वेकेंसी ही मुट्ठी भर निकलती है। जो निकलती भी है, उसपर आरक्षण रूपी पिशाच सवार होता है। अब हम जेनरल वाले कहाँ जाय,क्या करें।'

तभी मेरी दृष्टि नीचे सड़क पर उस लड़की पर पड़ी जो कहीं से आ रही थी। मेरी ओर वह दूर से ही ऐसे देखते आ रही थी मानो उसके सुने नेत्रों को बस मेरा ही इंतजार हो। उसकी आंखों में मैंने बस खुशी ही खुशी देखि थी, ऐसी खुशी जिसमें केवल उमंग और उत्साह भरा हुआ हो, जहां गम का दूर-दूर तक कोई नामोनिशान नहीं हो। वह मेरी ओर देख कर ऐसे मुस्कुराने लगी मानो वो मुझसे बात करना चाहती हो।

ऊपर छत से ही मैंने पूरी सड़क को देखा। संयोग था मुझे उस समय वहां कोई नहीं दिखा।


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लेकिन तभी अचानक से मुस्कुराना बंद कर दिया और जल्दी से अपना सिर नीचे कर लिया। मैंने सोचा कि मेरे ओर से उत्तर नहीं मिलने के कारण उसने ऐसा किया होगा और यह सोचकर मैं प्रसन्न हो गया कि अब यह लड़की मुझे देखकर कभी नहीं मुस्कुराएगी। लेकिन नहीं मैं गलत था। उसी क्षण मेरी दृष्टि दूर सड़क पर एक बाइक सवार पड़ गई जो लड़की के सामने से आता हुआ मुझे दिख गया। लड़की ने मुझसे पहले ही उस बाइक सवार को आते देख लिया था और इसी कारण उसकी नजर से बचने के लिए ही लड़की ने अपना सिर तत्काल नीचे कर लिया था।

मैं ऊपर छत पर खड़ा था जहां दोनों ओर जाती हुई दूर दूर तक सड़क दिख रही थी फिर भी मुझसे पहले उस बाइक सवार को उस लड़की ने देख लिया था। मैं लड़की को इतने चौकन्ने रहने पर अवाक रह गया।

इस लड़की का मस्तिष्क कितना तेज है। यह कितनी चौकन्ना रहती है। इतना चौकन्ना तो हमारे देश के कमांडो ही रहते होंगे और विशेष कर वे कमांडो जो देश के सुप्रीम पद पर आसीन लोगों की सुरक्षा करते होंगे। मैं मन ही मन उस लड़की के बारे में सोचने लगा।

बाइक सवार आगे बढ़ गया था और बाइक सवार के आगे बढ़ते ही वह पुनः फिर से अपना सिर ऊपर करके मुस्कुराने लगी।

मैंने सोचा इस बार शायद यह लड़की मुझे प्रणाम सर न सही कम से कम केवल 'प्रणाम' तो करेगी ही। मगर पहले की तरह उसने फिर से मेरी आशा पर अपनी हंसी वाला पानी फेर दिया। वह मेरी आशा पर पानी फेरते हुए मुस्कुरा कर आगे बढ़ गई।


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उस रात को मैं बहुत देर तक उसी लड़की के बारे में सोच रहा था। जहाँ हमारे उम्र के नवयुवक को ऐसी स्थिति में वैसी सुन्दर अप्सरा जैसी लड़की से प्यार हो जाता है। ठीक उसी के विपरीत मुझे उस लड़की से चिढ हो गयी।

फिर क्या ! जैसे जैसे उसका मुझे स्थिर दृष्टि से देखना, फिर मुस्कुराना बढ़ता गया, वैसे वैसे उसके प्रति मेरी भी चिढ दिनों दिन बढ़ती चली गई।

अंत में, स्थिति यहाँ तक आ गई थी कि अब मुझे उसके चेहरे से भी घृणा हो गई थी। घृणा भी इतनी कि यदि वो दूर से कभी आती हुई दिख जाती और उसका मेरे से आमना सामना होने वाला होता तो मैं अपना सिर निचे किये जल्दी से आगे बढ़ जाता। कभी कभी तो मैं उसको सामने से आते हुए देख कर फिर से वापस मुड़ जाता ताकि उसका मेरा से आमना सामना न हो सके।


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एक दिन मैंने चन्दन से उसके बारे में पूछा तो उसने बताया, "यही पास के एक कॉलेज में पढाई करती है। बी एस सी की स्टूडेंट है।"

चंदन स्कूल प्रबंधक का बड़ा बेटा था और राहुल छोटा। उसकी एक सगी छोटी बहन भी थी। नाम था - अंकिता। उसकी एक बड़ी मौसेरी बहन भी थी जो उसी लड़की के साथ पढ़ती थी। नाम था - सोनम। वे सभी संध्या को मेरे पास ही पढ़ने के लिए मेरे पास आया करते थे।

चंदन प्रायः अपने छोटे भाई राहुल के साथ रात को मेरे बगल वाले बड़े वाले कमरे में सोने आ जाया करता था। विद्यार्थी होने के बावजूद वह कई बार मुझे सही सलाह देकर एक सच्चे मित्र की भूमिका निभा चुका था।

एक दिन दोपहर के समय में प्रथम तल पर रेलिंग के निकट खड़ा था। मेरे साथ चन्दन भी खड़ा था। हम दोनों एक दूसरे से कुछ बातें कर रहे थे। नीचे सड़क गई थी। थोड़ी दूर हट कर सड़क के उस पार रवि का घर था। वे उस समय ट्यूशन बैच को पढ़ा रहे थे और दूसरे बैच के विद्यार्थी उनसे ट्यूशन पढ़ने के लिए बाहर बरामदे में खड़े थे। वे पहले वाले बैच के स्टूडेंट्स के निकलने का इंतजार कर रहे थे।


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बाहर बरामदे में दूर खड़े विद्यार्थियों की दृष्टि जैसे ही मुझ पर पड़ी वैसे ही सभी ने बारी बारी से वही से मेरा अभिवादन किया। जो मुझे पसंद था। लेकिन तभी मेरी दृष्टि एक चुलबुली लड़की पर चली गयी जो तेजी से बरामदे में एक ओर आकर चुपचाप से खड़ी हो गई थी। वो वही लड़की थी जिससे मुझे चिढ़ थी। इस समय उसके हाँथ में कॉपी किताब थी। लेकिन इस समय वो बदली बदली सी लग रही थी। वो बहुत मायूस और दुःखी लग रही थी। तभी उसकी दृष्टि मुझ पर पड़ गई। फिर क्या था। मुझे देखते ही वह ऐसे प्रसन्न हो गई मनो, कोई प्रतीक्षित चीज दिख गई हो।

उसने अपने पुराने अदाओ का प्रदर्शन करते हुए वही से फिर एक मुस्कुरा दिया। लेकिन उसने मेरा अभिवादन अभी भी नहीं किया। उसका इस तरह मुझे देख कर मुस्कुराना, मेरा अभिवादन ना करना जैसी हरकत पहले की भांति मुझे फिर बुरा लगा। मुझे ऐसा लगा कि उसने मेरी गंभीरता का मजाक उड़ा कर मेरी भावनाओं के साथ खिलवाड़ किया है।


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वो शाम कुछ अजीब सी थी। सूर्य अस्तमन होने के लिए अस्तांचल के करीब पहुंच चुका था। मैं प्रथम तल के विशाल बरामदे में अकेले ही टहल रहा था। उस दूर तक फैले हुए छत पर क्या समूचे भवन में मेरे अलावा कोई नहीं था। मैं अपने जीवन के साथ था दूसरे के जीवन के बारे में भी दार्शनिक अंदाज में चिंता नहीं चिंतन कर रहा था।

मैं सोच रहा था, 'ये दुनिया कितनी विरानी हैं। हम सब परदेशी की भांति इस क्षण क्षण क्षीण होती दुनिया में विचर रहे हैं और अचानक से किसी पल सब कुछ छोड़कर एक अपरिचित यात्रा की ओर एक दिन प्रस्थान कर जाएंगे। जिसको हम मृत्यु के नाम से जानते है। मृत्यु के साथ ही सब कुछ दम तोड़ देगी। न ये शरीर रहेगा। न ये धन दौलत रहेगा। न ये ज्ञान रहेगा और न ये सुंदरता रहेगी। मृत्यु के साथ सब कुछ एक झटके में चली जायेगी। फिर क्या रह जायेगी हमारे पास। कुछ तो नहीं रहेगी हमारे पास। आखिर हम क्या लाए थे अपने साथ और फिर क्या लेकर जाएंगे अपने साथ। कुछ पाप, कुछ पुण्य के कर्म फल ही तो होंगे हमारे साथ। बाकी तो सब कुछ धरे के धरे रह जायेगे।

ये संसार न तेरा है ना मेरा है फिर भी हम तेरे हैं तुम हमारे हो के खूब झूठी कसमें खाते हैं हम। यहाँ तो अपना शरीर भी अपना नहीं है फिर किसी दूसरे को अपना कहना या उसके वायदों पर भरोसा करना कहां तक उचित है। जबकि वायदा करने वालों को भी ज्ञात नहीं है कि आने वाला कल कैसा होगा। आने वाला कल एक सपना है। इस पर किसी का कोई जोर नहीं है, फिर भी 'मैं करूंगा !' जैसे घमंड करते हुए लोग कैसे दूसरे से कोई वायदा कर देते है। लोग कैसे दूसरे को वचन देते हैं। जबकि भविष्य में घटने वाली घटनाओ की न तो किसी को जानकारी है और न ही उस पर कोई जोर है।

फिर उस वचन का क्या आचित्य है, जब वचन देनेवाले अथवा वचन से लाभान्वित होने वाले प्राणी की वचन पूर्ण होने से पहले काल का ग्रास बन जाएं।


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हालांकि ये निगुढ़ ज्ञान आज के आधुनिक काल में बहुतों के पास है परंतु सांसारिक माया - मोह ऐसा भ्रमकारी है जो महान ज्ञानियों के ज्ञान को भी मजबूती के साथ हरण कर लेता है और उस पर अपनी छाप छोड़ देता है। इसी से यह सृष्टि अनगिनत सदियों से चलती आ रही है वरना ज्ञानियों के जमघट से यह कब की रुक गई होती। फिर दुख सुख भी नहीं रहता क्योंकि दुख सुख की जननी तो माया मोह ही है। न मिलन का आनंद रहता और न ही वियोग की पीड़ा रहती। एक निर्मोही को कौन सा सुख, कौन सा दुःख। '

मैं मन ही मन सोचने लगा, ' कैसा मोह से भरा संसार है यह !'

अभी मैं महान ज्ञानी की भांति माया - मोह के बिषय में सोच ही रहा था कि ऊपरवाले भगवान ने माया - मोह को धारण करनेवाली शक्तिशाली मोहिनी चक्र मुझ पर फेंक दिया और मेरी दृष्टि बाहर नीचे से आये एक अतिथि पर पड़ गयी। वो नीचे के खुले दरवाजे से होते हुए सीढ़ी पर चढ़कर मेरे पास आयी थी।



smrititak.com - खुशी (भाग - 1)


अगला भाग :
खुशी (भाग - 2)


Khushi......!!

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Written By

R S


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